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Wednesday, 8 April 2026

#ZakirKhan की #Dhurandhar टिप्पणी पर धुंआ धुंआ क्यों #SiddharthAnand ?



एक फिल्म समारोह का सञ्चालन करते समय, स्टैंडप कॉमेडियन ज़ाकिर खान ने, मज़ाक में कहा कि  धुरंधर २ की सफलता से बांद्रा से जुहू तक के स्टार्स मन ही मन जल रहे हैं। उन्होंने कराची की लयारी बस्ती में बम फटने और मुंबई के पॉश इलाकों में धुआँ उठने का ज़िक्र करते हुए यह बात कही। 





ज़ाकिर खान के इस व्यंग्य पर, सोशल मीडिया पर फिल्म धुरंधर २ पर पहले दिन से ही  नकारात्मक टिप्पणियां करने वाले ट्विटरेटियों ने ज़ाकिर खान की तीखी आलोचना शुरू कर दी। इन टिप्पणीकारों का मानना है कि धुरंधर २ फ्लॉप है। इसे सरकार के पैसों से चमचो और भक्तों द्वारा देखा जा रहा है। फिल्म की प्रशंसा करने वाला हर सेलिब्रिटी इनके निशाने पर रहता है।  सो ज़ाकिर खान भी आ गए। 




इस विवाद में बॉलीवुड पेंच उस समय गहरा गया, जब शाहरुख़ खान की फिल्म पठान और हृथिक रोशन की फिल्म फाइटर के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद भी इसमें कूद पड़े। उन्होंने ज़ाकिर खान का नाम लिए बिना, एक्स पर लिखा कि  जुहू-बांद्रा के लोगों ने पचास सालों से लगातार ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर फ़िल्में दी हैं, और जो कोई भी इस बात को कम करके आँकता है, उसे उन्होंने 'असली बेवकूफ़' कहा।





स्पष्ट रूप से, सिद्धार्थ आनंद की टिपण्णी ध्रुवीकरण कर गई।  बहस, जुहू बांद्रा अभिनेताओं के समर्थकों और धुरंधर फिल्म के समर्थकों के बीच बंट गई। पहले गुट का कहना था कि सिद्धार्थ आनंद ने सही लिखा है।  बांद्रा और जुहू में रहने वाले अमिताभ बच्चन, खान अभिनेताओं, देओल बंधुओं, आदि ने कई बड़ी हिट फ़िल्में दी है। सिद्धार्थ का कहने का तात्पर्य यह था कि बॉलीवुड इन्ही चंद अभिनेताओं के बलबूते पर जीवित है। 




वही, कुछ का कहना था कि ज़ाकिर खान ने मजाक में बात कही थी। यह बांद्रा जुहू बॉयज पर हलकीफुलकी टिपण्णी थी। क्योंकि,  धुरंधर फिल्मों की सफलता पर बॉलीवुड के किसी बड़े स्टार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। यहाँ तक कि खान अभिनेताओं के चहेतों ने तो धुरंधर फिल्मों की, अनावश्यक आलोचना करते हुए शाहरुख़ खान और उनकी पठान जवान फिल्मों को श्रेष्ठ बताना शुरू कर दिया। 




सभी जानते हैं कि कोई स्टैंड-अप कॉमेडियन फिल्म इंडस्ट्री अथवा अन्य किसी संस्था या व्यक्ति के बारे में एक हल्का-फुल्का मज़ाक करता है। ज़ाकिर खान ने भी किसी अभिनेता या फिल्मकार का नाम नहीं लिया था।  उन्होंने बिना किसी का अपमान किये, बेचैनी की और इशारा भर किया था। सिद्धार्थ आनंद को बीच इसे मजाक ही समझ कर भड़कना नहीं चाहिए थे। उनके इस प्रकार भड़कने से ज़ाकिर खान की धुंआ निकल रहा है वाली टिपण्णी सही साबित हो जाती है। क्योंकि, धुरंधर की सफलता ने कुछ लोगों को बेचैन कर दिया है। कहा गया कि यदि एक साधारण सा मज़ाक इतना ज़्यादा चुभता है, तो शायद यह असुरक्षा की भावना सचमुच मौजूद है। इस तरह प्रतिक्रिया देने के बजाय, शायद इसे उसी भावना से लेना चाहिए जिस भावना से इसे कहा गया था।




यहाँ बताते चलें कि सिद्धार्थ आनंद भी नेपो किड्ज़ में से हैं। उनके पिता बिट्टू आनंद ने अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म शहंशाह का निर्माण किया था। गीतकार और लेखक इन्दर राज आनंद उनके दादा है। मुकुल आनंद और टीनू आनंद उनके चाचा है। उन्होंने, अब तक आठ फ़िल्में निर्देशित की है।  इनमे से पांच फिल्में यशराज फिल्म्स की है। उन्होंने अब तक सैफ अली खान, रणबीर कपूर, हृथिक रोशन, शाहरुख़ खान, रानी मुख़र्जी, प्रियंका चोपड़ा, कटरीना कैफ, आदि बड़े सितारों वाली फ़िल्में ही निर्देशित की है। उनकी आगामी फिल्म किंग शाहरुख़ खान के साथ है। 




धुरंधर फिल्मों की सफलता से अप्रभावित लगने वाले सिद्धार्थ आनंद ने हृथिक रोशन और अनिल कपूर जैसे सितारों वाली युद्ध फिल्म फाइटर एक निर्माण और निर्देशन किया है। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास नहीं कर पाई थी। धुरंधर की सफलता को भाव न देने वाले सिद्धार्थ आनंद अपनी फिल्म हवाई युद्ध का प्रदर्शन करने वाली भारत की पहली एरियल फिल्म फाइटर की असफलता के लिए दर्शकों को दोषी बताते हुए विचित्र तर्क देते थे। उन्होंने कहा था कि अगर आप गौर करें, तो हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी... मैं कहूंगा ९०% लोग ऐसे हैं जिन्होंने कभी प्लेन में सफर नहीं किया! जो कभी एयरपोर्ट गए ही नहीं! तो फिर आप उनसे यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि उन्हें पता हो कि हवा में क्या हो रहा है? 





उनके इस अजीबोगरीब तर्क की सोशल मीडिया एक्स पर धुर्रे उड़ा दिए गए। उनकी पोस्ट पर एक कमेंट था कि पठान इसलिए हिट हो गई कि ९०% भारतीय रॉ एजेंट है। दूसरे यूजर ने लिखा कि इस तर्क से तो विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ट्वेल्थ फेल इस लिए हिट हो गई कि ९० प्रतिशत भारतीय बारहवीं फेल है। तीसरे यूजर ने लिखा कि दंगल इसलिए हिट हो गई कि ९० प्रतिशत भारतीय पहलवान है। 





स्पष्ट रूप से, सिद्धार्थ आनंद और बॉलीवुड का जुहू बांद्रा गैंग चिंतित है।  अब हवा हवाई फ़िल्में नहीं चलने वाली। अभी किसी स्पाई यूनिवर्स का रॉ एजेंट वीएफएक्स पर उडता हुआ बॉक्स ऑफिस पर बमबारी नहीं कर सकता। अब बॉलीवुड के इस स्पाई को रियल होना पड़ेगा। खान अभिनेताओं की प्लास्टिक बॉडी पर निर्भर बॉलीवुड ऎसी फ़िल्में नहीं बना सकता।  इसलिए ज़ाकिर खान की टिपण्णी ने बॉलीवुड की सुलगा दी है। 

Saturday, 4 April 2026

#NamitMalhotra की #Ramayan को पश्चिमी मान्यता की जरुरत क्यों ?



दो भागों में बनाई जा रही हिन्दू धार्मिक महाकाव्य रामायण पर आधारित फिल्म रामायण के निर्माता नमित मल्होत्रा, रामायण के कल ३ अप्रैल को अनावृत टीज़र पर भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया से क्षुब्ध लगते हैं।   उन्होंने इसे लेकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा- मैं इसे (रामायण को) भारत में रहने वाले भारतीयों को खुश करने के लिए नहीं बना रहा हूँ। मेरी दृष्टि  में, यदि पश्चिम के लोगों को यह (टीज़र) पसंद नहीं आता, तो मैं इसे अपनी असफलता मानता। यह पूरी दुनिया के लिए है।





प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​के वक्तव्य से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर, कन्नड़ सुपरस्टार यश और बॉलीवुड अभिनेता सनी देओल अभिनीत यह फ़िल्म रामायण प्रारम्भ से ही एक ग्लोबल प्रोजेक्ट है। वह इसकी सफलता को मुख्य रूप से भारतीय दर्शकों की पसंद के बजाय पश्चिमी दर्शकों की स्वीकृति से मापते हैं।





नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित, निर्माता नामित तिवारी की फिल्म रामायण का निर्माण भी पूरी विश्वस्तरीय भव्यता के साथ किया है। इस फ़िल्म में अवतार जैसी भव्यता के लिए अवतार के बजट से कहीं अधिक व्यय किया है। भारतीय संगीतकार एआर रहमान के साथ फिल्म का संगीत हॉलीवुड की डयन, द लायन किंग, ग्लैडिएटर, पाइरेट्स ऑफ़ द कॅरीबीयन, द डार्क नाइट त्रयी के संगीत निर्देशक हैंस ज़िमर  है। यह दो हिस्सों वाली महागाथा की पहली गाथा फ़िल्म दिवाली २०२६ पर रिलीज़ प्रदर्शित होने वाली है।




नामित मल्होत्रा का यह ट्वीट थोड़ा आक्रामक लगता है।  जैसे वह अति आत्मविश्वास दिखा रहे हों। इससे, टीज़र को देखने  के बाद कड़ी प्रतिक्रिया देने वाले दर्शक उत्तेजित हो सकते है।  क्या नामित यह वक्तव्य भारतीय दर्शकों की मानसिकता पर कोई बुरा  प्रभाव डाल सकता है ?

यदि, नामित के वक्तव्य को सकरात्मक सोंच के साथ पढ़ा जाये तो उनका यह बयान का स्वतः ही भारतीय दर्शकों की मानसिकता पर कोई दुष्प्रभाव पड़ता नहीं लगता। निःसंदेह कुछ लोगों को यह वक्तव्य भारतीय दर्शकों की उपेक्षा करने वाला या अभिजात्यवर्गीय लग सकता है, जिससे उनमें निराशा या अपनी संस्कृति को दरकिनार किए जाने अनुभूति हो सकती है। किन्तु, यह अनुभूति  गहरी मनोवैज्ञानिक क्षति के बजाय, ज़्यादातर लोगों की सोच, बयान के तरीके और संदर्भ पर निर्भर करती है।

नमित मल्होत्रा ​​ने प्रारम्भ से ही 'रामायण' को एक वैश्विक परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया है।  उन्होंने रामायण फ़िल्म 'केवल भारत में रहने वाले भारतीयों के लिए'  नहीं है, बल्कि एक ऐसी सार्वभौमिक महागाथा है जिसमें अवतार जैसी वीएफएक्स भव्यता के लिए डेंग का सहयोग, आईमैक्स प्रभाव और ऐसे कथानक को लिया गया है, जो दुनिया भर के लोगों को पसंद आए। उस समय उन्होंने कहा था कि वह चाहते हैं कि यह फ़िल्म एक उच्च-गुणवत्ता वाली सिनेमाई कृति के रूप में उभरे, जिसे किसी भी तरह की सांस्कृतिक  पहरेदारी की आवश्यकता न पड़े। पहले हॉलीवुड भारतीय कहानियों को 'गरीब और पीड़ित' लोगों की कहानियों के रूप में देखता था। इस फ़िल्म का उद्देश्य भारत की सभ्यतागत शक्ति को दुनिया के सामने लाना है।





उनके वक्तव्य के इस अंश कि 'यदि यह फिल्म पश्चिमी लोगों को पसंद नहीं आती है, तभी मैं इसे अपनी असफलता मानूंगा' मार्केटिंग की एक साहसी शैली है। दूसरे देशों के प्रोड्यूसर/निर्देशक (जैसे चीन की ब्लॉकबस्टर फ़िल्में या कोरियाई कंटेंट) भी अपनी घरेलू दर्शकों की उपेक्षा किए बिना अपनी फ़िल्मों की ग्लोबल पहुँच के बारे में बात करते हैं। मल्होत्रा ​​ने यह साफ़ किया है कि दुनिया के लिए 'एक ही रामायण' है। इसमें पूरब और पश्चिम का कोई बँटवारा नहीं है, और भारतीय लोग दुनिया भर में हर जगह रहते हैं।





कुछ भारतीय दर्शकों को यह बात क्यों चुभ सकती है।क्योंकि, रामायण केवल मनोरंजन नहीं है, यह एक पवित्र महाकाव्य है जो करोड़ों लोगों की हिंदू पहचान, मूल्यों (धर्म, मर्यादा, आदि) और राष्ट्रीय गौरव से गहराई से जुड़ा है। सफलता को मुख्य रूप से पश्चिमी मान्यता के इर्द-गिर्द गढ़ना ऐसा महसूस करा सकता है कि 'हमें अपनी ही कहानी के लिए बाहरी लोगों की मंज़ूरी चाहिए' यह औपनिवेशिक काल के बाद की उन पुरानी  संवेदनशीलताओं को जगाता है कि भारतीय संस्कृति को योग्य बनने के लिए 'तराशने' या उसे सार्वभौमिक बनाने की ज़रूरत है।





कई भारतीयों ने इसके दृश्यों को लेकर कुछ ने जीवों के डिज़ाइन को सामान्य/ओर्क जैसा या पीएस ४ के स्तर का कहा, अति वीएफएक्स प्रभाव, भक्ति-भाव की कमी की आलोचना की। जब निर्माता भारतीय दर्शकों की मुख्य उम्मीदों के स्थान पर वैश्विक (जिसे अक्सर पश्चिमी समझा जाता है) पसंद को प्राथमिकता देता हुआ लगता है, तो निराशा और बढ़ जाती है और लोग कहते हैं कि वे हमारी विरासत को बेच रहे हैं।





होता यह है कि हमारा मनोविज्ञान है कि भारतीय चीज़ें तभी सफल होती हैं जब पश्चिम उनकी तारीफ़ करता है। इससे  औपनिवेशिक हीन भावना वाली मानसिकता मज़बूत हो सकती है। बॉलीवुड में लंबे समय से दर्शकों को लेकर एक दोहरा तनाव रहा है 'आम भारतीय दर्शक बनाम वैश्विक अपील वाला। यदि कोई फ़िल्म घरेलू स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करती, लेकिन ऑस्कर/पश्चिमी तारीफ़ महत्वपूर्ण लगती  है, तो कुछ लोगों को लग सकता है कि उनके भावनात्मक/सांस्कृतिक जुड़ाव को कम करके आंका जा रहा है।





दर्शक बहुत समझदार होते हैं। वह टिकट खरीद कर, फिल्म देखने के बाद दूसरे लोगों को बताकर अपना फ़ैसला सुनाते हैं। मज़बूत सांस्कृतिक जुड़ाव, अच्छा निष्पादन आमतौर पर निर्माता के बयानों की परवाह किए बिना स्थानीय स्तर पर जीत दिलाता है। संभावित सकारात्मक पहलू, यथा गरीब भारत और पीड़ित महिला वाली वैश्विक रूढ़ि को तोड़ने की महत्वाकांक्षा, अगर सफल होती है, तो वास्तव में सामूहिक गौरव को बढ़ा सकती है। रामायण को भारतीय मूल सामग्री को हॉलीवुड-स्तर की तकनीक के साथ दिखाना, सशक्त अनुभव करा सकता है कि हमारी कहानियाँ सबसे बड़े मंच की हक़दार हैं।





ज़्यादातर भारतीय दर्शक मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर नहीं होते। वे हॉलीवुड, के-ड्रामा, एनीमे, आदि का आनंद बिना किसी पहचान के संकट के लेते हैं। वे तभी आलोचना करते हैं जब कोई फ़िल्म उन्हें असली नहीं लगती, इसलिए नहीं कि किसी निर्माता ने 'वैश्विक' शब्द का इस्तेमाल किया है।




निष्कर्ष के रूप में यह बयान रामायण जैसे भावनात्मक रूप से संवेदनशील विषय के लिए भड़काऊ और खराब शब्दों में कहा गया है, जैसी यह तीखी प्रतिक्रिया को न्योता देने वाला है और घरेलू भावनाओं के प्रति असंवेदनशील लगता है । इससे उन मुख्य दर्शकों के नाराज़ होने का खतरा है, जिन्हें लगता है कि 'हमारे महाकाव्य को पश्चिमी मान्यता की आवश्यकता अनुभव नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसे मानसिकता के लिए हानिकारक कहना बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना होगा। असली नुकसान तो तब होगा, जब फ़िल्म खुद कहानी की आत्मा को कमज़ोर कर दे, जैसे, सबको पसंद आने लायक बनाने के लिए बहुत ज़्यादा बदलाव करना या तकनीकी रूप से कमज़ोर बनना । दर्शकों की अपनी मर्ज़ी होती है। वह २०२६ की दिवाली पर परदे पर जो देखेंगे, उसके आधार पर फ़िल्म को पसंद या नापसंद कर सकते हैं, न कि किसी एक इंटरव्यू की किसी एक लाइन के आधार पर। अगर फ़िल्म भावनात्मक रूप से दिल को छू लेने वाले राम, मज़बूत मूल्यों और भव्यता को बिना कहानी के मूल तत्व से समझौता किए पेश करती है, तो भारतीय दर्शक इसे दिल खोलकर अपनाएँगे। अब चाहे पश्चिमी मान्यता मिले या न मिले।   

Wednesday, 1 April 2026

#Dhurandhar2 के बहाने 'राजी' पर सिक्का !


 

लेखक निर्देशक आदित्य धर की रणवीर सिंह की धुरंधर भूमिका वाली फिल्म धुरंधर २ की अभूतपूर्व सफलता का प्रभाव दिखाई देने लगा है।  २०१८ में प्रदर्शित आलिया भट्ट अभिनीत फिल्म राज़ी के लेखक हरिंदर सिक्का ने एक बार फिर फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार की कटु आलोचना की है।  उन्होंने खेद व्यक्त किया है कि उन्होंने मेघना गुलजार को अपनी पुस्तक कालिंग सहमत पर फिल्म बनाने की सहमति दी। यद्यपि, उन्होंने  कई लोगों ने सचेत किया था। 





सिक्का का आरोप है कि मूल कहानी के कई हिस्सों को बदल दिया गया तथा फिल्म की कहानी में पाकिस्तान को दिखाने का तरीका नरम कर दिया गया, ताकि वह एक खास नज़रिए के हिसाब से सही लगे। जबकि, सिक्का के मुताबिक, उनकी किताब का मकसद सीमा पार की असलियतों और अंदरूनी चुनौतियों को ज़्यादा मज़बूती से सामने लाना था। वह अपनी गलती मानते हुए कहते हैं, "यह मेरी गलती थी... मुझे कहा गया था कि भरोसा मत करना, लेकिन मैं यकीन नहीं कर पाया। आज मैं समझ पाया हूँ कि भरोसा करो, लेकिन उसकी जाँच भी करो।"






 

बॉलीवुड का पुस्तकों, उपन्यासों, छोटी कहानियों और नाटकों को फिल्मों में ढालने का एक लंबा इतिहास रहा है। अक्सर वे मूल सामग्री को बदलकर उसे गानों, बड़े सितारों वाली फिल्मों, रोमांस या ज़्यादा बड़े दर्शकों को पसंद आने वाली चीज़ों जैसी व्यावसायिक आवश्यकताओं के दृष्टिगत ढाल लेते हैं। जहाँ कुछ फिल्में मूल कहानी के काफ़ी करीब रहती हैं और कला के लिहाज़ से सफल होती हैं (जैसे, विशाल भारद्वाज की शेक्सपियर पर बनी तीन फिल्में: मैकबेथ से 'मकबूल', ओथेलो से 'ओमकारा' और हैमलेट से 'हैदर' — जो इन दुखद कहानियों को मुंबई के अंडरवर्ल्ड, UP की राजनीति और कश्मीर विवाद जैसे भारतीय माहौल में ढालती हैं), वहीं कुछ फिल्में कहानी में बड़े बदलावों की वजह से विवादों में घिर जाती हैं। इन बदलावों में कहानी के तीखेपन को कम करना, 'मसाला' डालना, दर्शकों को 'पसंद आने लायक' बनाने के लिए कहानी का मिजाज बदलना, या कहानी में अपनी तरफ से कुछ बातें जोड़ देना शामिल हो सकता है। ऐसा ही कुछ 'राज़ी' (2018) के मामले में भी हुआ था, जब लेखक हरिंदर सिक्का ने डायरेक्टर मेघना गुलज़ार पर बार-बार यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनके उपन्यास 'कॉलिंग सहमत' से जासूसी की गंभीरता और सीमा पार की असलियत को कमज़ोर कर दिया है।





 

राज़ी, जिसमें आलिया भट्ट ने एक युवा भारतीय महिला सहमत, जिसकी शादी एक पाकिस्तानी मिलिट्री परिवार में हुई थी ताकि वह 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान RAW के लिए जासूसी कर सके, का किरदार निभाया था। फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल और समीक्षकों सके सराही गई फिल्म थी। इसने दुनिया भर में ₹200 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की और अपने तनावपूर्ण जासूसी थ्रिलर तत्वों, बारीकी से निभाए गए किरदारों (खासकर भट्ट और उनके पति के रूप में विक्की कौशल), और सीमा के दोनों ओर के किरदारों के संतुलित मानवीय चित्रण के लिए तारीफ़ बटोरी थी।   

 



सिक्का ने, वर्त्तमान से पूर्व भी बार-बार दावा किया था कि वह इस रूपांतरण के लिए अनिच्छा से राज़ी हुए थे, जिसका मुख्य कारण मेघना के पिता कवि-गीतकार और फिल्म निर्देशक गुलज़ार से किया गया एक निजी वादा था। बाद में उन्होंने मेघना को डायरेक्टर के तौर पर नियुक्त करने को अपनी "सबसे बड़ी ग़लती" बताया, और आरोप लगाया कि उन्होंने संभावित "वैचारिक पूर्वाग्रह" के बारे में मिली चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया और "भरोसा करो, लेकिन जाँच भी करो" के सिद्धांत का पालन नहीं किया। उन्होंने टीम पर आरोप लगाया कि उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के बावजूद उन्हें डायरेक्टर का कट नहीं दिखाया और डील होने के बाद उन्हें किनारे कर दिया । जिसके कारण उनकी पुस्तक की लॉन्चिंग में देरी हुई। उन्हें प्रमोशन के दौरान कम महत्त्व  दिया गया





  

सिक्का की किताब का नाम 'कॉलिंग सहमत' है। सिक्का चाहते थे कि फ़िल्म का नाम भी "सहमत" ही रखा जाए, ताकि मुख्य चरित्र की पहचान और देशभक्ति पर ज़ोर दिया जा सके। जबकि, फिल्म की टीम ने 'राज़ी' (जिसका मतलब इस मिशन के संदर्भ में "समझौता" या "सहमति" होता है) नाम चुना, जिसका एक कारण यह भी था कि वे इसे आलिया भट्ट के लिए सिर्फ़ एक स्टार- व्हीकल जैसा नहीं दिखाना चाहते थे। आलिया ने बाद में इंटरव्यू में बताया कि अगर फ़िल्म का नाम किरदार के नाम पर रखा जाता, तो शायद लोगों का ध्यान कहानी से हटकर एक्टर पर चला जाता। सिक्का को यह बात असली सहमत के योगदान को कम करके दिखाने जैसा लगा।  





 

हरिंदर सिक्का की किताब में, सहमत भारत लौटती है, जहाँ उसका हीरो जैसा स्वागत होता है—राष्ट्रीय गान (जन गण मन) बजता है और भारतीय प्रतीक (जैसे तिरंगा) प्रमुखता से दिखाई देते हैं। खबरों के मुताबिक, फिल्म में इन चीज़ों को या तो हटा दिया गया है या कम करके दिखाया गया है, जबकि पाकिस्तानी झंडे को ज़्यादा प्रमुखता से दिखाया गया है। सिक्का का दावा है कि भारतीय तिरंगे को पूरी तरह से हटा दिया गया था, और क्लाइमेक्स में सहमत को अपराध-बोध या डिप्रेशन से ग्रस्त दिखाया गया है—जैसे कि उसने भारत के लिए जासूसी करके "कोई गलती" कर दी हो। इसके विपरीत, किताब की सहमत एक दृढ़ देशभक्त है जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर काम करती है, न कि सिर्फ़ कर्तव्य-बोध से। उसे मिशन पूरा होने के बाद टूटने के बजाय गर्व महसूस होता है। सिक्का ने यह भी आरोप लगाया है कि पाकिस्तानी सेना और किरदारों को सकारात्मक रूप में दिखाया गया है। किताब में सीमा-पार की वास्तविकताओं की जो तीखी आलोचना की गई थी, उसे नज़रअंदाज़ करके "दुश्मन" को मानवीय रूप दिया गया है। 





 

किताब में सहमत को एक प्रशिक्षितजिसमें शारीरिक फुर्ती हैजो मारनेझूठ बोलने और ब्लैकमेल करने को भी तैयार निष्ठुर जासूस के रूप में बताया गया है । जबकि फिल्म की सहमत शुरुआत में ज़्यादा अनाड़ी और हिचकिचाने वाली लगती है—बंदूक की गोली चलने पर वह डर जाती है—और मार्गदर्शन के लिए वह भारतीय हैंडलर्स/दूतावास के सहयोग वाले नेटवर्क पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहती है। फिल्म में उसके आंतरिक भावनात्मक संघर्ष को जासूसी की नैतिक कीमत पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है।





किताब में भारत में सहमत के प्रेमी (अभिनव/एबी), उसके कॉलेज जीवन, उसके जुनून और परिवार से जुड़ी जानकारियाँ (जिसमें उसके माता-पिता की विवादास्पद प्रेम कहानी भी शामिल है) दी गई हैं। फिल्म की अवधि और मुख्य विषय पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इन चीज़ों को बड़े पैमाने पर हटा दिया गया या संक्षिप्त कर दिया गया।





किताब की तुलना में, फिल्म में सहमत के ज़मीनी जासूसी नेटवर्क (रिक्शा चालक, फेरीवाले) का विस्तार किया गया है—जबकि किताब में उसके मददगारों की संख्या सीमित थी और वे कहानी में काफ़ी बाद में सामने आते हैं। किताब में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक संवेदनशीलता और मतभेदों की गहराई से पड़ताल की गई है; वहीं फिल्म में धर्म के ऊपर राष्ट्रभक्ति को प्राथमिकता दी गई है।





किताब में मिशन के बाद के कुछ अतिरिक्त अध्याय भी हैं (जिनमें सहमत का एक साधु के सानिध्य में मानसिक शांति पाना, और पंजाब से जुड़े तत्वों या व्यापक खुलासों के संदर्भ शामिल हैं)। फिल्म में इन चीज़ों को संक्षिप्त कर दिया गया है, और इसका अंत निश्छल वीरता के बजाय मानसिक आघात (ट्रॉमा) के भाव के साथ होता है। सिक्का का दावा है कि कुछ प्रमुख उपलब्धियों (जैसे INS विक्रांत को नुकसान से बचाना) को या तो कम करके दिखाया गया है या उनमें बदलाव कर दिया गया है। 






पटकथा लेखक मेघना गुलज़ार और भवानी अय्यर ने कहानी के मुख्य आधार को तो अपनाया, लेकिन भावनात्मक गहराई, गानों (जो कम थे, पर असरदार थे) और ज़्यादा लोगों को पसंद आने के लिए इसमें कुछ "सिनेमैटिक आज़ादियाँ" भी लीं। प्रोड्यूसर्स में धर्मा प्रोडक्शंस शामिल थे, जिसका असर फ़िल्म के साफ़-सुथरे, मुख्यधारा वाले थ्रिलर अंदाज़ पर दिखा। सिक्का ने आरोप लगाया है कि फ़िल्म में "वामपंथी नज़रिए" का इस्तेमाल करके पाकिस्तान-विरोधी तेवर को नरम कर दिया गया और भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी की छवि को कमज़ोर दिखाया गया, जिससे एजेंट्स को निर्देश देने वाले अधिकारी कम निर्णायक लगे।