बॉलीवुड में पिछले कुछ सालों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब मुस्लिम मौलवियों या धार्मिक संस्थाओं ने अभिनेताओं, संगीतकारों, फिल्मों या उनकी सामग्री के विरुद्ध फतवे (गैर-बाध्यकारी धार्मिक आदेश) जारी किए हैं।
ये फतवे अक्सर इस्लामी शिक्षाओं के कथित उल्लंघन के कारण जारी किए जाते हैं, जैसे अश्लीलता को बढ़ावा देना, मूर्ति पूजा करना, समुदाय की नकारात्मक छवि दिखाना, या ऐसी गतिविधियों में शामिल होना जिन्हें 'हराम' (वर्जित) माना जाता है।
यहाँ कुछ ऐसे ही या मिलते-जुलते खास मामले दिए गए हैं प्यार का पंचनामा और ड्रीम गर्ल की अभिनेत्री नुसरत भरूचा के विरुद्ध ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन राजवी बालेवी ने एक फतवा जारी किया। इसमें उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की यात्रा के दौरान उनके द्वारा हिंदू रीति-रिवाजों में शामिल होने को एक गंभीर पाप बताया गया और उनसे नमाज़ पढ़ने तथा अल्लाह से माफी मांगने की अपील की गई। इस घटना ने व्यक्तिगत आस्था, स्वतंत्रता और धार्मिक सीमाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी।
२००७ में एक फतवे में सलमान खान और उनके परिवार को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें घर पर एक हिंदू देवता (गणेश) की पूजा करते हुए दिखाया गया था। इसके बाद उन्हें अपनी आस्था की पुष्टि करने के लिए 'शहादा' पढ़ने का आदेश दिया गया।
सलमान खान के विरुद्ध २००८ में, एक अन्य फतवा उनके द्वारा मैडम तुसाद संग्रहालय में अपनी मोम की प्रतिमा (वैक्स स्टैच्यू) लगाने की अनुमति देने के लिए निशाना बनाया गया। फतवे में शरीयत के उन नियमों का हवाला दिया गया था, जिनके तहत जीवित प्राणियों की प्रतिमा बनाना वर्जित है।
शाहरुख खान के विरुद्ध भी अतीत में कई फतवे जारी किए जा चुके हैं। इनमें २०१३ का एक मामला भी शामिल है, जब मेरठ के एक मौलवी ने बच्चों का नाम उनके (और सलमान खान के) नाम पर रखने पर आपत्ति जताई थी। मौलवी का मानना था कि यह गैर-धार्मिक हस्तियों की अनुचित नकल करने जैसा है।
मुंबई स्थित रज़ा अकादमी ने. २०१५ में ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान के खिलाफ एक फतवा जारी किया। यह फतवा ईरानी फिल्म 'मुहम्मद: मैसेंजर ऑफ गॉड' (निर्देशक: माजिद मजीदी) के लिए संगीत तैयार करने के कारण जारी किया गया था। अकादमी का तर्क था कि इस फिल्म में ऐसे दृश्यों को दिखाया गया है, जिन्हें इस्लाम की कुछ व्याख्याओं के अनुसार वर्जित माना जाता है।
विभिन्न मौलवियों ने ऐसी फिल्मों को भी निशाना बनाया है, जिन पर मुसलमानों की नकारात्मक छवि दिखाने का आरोप लगा है। उदाहरण के लिए, कुछ दक्षिण भारतीय फिल्में यथा कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम उल्लेखनीय है। हालाँकि, विश्वरूपम पर औपचारिक फतवों की तुलना में समुदाय के विरोध प्रदर्शनों के कारण ज़्यादा प्रतिबंध लगे थे।
२०१९ में, मध्य प्रदेश के धर्मगुरुओं ने फतवे जारी कर मुसलमानों से फ़िल्म 'राम जन्मभूमि' का बहिष्कार करने और उसकी मुख्य अभिनेत्री से दूर रहने की अपील की थी, क्योंकि इस फ़िल्म में अयोध्या से जुड़े विषयों को फिर से उठाया गया था।
ये फतवे आम तौर पर स्थानीय या किसी खास संस्थाओं (जैसे उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश जैसी जगहों पर दारुल इफ़्ता या जमातों) द्वारा जारी किए जाते हैं। भारत में इन फतवों की कोई कानूनी मान्यता नहीं होती, लेकिन ये सामाजिक दबाव, बहिष्कार या सार्वजनिक चर्चा को प्रभावित कर सकते हैं।
ये फतवे अक्सर तब सामने आते हैं जब कोई बड़ा विवाद चल रहा हो, जिसमें सांस्कृतिक संवेदनशीलता, कलात्मक स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाएं, या मनोरंजन में अश्लीलता/अभद्रता का आरोप शामिल हो। नोरा फतेही का मामला भी इसी तरह की आपत्तियों के दायरे में आता है, जिसमें गानों या डांस सीक्वेंस में अश्लील या कामुक सामग्री पर एतराज़ जताया गया है। यह बॉलीवुड में 'आइटम नंबर' या 'आइटम सॉन्ग' की समय-समय पर होने वाली आलोचनाओं जैसा ही है। हालांकि, इतिहास में मूर्ति पूजा, किसी समुदाय के चित्रण या धार्मिक दृश्यों पर जारी होने वाले फतवों की तुलना में, इस तरह की सामग्री पर सीधे फतवे जारी होना कम ही देखने को मिलता है।
पटकथा लेखक सलीम खान ने सार्वजनिक रूप से ऐसे फतवों के चुनिंदा (selective) रवैये पर सवाल उठाया है। उन्होंने पूछा है कि ये फतवे सिर्फ़ फ़िल्म बनाने वालों या अभिनेताओं को ही निशाना क्यों बनाते हैं, दर्शकों को क्यों नहीं?