ओटीटी प्लेटफार्म जी५ ने दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज (पहले पंजाब ९५) को सिर्फ़ ४८ घंटे बाद अपने इंडियन प्लेटफॉर्म से हटा दिया है। ज़ी५ के इस फैसले की निंदा की जा रही है। इसे फिल्म की बिना कट वाली ओटीटी रिलीज़ के बावजूद क्रिएटिव फ्रीडम के लिए एक झटका बताया गया है।
सतलुज, जसवंत सिंह खालरा की बायोग्राफिकल ड्रामा है, जो एक ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट थे, जिन्होंने 1990 के दशक में पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के दौरान कथित एक्स्ट्राज्यूडिशियल हत्याओं को डॉक्यूमेंट किया था। उन्हें एक दिन पंजाब पुलिस ने घर के बाहर से उठा लिया। उसके बाद जसवंत को कोई पता नहीं चला।
उन पर इस फिल्म सतलज को, तीन साल तक भारतीय सेंसर बोर्ड से लड़ाई झेलनी पड़ी। सेंसर ने १२० से ज़्यादा कट्स की मांग की थी। इसी कारण से फिल्म के शीर्षक को बदलना पड़ा। इसके बावजूद फिल्म थिएटर में रिलीज़ नहीं हो पाई ।
इस तेज़ी से हटाए जाने से ऑनलाइन अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं, जिसमें सपोर्टर्स ने सरकार के कामों को ईमानदारी से दिखाने की तारीफ़ की है और क्रिटिक्स का कहना है कि यह उस समय की हिंसा की एकतरफ़ा कहानी पेश करती है, जिसमें आम लोगों की मिलिटेंट हत्याओं पर बात नहीं की गई है।
जसवंत सिंह खालरा एक सिख ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट और पंजाब के अमृतसर के खालरा गाँव के पूर्व बैंक कर्मचारी थे। पंजाब में सिख आतंकवाद के दौरान गायब हुए हजारों लोगों की घटनाओं से प्रेरित होकर, उन्होंने म्युनिसिपल रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके पंजाब पुलिस द्वारा हज़ारों कथित एक्स्ट्राज्यूडिशियल हत्याओं और गुप्त दाह संस्कारों को डॉक्यूमेंट किया, जिसका अनुमान है कि ज़िलों में २५ हजार से ज़्यादा अज्ञात शवों का दाह संस्कार किया गया।
उनकी रिसर्च, जिसे इंटरनेशनल लेवल पर शेयर किया गया, ने १९८४ की घटनाओं के बाद ज़बरदस्ती गायब किए गए लोगों और पुलिस की ज़्यादतियों को हाईलाइट किया। सुप्रीम कोर्ट की एक पिटीशन के कारण सीबीआई और ह्यूमन राइट कमीशन ने जांच शुरू की। इस जांच में सीबीआई ने अकेले एक ज़िले में २०९७ गैर-कानूनी दाह संस्कारों की पुष्टि की। खालरा को धमकियाँ मिलीं लेकिन उन्होंने अपना काम जारी रखा।
जसवंत सिंह को, सितंबर १९९५ पंजाब पुलिस ने उनके घर के बाहर से किडनैप कर लिया, टॉर्चर किया और मार डाला। उनका मृत शरीर कभी नहीं मिला । २००५ में उनकी हत्या के लिए छह अधिकारियों को दोषी ठहराया गया तथा उन्हें उम्रकैद या उससे कम की सज़ा दी गई। उनकी विधवा परमजीत कौर वकालत करती रहती हैं।
