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Sunday, 9 November 2025

स्टारडस्ट से चाटुकार हिंदी फिल्म पत्रकारिता में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने वाले (नारी) हीरा !


 

यह युग हिंदी फिल्मपत्रकारिता का चाटुकार युग था। इस काल खंड की पत्र पत्रिकाएं बॉलीवुड के अभिनेता अभिनेत्रियों की झूठी प्रशंसा, उनका महिमा मंडन करने वाली और चाटुकारिता से भरपूर पीआर पत्रकारिता  वाली थी। सितारों के पीआर मैनेजर, फिल्म पत्रकारों को निर्माता के खर्च से शूटिंग लोकेशन पर ले जाते, सितारों के साक्षात्कार करवाते और कीमती उपहारों के साथ एक लेख भी दे देते थे।  यह युग सितारों के रंगीन और श्वेत श्याम चित्रों और ट्रांस्पेरेन्सी का था।





 

ऐसे समय में, न्यू यॉर्क की पत्रकारिता पर गहरी दृष्टि रखने वाले  और भारत में इस पत्रकारिता को लाने की सोच रखने वाले गुजराती नरेंद्र हीरानंदानी  उर्फ़ नारी हिरा का आगमन हुआ। वह खैबर रेस्टोरेंट के पास, कालाघोड़ा में स्थित एक विज्ञापन एजेंसी की  क्रिएटिव यूनिट के मालिक थे। उन्होंने, बॉलीवुड की तत्कालीन पत्रकारिता को चुनौती देने और  बॉलीवुड के सितारों के एफिल टावर से ऊंचा अहंकार को चूर चूर करने के लिए एक पत्रिका प्रारम्भ करने का निर्णय लिया। 





१ जनवरी १९७१ का दिन, हिंदी फिल्म पत्रकरिता के इतिहास में मील का पत्थर बन गया।  इस दिन एक अंग्रेजी पत्रिका स्टारडस्ट का पहला अंक बाजार में आया।  नारी हीरा ने, इस पत्रिका की  संस्थापक संपादक एक अनुभवहीन पत्रकार को, जो उनकी विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटर थी और मॉडलिंग कर चुकी थी, बनाया।  इस पत्रकार का नाम था शोभा किलाचंद, जिन्हे आज लोग शोभा डे के नाम से जानते है। 





नारी हिरा चतुर व्यवसाई भी थे। उस समय, नई पत्रिकाएं, बाजार में टिके रहने के लिए कम मूल्य पर बेचीं जाती थी। किन्तु, नारी हिरा ने, अपनी पत्रिका को श्रेष्ठ जताने के लिए इसका मूल्य अन्य पत्रिकाओं से दोगुना रखा। इस तरकीब ने अपना काम भी किया।  





स्टारडस्ट के जनवरी १९७१ अंक ने स्टाल पर आते ही तहलका मचा दिया।  इस पत्रिका के कवर पर राजेश खन्ना की तस्वीर थी।  राजेश खन्ना का उस समय अभिनेत्री अंजू महेन्द्रू से रोमांस चल रहा था। राजेश  खन्ना सुपर स्टार बन चुके थे।  स्टारडस्ट की पहली कवर स्टोरी में राजेश खन्ना ही थे।  उन पर स्टोरी का शीर्षक था- क्या राजेश खन्ना ने गुप्त विवाह कर लिया है। यह शीर्षक नारी हिरा का दिया हुआ था। इस स्टोरी में राजेश खन्ना के बंधन की शूटिंग के दौरान अंजू महेन्द्रू से विवाह कर लेने का  दावा किया गया था।  





इस दो रुपये मूल्य की स्टारडस्ट के पहले तीन दिनों में २५ हजार अंक बिक गए। बॉलीवुड  पत्रकारिता को स्टारडस्ट ने झिंझोड़ दिया था। यह पत्रकरिता में नए प्रारम्भ का सन्देश था। सितारों का सिंहासन हिलने लगा था।  स्टारडस्ट के प्रत्येक आगामी अंक की, जितनी उत्सुकता से प्रतीक्षा पाठकों  को रहती, उससे कहीं अधिक धुकधुकी बॉलीवुड के सितारों को रहती कि आगामी अंक में कौन मुखपृष्ठ में होगा। मुखपृष्ठ में होने का अर्थ किसी सितारे का काला सच बाहर आना।  इस पत्रिका पर, मान हानि के बहुत से मामले चले।  किन्तु, अंततः जीत स्टारडस्ट की ही हुई। स्टार धूल में मिल गए।  






नारी हिरा ने, फ़िल्मी हस्तियों को उनके नाम के स्थान पर अपने चुटीले और व्यंग्यात्मक नाम दिए।  उदाहरण के लिए, स्टारडस्ट के लिए धर्मेंद्र गरम धरम थे।  शत्रुघ्न सिन्हा को शॉटगन सिन्हा नाम स्टारडस्ट ने ही दिया।  हेमा मालिनी को इडली मालिनी का नया नामकरण हुआ। इन जैसे बहुत से नामों को पाठकों ने तो काफी पसंद किया। सितारों में भी कुछ को यह पसंद आये, कुछ ने नापसंदगी जाहिर की। किन्तु, इससे नारी हिरा और शोभा किलाचंदानी की टीम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 






 

१९७५ में अमिताभ बच्चन ने बॉलीवुड की फिल्म पत्र पत्रिकाओं का बहिष्कार किया था।  वह किसी पत्रकार से नहीं मिलते, कोई इंटरव्यू नहीं देते।  यह अपने आप में अनोखा था। किन्तु, यह बहिष्कार स्टारडस्ट की देन थी। उन दिनों अमिताभ बच्चन घर में चल रहे वैवाहिक कलह से तंग आ चुके थे और उन्होंने कई सह-अभिनेत्रियों से रिश्ते बनाने और सांत्वना पाने के लिए मिलना शुरू कर दिया, जिनमें ज़ीनत अमान और रेखा भी शामिल थीं। इसी बीच, उनका एक ईरानी लड़की के साथ भी अफेयर चला। इसका खुलासा स्टारडस्ट ने अपनी  कवरस्टोरी  में कर दिया।  इससे अमिताभ बच्चन बहुत रुष्ट हुए और उन्होंने सभी पत्रिकों को प्रतिबंधित कर दिया।   






नारी हिरा ने, लाना पब्लिशिंग ( बाद में मैग्ना) के अंतर्गत स्टारडस्ट का प्रकाशन प्रारम्भ किया था।  इस प्रकाशन ने बाद में, सैवी, शोटाइम, सोसाइटी और हेल्थ का भी प्रकाशन किया।  यह सभी पत्रिकाएं खूब बिकी।  स्टारडस्ट ने जब फिल्म पुरस्कार प्रारम्भ किये तो बॉलीवुड के सितारे इस पुरस्कार समारोह में सम्मिलित होने के उत्सुक दिखाई दिए।  






नारी की पब्लिशिंग कंपनी  मैग्ना के वित्त निदेशक एक जैन गुजराती चार्टर्ड अकाउंटेंट नरेंद्र शाह थे।  नरेंद्र शाह ने १९८१ में चित्रलेखा से प्रतिस्पर्धा करने के लिए एक साप्ताहिक पत्रिका  स्टार वीक  प्रारम्भ की। उन्होंने सौरभ शाह को संस्थापक संपादक नियुक्त किया, जिन्हें पत्रकारिता में लगभग कोई अनुभव नहीं था और वे मात्र ढाई साल पहले ही पत्रकारिता में आए थे। उस समय चित्रलेखा की हर हफ्ते एक लाख २५ हजार प्रतियां बिकती थीं। स्टार वीक की तीन महीने के भीतर ५५ हजार प्रतियां बिकने लगीं।   

फिल्मों की अंतिम गायिका-अभिनेत्री थी सुलक्षणा पंडित



गुरुवार ६ नवंबर २०२५ को, गायिका अभिनेत्री सुलक्षणा पंडित के निधन के साथ ही हिंदी फिल्मों की अंतिम गायिका अभिनेत्री के युग का अवसान हो गया। निधन के समय वह ७१ साल की थी।  उनके निधन की तिथि के साथ एक बड़ा संयोग यह भी है कि उनका निधन भी ठीक उसी तिथि को हुआ, जिसमे ४० साल पहले अभिनेता संजीव कुमार का हुआ था। यह भी  बड़ा संयोग था कि सुलक्षणा पंडित (१२ जुलाई) और संजीव कुमार (९ जुलाई) का जन्म भी एक ही माह में हुआ था। 





सुलक्षणा पंडित, अभिनेता संजीव कुमार से अत्यधिक प्रेम करती थी।  वह उनसे विवाह करना चाहती थी। किन्तु, संजीव कुमार ने मना कर दिया।  वह सुलक्षणा की उपेक्षा भी करने लगे।  इससे सुलक्षणा का दिल टूट गया।  वह फिल्मों से दूर होती चली गई। यद्यपि, हिंदी फिल्मों में उनकी बड़ी मांग थी।  उन्हें फिल्मों का भाग्यशाली चेहरा माना जाता था। 





सुलक्षणा पंडित पार्श्व गायिका बनना चाहती थी।  उन्होंने गायिका के रूप में, लता मंगेशकर के साथ फिल्म तकदीर में सात समंदर पर से गीत गा कर अपने गायिका जीवन का प्रारम्भ किया।  उन्होंने १९७१ में, किशोर कुमार के साथ फिल्म दूर का रही का गीत बेकरार दिल गया था। इस गीत को पहले अंतरे के बाद, सुलक्षणा पंडित ने अकेले ही गाया था। इससे सुलक्षणा पंडित की संगीत की समझ और सुरों की समझ का अनुमान लगाया जा सकता है।





सुलक्षणा पंडित अत्यंत सुन्दर थी। फिल्म निर्माताओं की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्होंने सुलक्षणा पंडित से अभिनय करने का प्रस्ताव किया।  जिसे सुलक्षणा पंडित ने स्वीकार कर लिया। उनकी नायिका के रूप में पहली फिल्म उलझन थी। इस रहस्य रोमांच से भरपूर इस फिल्म में सुलक्षणा पंडित के नायक संजीव कुमार थे।  इस फिल्म को बड़ी सफलता मिली।





उलझन का संगीत कल्याणजी आनंदजी ने दिया था।  इसके गीत बहुत लोकप्रिय हुए। किन्तु, उलझन का मात्र के गीत किशोर कुमार के साथ आज प्यारे प्यारे  से लगते हैं आप ही सुलक्षणा पंडित ने गाया था। सुलक्षणा पर फिल्माए गए शेष गीत लता मंगेशकर ने गाये थे।  इन मे अपने जीवन की उलझन को, सुबह और शाम काम ही काम लता मंगेशकर ने गाये थे। 





सुलक्षणा पंडित की अभिनय प्रतिभा का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उनकी अगली फिल्म संकल्प उन्ही पर केंद्रित थी।  फिल्म में उनके नायक सुखदेव थे। संकल्प का संगीत खय्याम ने दिया था।  इस फिल्म में सुलक्षणा पंडित ने केवल एक गीत तू ही सागर है तू ही किनारा ही गया था।  शेष गीत मुकेश और महेंद्र कपूर ने गाये थे। इस गीत के लिए सुलक्षणा पंडित को, उनकी गायिका जीवन का इकलौता फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था।  





उलझन के पश्चात्, सुलक्षणा पंडित के अभिनय जीवन को पंख लग गए।  उन्होंने अपने समय के सभी बड़े अभिनेताओं ऋषि कपूर, शशि कपूर, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना, फ़िरोज़ खान, जीतेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा, राज बब्बर, नवीन निश्चल के साथ फ़िल्में की। यहाँ तक कि उन्होंने बांगला फिल्मों के सुपरस्टार उत्तम कुमार के साथ भी एक फिल्म बंदी की। इस फिल्म के लिए हेमा मालिनी के स्थान पर सुलक्षणा पंडित को लिया गया था। सुलक्षणा पंडित की अंतिम फिल्म दो वक़्त की रोटी भी संजीव कुमार के साथ ही थी। 





सुलक्षणा पंडित ने संजीव कुमार के साथ चार फिल्मों में उलझन, वक़्त की दीवार, चेहरे पर चेहरा और दो वक़्त की रोटी ही की। बताते हैं कि संजीव कुमार भी, सुलक्षणा पंडित से प्रेम करते थे। किन्तु, वह विवाह करना नहीं चाहते थे। इसका कारण यह था कि उनके परिवार के सदस्य कम उम्र में ही स्वर्गवासी हो जाते थे। वह नहीं चाहते थे कि सुलक्षणा पंडित भी वैधव्य के दुःख को झेले।  ऐसा हुआ भी।  संजीव कुमार भी मात्र ४७ साल की आयु में ही स्वर्गवासी हो गए।  उनकी असामयिक मृत्यु के पश्चात् निराश सुलक्षणा पंडित ने भी आजीवन विवाह न करने का निर्णय ले लिया। 





आइये, सुलक्षणा पंडित को उनके गीतों और फिल्मों के लिए स्मरण करे।  उनके लोकप्रिय  गानों में जिसके लिए सबको छोड़ा, जब आती होगी याद मेरी, पप्पा जल्दी आजाना, सोमवार को हम मिले, आंखों में तुम, मन तेरी नजर में, परदेसिया तेरे देस में और अन्य शामिल हैं।  उन्होंने धरम कांटा, चेहरे पे चेहरा, संकल्प, उलझन, हेरा फेरी, अपनापन, फांसी, खानदान, गरम खून, वक्त की दीवार आदि, २५ फिल्मों में अभिनय किया।  





सुलक्षणा पंडित, हिसार (अब फतेहाबाद) के एक संगीत परिवार से थीं। महान संगीतकार पंडित जसराज उनके चाचा थे। उन्होंने नौ साल की उम्र से ही गाना शुरू कर दिया था। मुंबई में उनके निरंतर साथी उनके बड़े भाई मंधीर पंडित थे, जो स्वयं भी एक संगीतकार थे। उनके तीन भाई हैं, मंधीर, जतिन और ललित पंडित और तीन बहनें स्वर्गीय माया एंडरसन, स्वर्गीय संध्या सिंह और विजयता पंडित  थी। उनके पिता, प्रताप नारायण पंडित भी एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे।




वास्तविकता यह है कि पंडित बहनें आजीवन दुख में जीवित रही । उनकी बहन राशि पंडित (उर्फ संध्या पंडित सिंह) की हत्या कर दी गई थी। गहनों के लिए उनकी ह्त्या का आरोप  बेटे पर आरोप लगा था। किन्तु, वह बाद में उसे बरी कर दिया गया। विजयता पंडित के पति आदेश श्रीवास्तव का कैंसर से जूझने के बाद, मात्र ५१ साल की आयु में ही निधन हो गया। सुलक्षणा पंडित ने संजीव कुमार के प्रति अपने एकतरफा प्यार को बहुत गंभीरता से लिया और कई वर्षों तक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझती रहीं। वह अवसाद में जी रही थी। उनकी बहन विजयेता ने एक बार बताया था कि बड़ी बहन राशि की हत्या का समाचार सुलक्षणा को नहीं दिया गया था।   

Tuesday, 21 October 2025

नहीं रहे शोले के अंग्रेजो के जमाने के जेलर #Asrani !



'शोले' और 'चुपके चुपके' सहित 350 से अधिक फिल्मों में अपनी हास्य भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले अभिनेता गोवर्धन असरानी का सांस की लंबी बीमारी के बाद २० अक्टूबर  २०२५ को मुंबई में निधन हो गया। वह ८४ साल के थे। 





गुजराती फिल्मों से, अपने फिल्म जीवन का प्रारम्भ करने वाले गोवर्धन असरानी ने खोटा पैसा, उजाला, हम कहाँ जा रहे है और हरे कांच की चूड़ियां में छोटी भूमिकाओं के बाद, उन्हें हृषिकेश मुख़र्जी का संरक्षण मिला।  मुख़र्जी की फिल्म सत्यकाम के बाद, गुड्डी फिल्म से उन्हें पहचान मिली। असरानी ने हृषिकेश मुख़र्जी की अधिकतर फिल्मों में अभिनय करने का अवसर मिला।  उनकी उल्लेखनीय फिल्मों में मेरे अपने, बन फूल, पिया का घर, बावर्ची, परिचय, सीता और गीता, कोशिश, शोर, अनहोनी, अनामिका, अभिमान, नमक हराम, अचानक, आदि जैसी लगभग ३५० हिंदी, गुजराती और बांगला फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया। 





असरानी ने एक फिल्म हम नहीं सुधरेंगे और टीवी सीरीज कश्मकश द डाइलेमा का निर्माण किया था।  उन्होंने सात फिल्मों चला मुरारी हीरो बनने, सलाम मेमसाब, हम नहीं सुधरेंगे, दिल ही तो है और उड़ान के अतिरिक्त गुजराती फिल्म अमदावाद नो रिक्शावाला का निर्देशन किया था। 





असरानी को, इन सब भूमिकाओं से अलग पहचान मिली शोले की जेलर की भूमिका से।  हम अंग्रेजो के ज़माने के जेलर है संवाद ने असरानी को आमजान का नायक बना दिया। उनके इस चरित्र की नक़ल कर कई कलाकारों ने अपनी रोजी रोटी जमाई।  पचास साल पहले प्रदर्शित शोले के जेलर चरित्र की याद कर, गायक अभिनेता अदनान सामी ने श्रद्धांजलि देते हुए लिखा -  शोले का उनका अंग्रेजों के ज़माने के जेलर हमेशा याद रखा जाएगा! मुझे उनके साथ काम करने और समय बिताने का सौभाग्य मिला, जब मैंने उनसे अपने संगीत वीडियो 'लिफ्ट करादे' में आने का अनुरोध किया और मैं चाहता था कि वे अपने प्रसिद्ध जेलर किरदार को फिर से निभाएँ, जिसके लिए उन्होंने सहर्ष हामी भर दी। वे इतने समर्पित थे कि उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनके पहनावे का हर पहलू शोले फिल्म के मूल निर्माण से मेल खाए, यानी विग, मूंछें और वर्दी। अपने काम के प्रति उनका उत्साह और जुनून हम सभी के लिए सीखने लायक एक मिसाल था।





उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें एक प्रतिभाशाली मनोरंजनकर्ता बताया।  अक्षय कुमार ने असरानी के साथ फिल्म भागम भाग, दे धना धन और वेलकम से लेकर अभी रिलीज़ होने वाली फिल्म भूत बंगला और हैवान में अभिनय किया है। उन्होंने असरानी को, विभिन्न पीढ़ियों का मनोरंजन करने वाले अभिनेता बताते हुए, उनके निधन को फिल्म उद्योग की बड़ी क्षति बताया।

Wednesday, 15 October 2025

हिन्दी फ़िल्मों में हेलेन की जोड़ीदार अभिनेत्री मधुमती का निधन



मधुमती का जन्म 1938 में महाराष्ट्र में हुआ था और उन्होंने 1957 में एक अप्रदर्शित मराठी फिल्म से एक नर्तकी के रूप में अपना करियर शुरू किया था। एक पारसी परिवार से आने के कारण उनके जन्म का नाम हुतोक्सी रिपोर्टर था। वह भरतनाट्यम, कथक, मणिपुरी और कथकली की प्रशिक्षित नर्तकी थीं । 






जो लोग नहीं जानते, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि मधुमती ने 'आंखें', 'शिकारी', 'मुझे जीने दो', 'टावर हाउस' जैसी फिल्मों में अभिनय किया था। 







मधुमती का विवाह हिन्दी फ़िल्मों के कोरियोग्राफर और नर्तक दीपक मनोहर से हुआ था, जो उस समय के एक प्रतिष्ठित नर्तक थे। जब, माधुमती ने दीपक से शादी की, उस वह 19 वर्ष की थीं। दीपक चार बच्चों के पिता थे और उनकी पहली पत्नी का निधन हो चुका था। मधुमती दीपक से शादी करने के लिए तैयार नहीं थीं, लेकिन अपनी माँ की इच्छा के कारण उन्होंने उनसे शादी कर ली। 






भारतीय सिनेमा में अविस्मरणीय छाप छोड़ने वाली दिग्गज अभिनेत्री और कुशल नृत्यांगना मधुमती का 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मधुमती के निधन ने वास्तव में पूरे फिल्म उद्योग को सदमे में डाल दिया है। अक्षय कुमार, बिंदु दारासिंह, चंकी पांडेय, आदि अभिनेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।  







हिन्दी फिल्म दर्शक मे दशकों से मधुमती को न केवल पर्दे पर उनके उल्लेखनीय अभिनय के लिए, बल्कि नृत्य में उनकी सुंदरता और निपुणता के लिए भी जाना जाता रहा है। हेलेन जैसी निपुण नर्तकी से अक्सर तुलना की जाने वाली मधुमती ने हर भूमिका और प्रदर्शन में अपनी अलग प्रतिभा का परिचय दिया और एक ऐसी विरासत छोड़ी जो कलाकारों की पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।







1938 में महाराष्ट्र में जन्मी मधुमती को बहुत कम उम्र से ही नृत्य का शौक था। लय और गति के प्रति उनके आकर्षण ने उन्हें भरतनाट्यम, कथक, मणिपुरी और कथकली सहित कई शास्त्रीय नृत्य शैलियों का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया। वर्षों से, उनके प्रदर्शन, चाहे मंच पर हों या कैमरे पर, तकनीकी सटीकता और अभिव्यंजक भावना का एक दुर्लभ संयोजन प्रदर्शित करते थे जिसने उन्हें अपनी पीढ़ी के सबसे सम्मानित नर्तकों में से एक के रूप में खड़ा किया।

महाभारत के कर्ण पंकज धीर का देहांत !



बी.आर. चोपड़ा रचित महाकाव्य महाभारत में कर्ण की भूमिका के लिए प्रसिद्ध अभिनेता पंकज धीर का लंबे समय तक कैंसर से जूझने के बाद आज १५ अक्टूबर, २०२५ को देहांत हो गया। वह ६८ वर्ष के थे ।





पंकज धीर का जन्म ९ नवंबर १९५६ को हुआ था।  उनकी फिल्म यात्रा, १९८१ में प्रदर्शित फिल्म पूनम से प्रारम्भ हुई थी। उन्होंने एमएस सथ्यू की कन्नड़ और हिंदी भाषा में प्रदर्शित फिल्म सूखा में अनंत नाग के साथ अभिनय किया था। उन्हें हिंदी फिल्म जीवन एक संघर्ष में अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के साथ काम किया। किन्तु, उन्हें सही अर्थों में पहचान मिली बीआर चोपड़ा की श्रृंखला महाभारत से।  इस सीरीज में कर्ण की भूमिका ने उन्हें अमर कर दिया। 





महाभारत को पूरे दो वर्ष देने के  बाद,पंकज धीर पुनः फिल्मों में वापस लौटे।  उन्होंने, अक्षय कुमार की पहली फिल्म सौगंध में एक खल भूमिका की थी।  इस फिल्म के बाद, वह सलमान खान की सुपरहिट फिल्म सनम बेवफा में भी वह खलनायक थे। पंकज धीर ने सड़क, मिस्टर बांड, जाग्रति, परदेसी, अशांत, आशिक आवारा, आदि ९५ फिल्मों और सीरीज में अभिनय किया।





पंकज धीर ने, अभिनय के अतिरिक्त निर्माण और  निर्देशन के क्षेत्र में भी काम किया। भारत की पहली एडल्ट फिल्म बॉम्बे फैंटसी  के निर्देशक पंकज धीर ही थे। यह उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी।  इस फिल्म में के एन सिंह के पुत्र विभूषण सिंह नायक थे।





पंकज धीर अभिनीत फ़िल्में सौदा ज़िन्दगी का, वजूद, विवश, आदि कुछ रील बनने के बाद बंद कर दी गई। पंकज धीर ने, साड्डा मुक्कदर और सीरीज माय फादर गॉड फादर का निर्देशन भी किया।  पंकज धीर ने, गूफी पेंटल के साथ अभिनय अकादमी और शूटिंग स्टूडियो की स्थापना भी की। 





उनके बेटे निकितन धीर दक्षिण की फिल्मों के प्रतिष्ठित और स्थापित अभिनेता है।  

Monday, 6 October 2025

कन्नड़ और तमिल फिल्मों में भी अभिनय किया था संध्या ने !



मराठी और हिंदी फिल्मों की प्रतिष्ठित अभिनेत्री संध्या शांताराम का ८७ वर्ष की आयु में निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि आयुगत बीमारियों के चलते उनका स्वर्गवास हुआ। 




कोच्ची में, २७ सितम्बर १९३८ को जन्मी, विजय देशमुख को, संध्या के रूप में पुनर्जन्म दिया मराठी और हिंदी फिल्मों के विश्व प्रसिद्ध फ़िल्मकार शांताराम राजाराम वणकुद्रे ने, जिन्हे हिंदी फिल्म दर्शक वी शांताराम के नाम से पहचानते है।  





शांताराम को, अपनी मराठी फिल्म अमर भूपाली के लिए एक नए चेहरे की तलाश थी। संध्या की आवाज सुन कर शांताराम को लगा कि संध्या ही अमर भूपाली की गुणवती हो सकती है। यह फिल्म लावणी नृत्य को लोकप्रिय बनाने वाले होणाजी बाला के जीवन पर फिल्म थी। इस फिल्म को बड़ी सफलता मिली।  फिल्म की सफलता में, संध्या का महत्वपूर्ण योगदान था। 





यहाँ एक दिलचस्प तथ्य।  वी शांताराम ने तीन शादियां की थी।  उनकी पहली पत्नी का नाम विमलाबाई था। विमला से हुई एक संतान मधुरा का विवाह पंडित जसराज से हुआ था। इन दोनों के बच्चे शारंगदेव और दुर्गा जसराज ने भी संगीत और अभिनय के क्षेत्र में नाम कमाया।  प्रभात स्टूडियो की स्थापना विमलाबाई के बेटे प्रभात कुमार के नाम पर की गई। 




शांताराम ने दूसरी शादी फिल्म अभिनेत्री जयश्री से १९४१ में हुई थी।  यह विवाह १९५६ तक चला।  इन दोनों की बेटी राजश्री ने भी हिंदी फिल्मों में सफलता प्राप्त की। किन्तु, उन्हें बॉलीवुड रास नहीं आया। वह फिल्मों से सन्यास लेकर एक अमेरिकी युवक से शादी कर अमेरिका बस गई।  




जयश्री से तलाक के बाद, शांताराम ने १९५६ में ही संध्या से विवाह किया। संध्या से विवाह का कारण भी बड़ा विचित्र था। शांताराम को, संध्या की शक्ल जयश्री से मिलती लगती थी। फिल्म परछाइयां में इसे देखा जा सकता है। परछाइयां में, नायक वी शांताराम की दो नायिकाएं जयश्री और संध्या ही थी। यह इन तीनों की एकमात्र फिल्म थी। 





श्रीमती संध्या शांताराम बनने तक, संध्या ने शांताराम की तीन फिल्मों परछाइयां, तीन बत्ती चार रास्ता और झनक झनक पायल बाजे में  अभिनय कर लिया था ।  विवाह के पश्चात् भी, संध्या ने फिल्मों में अभिनय जारी रखा। उन्होंने शांताराम की लगभग सभी फिल्मों में अभिनय किया।




 

फिल्म झनक झनक पायल बाजे नृत्य प्रतिस्पर्द्धा पर केंद्रित नृत्य गीत से भरपूर फिल्म थी। इस फिल्म में संध्या ने प्रसिद्ध कत्थक नर्तक गोपीकृष्ण के साथ अभिनय किया था। गोपीकृष्ण के साथ फिल्म करने का लाभ संध्या को मिला। यह फिल्म एक नृत्यांगना की थी।  किन्तु, संध्या को नृत्य की शिक्षा नहीं मिली थी। गोपीकृष्ण ने, फिल्म में काम करते हुए ही, संध्या को नृत्य कला में पारंगत किया। यह फिल्म बड़ी हिट हुई थी तथा इस फिल्म  को श्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। 





फिल्म झनक झनक पायल बाजे के बाद, संध्या ने पति वी शांताराम के साथ उनकी गोल्डन ग्लोब अवार्ड विजेता फिल्म दो आँखे बारह हाथ में अभिनय किया।  इस फिल्म में एक दुर्घटना में नेत्र ज्योति लगभग खो चुके शांताराम की अगली फिल्म नवरंग की कल्पना का जन्म हुआ।  नवरंग को संध्या की नृत्य प्रतिभा ने सभी रंग भर दिए। 





शांताराम की हिंदी और मराठी फिल्मों के अतिरिक्त भी संध्या ने कुछ अन्य भाषा की फिल्मों में भी अभिनय किया। ऐसी ही एक फिल्म तमिल भाषा की अपराध रहस्य फिल्म मारगाथाम में, तमिल फिल्मों के प्रतिष्ठित अभिनेता शिवाजी गणेशन और अभिनेत्री पद्मिनी के साथ अभिनय किया था। किन्तु, २१ अगस्त १९५९ को प्रदर्शित यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल साबित हुई।  उन्होंने शिवजी गणेशन की एक अन्य तमिल रोमांस फिल्म कुलमगल राधाई में भी सह भूमिका की थी। 





संध्या ने एक कन्नड़ फिल्म रणधीरा कांतिरवा (१९६०) में अभिनय किया था। उस समय कन्नड़ फिल्म उद्योग की दशा शोचनीय थी। इस फिल्म में शीर्षक भूमिका कन्नड़ फिल्मो के सुपरस्टार डॉक्टर राजकुमार ने की थी। यह फिल्म पहली ब्लॉकबस्टर कन्नड़ फिल्म थी।






१९६३ में संध्या की तीसरी तमिल फिल्म इरुवर उल्लम  प्रदर्शित हुई।  एलवी प्रसाद निर्देशित यह तमिल फिल्म रोमांस और बदला से भरपूर फिल्म थी। फिल्म में शिवजी गणेशन और सरोजा देवी मुख्य भूमिका में थे।  इस प्रकार से, संध्या ने शिवजी गणेशन के साथ तीन फिल्मों में अभिनय किया। किन्तु, उन्हें तमिल फिल्मों में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इस पर वह मराठी और हिंदी फिल्मों तक सीमित हो गई। 






उनकी अंतिम मराठी हिंदी फिल्म पिंजरा थी। फिल्म का कथानक एक गांव के अध्यापक के एक नर्तकी से प्रेम करने के कथानक पर थी। संध्या के साथ इस फिल्म से, डॉक्टर श्रीराम लागू का हिंदी दर्शकों से पहला परिचय हुआ था। यद्यपि, डॉक्टर लागू की पहली फिल्म आहट थी। किन्तु, इस फिल्म के देर से प्रदर्शित होने के कारण उनकी पहली फिल्म पिंजरा कहलाई। 

Tuesday, 15 July 2025

रातों का राजा के नायक थे धीरज कुमार !





हिंदी फिल्मों के असफल किन्तु पंजाबी फिल्मों में सफल अभिनेता धीरज कुमार का ८० साल की उम्र में निधन हो गया। वह कुछ दिनों से निमोनिया से पीड़ित थे और मुंबई के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। वह वेंटीलेटर पर थे।  मंगलवार को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। 





हिंदी फिल्म रातों का राजा (१९७०) के नायक के रूप में हिंदी फिल्म दर्शकों से  अपना पहला परिचय कराने वाले धीरज कुमार ने दीदार , खोज, बहरूपिया, बहारों फूल बरसाओ, आदि फिल्मों में नायक के रूप में अभिनय किया। किन्तु, इन फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफलता नहीं मिली। तब वह सह भूमिकाओं में अपनी भूमिका खोजने लगे। 





धीरज कुमार ने हीरा पन्ना, रोटी कपड़ा और मकान, अंगारे, दो ठग, लड़की भोली भली, शराफत छोड़ दी मैंने, अमानत, पंडित और पठान, डार्लिंग डार्लिंग, आदि कुल जमा ७३ फिल्मों में अभिनय किया।  उनकी अंतिम फिल्म फैसला मैं करूंगी १९९५ में प्रदर्शित हुई थी। 





धीरज कुमार, उस समय हिंदी फिल्मों के लिए  कलाकार खोजने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करने वाली संस्था की १९६५ की प्रतिस्पर्द्धा के अंतिम तीन प्रतिभागियों में थे।  इस प्रतिस्पर्द्धा के शेष दो प्रतिभागी राजेश  खन्ना और सुभाष घई थे।  राजेश खन्ना हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार बने। धीरज कुमार और सुभाष घई ने अभिनय में नाम जमाने का प्रयास किया।  सुभाष घई ने अभिनय के क्षेत्र में असफलता के बाद निर्देशन में हाथ आजमाया और कालीचरण, विश्वनाथ, गौतम गोविंदा, क़र्ज़, क्रोधी, विधाता, हीरो, मेरी जंग, कर्मा, रामलखन, सौदागर, खलनायक, परदेस, ताल, आदि सुपरडुपर हिट फिल्मों का निर्देशन किया।  उन्होंने मुक्ता आर्ट्स की स्थापना कर लगभग ३० फिल्मों का निर्माण किया। 





सुभाष घई की तरह धीरज कुमार ने भीअपने प्रोडक्शन हाउस क्रिएटिव आईज की स्थापना की और इसके अंतर्गत के अनाम शहीदों की कथाएं कहाँ गए वह लोग और भारत के शहीद का निर्माण कर दूरदर्शन के दर्शकों को मोह लिया। धीरज कुमार ने फिल्म टीवी सीरियल  निर्माण को व्यवसाय बनाने के बाद भी स्वयं को व्यवसाई नहीं बनाया।





उन्होंने अपने प्रोडक्शन में धार्मिक सीरियल गणेश लीला का निर्माण किया। धीरज कुमार ने ॐ नमो नारायण, जय संतोषी माँ, जब तप व्रत, जैसे लोकप्रिय श्रृंखलाओं का निर्देशन किया।  टेलेविज़न दर्शकों को अदालत और अपराध से परिचित करने वाले धीरज कुमार ही थे।  उन्होंने टीवी दर्शको को बेताल और सिंहासन बत्तीसी से दर्शकों को बेताल की कहानियों को दिखाया। 





धीरज कुमार की निर्माण संस्था ने रिश्तों के भंवर में उलझी नियति, नादानियाँ, उफ़ ये नादानियाँ, तुझ संग प्रीत लगाई सजना, सवारे सबके सपने प्रीतो, नीम नीम शहद शहद, घर की लक्ष्मी बेटियां, मायका साथ जिंदगी भर का, वक़्त बताएगा कौन अपना कौन पराया, मन में है विश्वास, आदि साफ़ सुथरे परिवार के देखने वाली श्रृंखलाओं का निर्माण किया।






धीरज कुमार की इकलौती वेब सीरीज ज़ी ५ के लिए इश्क़ आजकल थी, जो उनकी श्रंखला  इश्क़ सुभान अल्ला की स्पिन ऑफ थी । 

Monday, 14 July 2025

हिंदी दर्शकों के लिए दक्षिण का पैगाम थी सरोजा देवी





भारतीय सिनेमा की वरिष्ठ फिल्म अभिनेत्री बैंगलोर सरोजा देवी उर्फ़ बी सरोजा देवी उर्फ़ सरोजा देवी का ८७ साल की दीर्घायु के पश्चात आज निधन हो गया।





सरोजा देवी ने अपने सात दशक लम्बे फ़िल्मी जीवन में २०० से अधिक कन्नड़, तेलुगु, तमिल और हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। ७ जनवरी १९३८ को जन्मी वी सरोजा देवी, कदाचित ऎसी पहली कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री थी, जिसने दक्षिण की तमिल और तेलुगु फिल्मों के अतिरिक्त हिंदी फिल्मों में भी अभिनय किया और अपना नाम बनाया।





 

सरोजा देवी ने, १७ साल की आयु में, कन्नड़ फिल्म महाकवि कलिदास  (१९५५) में विद्योत्तमा की भूमिका से फिल्म उद्योग में पदार्पण किया। इस फिल्म ने कन्नड़ फिल्म उद्योग में नया इतिहास रचा दिया। यह फिल्म तमिल और तेलुगु में रीमेक की गई। इस फिल्म की सफलता के बाद, सरोजा देवी ने कई कन्नड़ के अतिरिक्त तमिल और तेलुगु फ़िल्में की।





 

हिंदी फिल्म दर्शकों से सरोजा देवी का प्रथम परिचय, उस समय के प्रतिष्ठित और उद्देश्यपूर्ण पारिवारिक फ़िल्में बनाने वाले बैनर जैमिनी ने फिल्म पैगाम (१९५९) से कराया। एक मिल मजदूर और मालिक के टकराव वाली इस फिल्म में हिंदी फिल्मों के दिलीप कुमार, राजकुमार, मोतीलाल और जोनी वॉकर जैसी सितारों के अतिरिक्त बॉलीवुड में स्थापित हो चुकी वैजयंतीमाला नायिका थी।  सरोजा देवीं में फिल्म में वैजयंतीमाला की छोटी बहन और मोतीलाल की पुत्री की भूमिका की थी। इस फिल्म को वासन ने तमिल में पुनर्निर्मित किया।  तमिल फिल्म में मूल भूमिकाएं सरोजा देवी और वैजयंतीमाला ने ही की थी।





 

पैगाम की सफलता के पश्चात सरोजा देवी की हिंदी दर्शकों के बीच पहचान हो गई। यद्यपि , यहाँ उन्हें विशेष रूप से वैजयंतीमाला की कड़ी चुनौती मिल रही थी।




 

पैगाम के पश्चात्, सरोजा देवी की दूसरी हिंदी फिल्म, दक्षिण के एक अन्य प्रतिष्ठित बैनर प्रसाद प्रोडक्शन की फिल्म ससुराल थी।  इस फिल्म में वह राजेंद्र कुमार की नायिका थी।  यह फिल्म बड़ी हिट साबित हुई थी।




 

अभी तक दक्षिण के बैनरों की फिल्में कर रही सरोजा देवी को विशुद्ध बॉलीवुड फिल्म मिली ओपेरा हाउस। इस हत्या रहस्य फिल्म के निर्माता ए ए नाडियाडवाला थे। फिल्म के लेखक निर्देशक प्यारेलाल संतोषी उर्फ़ पीएल संतोषी थे। अजित के साथ उनकी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ ख़ास नहीं कर पाई।





 

१९६२ में फिल्म हांगकांग प्रदर्शित हुई। फ़िरोज़ ईरानी निर्देशित अपराध फिल्म हांगकांग में सरोजा देवी के नायक अशोक कुमार थे। इस फिल्म का कथानक हांगकांग में स्मगलरो को पकड़ने गए पुलिस अधिकारी पर केन्द्रित था ।  यह भूमिका अशोक कुमार कर रहे थे।




 

सरोजा देवी की अन्य प्रमुख हिंदी फिल्मों में परीक्षा, प्यार किया तो डरना क्या, बेटी बेटे, दूज का चाँद, प्रीत न जाने रीत, दिलवर, हरी दर्शन, आदि थी।




 

कन्नड़ फिल्मों की पहली सुपरस्टार अभिनेत्री सरोजा देवी को हिंदी फिल्मों में अधिक सफलता नहीं मिल सकी।  किन्तु, तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में वह शीर्ष की अभिनेत्रियों में शामिल रही। उन्होंने एमजी रामचंद्रन के साथ २६ तमिल फिल्म फिल्मों में हिट जोड़ी बनाई।  वह इकलौती ऎसी अभिनेत्री थी जिन्होंने १९५५ से लेकर १९८४ तक निरंतर १६१ फिल्मों में मुख्य अभिनेत्री की भूमिका की। उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

Tuesday, 14 February 2023

आज जन्मी थी Venus of Indian Cinema Madhubala



‘वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा' और 'द ब्यूटी ऑफ ट्रेजेडी’ के उपनामों से संबोधित मधुबाला का आज जन्मदिन है. प्यार के उत्सव के दिन 1933 में जन्मी मुमताज़ जहाँ बेगम देहलवी को मधुबाला के नाम से अपने परिवार की आर्थिक सहायता करने के लिए 9 साल की उम्र में कैमरा के सामने उतरना पडा । वह एक ऐसी अभिनेत्री थी, जो बहुत छोटे फ़िल्मी जीवन के बाद भी प्रसिद्धि के शीर्ष पर पहुंची. उन्होंने ७० फिल्मों में अभिनय किया.




यह भारतीय सिनेमा की फर्स्ट लेडी फिल्म निर्माता, अभिनेत्री और निर्देशक देविका रानी थीं, जिन्होंने युवा मताज़ जहाँ बेगम में असीमित अभिनय क्षमता देखी. उन्होंने ही मधुबाला को परदे का नाम दिया । मधुबाला ने १९४७ की फिल्म नील कमल में राज कपूर के साथ अपनी पहली मुख्य भूमिका निभाई, इस फिल्म में उनका मुमताज के नाम से अंतिम परिचय कराया गया था.





मधुबाला ने 36 साल के जीवन काल में महल, अमर, मिस्टर एंड मिसेज '55, चलती का नाम गाड़ी, हावड़ा ब्रिज, बरसात की रात और मुगल ए आजम सहित कई यादगार फिल्में कीं। देवानंद के साथ शराबी उनकी अंतिम फिल्म थी. ज्वाला को उनकी मृत्यु के दो साल बाद प्रदर्शित हुई थी. पर फिल्म फ्लॉप हुई.




23 फरवरी 1969 को, अपने 36वें जन्मदिन के नौ दिन बाद लम्बी बीमारी से जूझने के बाद, उनका दुखद निधन हो गया. मृत्यु से पहले तक असीम कष्ट झेलने वाली मधुबाला का फिल्मो के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ था. वह फिल्म फ़र्ज़ और इश्क से अपने फिल्म करियर में निर्देशक को जोड़ना चाहती थी. किन्तु मृत्यु ने उनकी इच्छा पूरी नहीं होने दी. उन्हें श्रद्धांजलि.

Tuesday, 15 November 2022

वरिष्ठ तेलुगु सुपरस्टार कृष्णा का निधन !

 


तेलुगु फिल्मों के युवा सुपरस्टार महेश बाबू के फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता पिता गट्टामनेनी शिव राम कृष्णामूर्ति का ७९ साल की आयु में हृदयाघात से देहांत हो गया.



वह १९६०, १९७० और १९८० के दशक की तेलुगु फिल्मों के सुपरस्टार कहलाते थे. उन्होंने ३५० से अधिक तेलुगु फिल्मों में अभिनय किया. उनके पद्मालय स्टूडियो से कई हिट हिंदी फिल्मों का निर्माण भी हुआ.



कृष्णा के नाम, दो अभिनेत्रियों विजय निर्मला के साथ ४८ और जया प्रदा के साथ ४७ फिल्में करने का कीर्तिमान लिखा हुआ है.



कृष्णा ने, तेलुगु फिल्मों में कई नई तकनीक और जोनर के साथ फिल्मों का परिचय कराया. काऊबॉय फिल्मों की शुरुआत भी कृष्णा ने की. पहली सिनेमास्कोप फिल्म अल्लूरी सीताराम राजू के निर्माता भी कृष्णा थे. पहली ईस्टमैन कलर फिल्म ईनाडु, पहली ७०एमएम् फिल्म सिंहासन, पहली डीटीएस फिल्म वीर लेवारा से कृष्णा का नाम जुड़ा हुआ था. उन्होंने तेलुगु भाषा की पहली स्पाई फिल्म गुदाचारी ११६ (१९६६) अभिनय करने के बाद जेम्स बांड ७७७ (१९७१), एजेंट गोपी (१९७८), रहस्य गुदाचारी (१९८१) और गुदाचारी ११७ (१९८९) जैसी स्पाई थ्रिलर फिल्मों में भी अभिनय किया.



उन्होंने अपने बेटे महेश बाबु को लेकर छः फिल्मों का निर्देशन किया. उन्होंने कुल १७ फीचर फिल्मों का निर्देशन किया. वह कांग्रेस पार्टी के टिकट से लोकसभा के लिए भी चुने गए.



कृष्णा का आकस्मिक निधन, अभिनेता महेश बाबु के लिए इस साल तीसरा आधात है. इस साल जनवरी में उनके भाई रमेश बाबु और सितम्बर में उनकी माँ इंदिरा देवी का निधन हो गया था. ईश्वर महेश बाबु को इन आघातों को सहने की शक्ति दे. कृष्णा को श्रद्धांजलि.

Sunday, 6 February 2022

मेरी आवाज़ ही पहचान है- लता मंगेशकर



चार साल पहले, १६ जनवरी २०१५ की सुबह सुबह सोशल मीडिया पर यह खबर वायरल हो रही थी  कि लता मंगेशकर नहीं रही। उनकी इस कथित मौत की खबर ने, लता मंगेशकर के प्रशंसकों को सदमे में डाल दिया। वह उनकी खैरख्वाही की जानकारी के लिए अपने अपने स्रोतों से संपर्क करने लगे। सोशल मीडिया पर, शोक संवेदना संदेशों की बाढ़ सी आ गई। खुद लता मंगेशकर के घर पर भी फ़ोन कॉल आने शुरू हो गए। इससे हैरान हो कर लता मंगेशकर के शुभचिंतकों को खुद ट्वीट कर अपनी सलामती से अपने प्रशंसकों को सूचित करना पडा। लेकिन....!



दीनानाथ की सबसे बड़ी बेटी
लता मंगेशकर का जन्म, ब्रिटिश शासन के इंदौर राज्य में इंदौर में २८ सितम्बर १९२९ को हुआ था। वह अपने पिता गायक, नर्तक और अभिनेता दीनानाथ मंगेशकर की दूसरी शादी से उत्पन्न पांच बच्चों में सबसे बड़ी थी। लता मंगेशकर को, पांच साल की उम्र से ही, उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर ने संगीत दीक्षा देनी शुरू कर दी थी। लता ने, इसके अलावा अमान अली खान साहेब और अमानत खान से भी संगीत की शिक्षा ली।



काफी पतली और ऊंची आवाज़ के कारण रिजेक्ट
१९४० के दशक में, लता मंगेशकर ने, पार्श्व गायिकी में भाग्य आजमाने का फैसला किया। कहते हैं कि यह उनका गलत फैसला था। लेकिन, यह लता की मज़बूरी थी। पिता का देहांत हो जाने के बाद, परिवार की जिम्मेदारी किशोरवय की लता के कन्धों पर आ गई। उस समय नूरजहाँ और शमशाद बेगम का ज़माना था। इनकी नाक से निकली आवाज़ के सब दीवाने थे। इसलिए, उस समय कुछ प्रोजेक्ट से इसलिए उन्हें बाहर होने पडा कि उनकी आवाज़ काफी पतली और ऊंची पिच वाली है। उनकी आवाज़ को कर्ण-कटु बताया गया। १९४२ से १९४८ के बीच लता मंगेशकर को फिल्मो में अभिनय करने के लिए विवश होना पड़ा। उन्होंने आठ हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया। उनकी बतौर पार्श्व गायिका पहली फिल्म मराठी भाषा में किती हसाल (१९४२) थी। पर बाद में उनके गाये इस गीत को फिल्म से निकाल दिया गया।



गुलाम हैदर ने दिया ब्रेक
लता मंगेशकर को पहला ब्रेक संगीतकार गुलाम हैदर ने दिया। फिल्म थी मजबूर (१९४८) । अगले ही साल, यानि १९४९ में लता मंगेशकर की चार फ़िल्में महल, दुलारी, बरसात और अंदाज़ रिलीज़ हुई।  महल के गीतों ने लता मंगेशकर की आवाज़ की बदौलत तहलका मचा दिया। उनकी इन चारों फिल्मों में सभी गीत ज़बरदस्त हिट हुए। लता मंगेशकर भारत की स्वर कोकिला के तौर पर हमेशा हमेशा के लिए स्थापित हो गई। हालाँकि, शुरुआत में, नूरजहाँ से प्रभावित लता मंगेशकर ने नूरजहाँ को नक़ल करने की कोशिश की। लेकिन बाद में अपनी शैली में गायन शुरू कर दिया। इसके बाद से, लगातार चालीस साल तक, लता मंगेशकर ने फिल्म इंडस्ट्री में एकछत्र राज्य किया। उनकी आवाज़ के सामने शारदा, वाणी जयराम, सुमन कल्यानपुर, आदि जैसे नाम टिक नहीं सके। इसे लेकर उन पर एकाधिकार स्थापित करने का आरोप भी लगाया गया। १९८० के दशक के बाद, लता मंगेशकर ने गीत गाने कम कर दिए।



सभी समकालीन गायकों के साथ गायन
लता मंगेशकर ने अपने पूरे गायन करियर में, १४ भाषाओं के ३० हजार से ज्यादा गीत गाये हैं। इसके लिए उन्हें इतिहास की सबसे ज्यादा गीत गाने वाली गायिका माना जाता है। यह गिनेस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है। लता मंगेशकर ने, हर पीढी के पुरुष और स्त्री  गायक-गायिकाओं के साथ यह गीत गाये। उन्होंने १९४० से १९७० के मध्य सुरैया, मोहम्मद रफी, आशा भोसले, उषा मंगेशकर, किशोर कुमार, मुकेश, मन्ना डे, हेमंत कुमार और महेंद्र कपूर के साथ गीत गाये। लता मंगेशकर के पुरुष सह गायकों में १९७६ में मुकेश और १९८० के दशक में पहले १९८० में मोहम्मद रफ़ी की मृत्यु हो गई और उसके बाद, १९८७ में किशोर कुमार भी चल बसे। इसके बाद भी लता मंगेशकर ने शब्बीर कुमार, शैलेन्द्र सिंह, नितिन मुकेश, मनहर उधास, अमित कुमार, मोहम्मद अज़ीज़, विनोद राठौर और एसपी बलासुब्रह्मन्यम के साथ गीत गाये। १९९० के दशक में, पंकज उधास, मोहम्मद अज़ीज़ के अलावा अभिजीत, उदित नारायण, कुमार शानू और सुरेश वाडकर के साथ लता के गाये गीत सुनने को मिले. २००५ और २००६ में लता मंगेशकर का पार्श्व गायन सोनू निगम अरु उदित नारायण के साथ मिलता है। इस दौर में उन्होंने जगजीत सिंह और गुरदास मान के साथ भी गीत गाये।



क्यों सिर्फ एक दिन स्कूल गई ?
क्या आप जानते हैं कि लता मंगेशकर को दुनिया के छः देशों से डॉक्टरेट की डिग्री मिली थी। लेकिन, इन छः विश्वविद्यालयों की डॉक्टर लता मंगेशकर ने सिर्फ एक दिन स्कूल का मुंह देखा था। इसके बाद वह कभी स्कूल नहीं गई। हालाँकि, उन्होंने हिंदी और मराठी के अलावा भी कई भाषों के गीत गाये। क्या आप जानना चाहते हैं कि लता मंगेशकर एक दिन के अलावा स्कूल क्यों नहीं गई !दरअसल, लता मंगेशकर के चार भाई-बहन हैं। इनमे, उनके बाद आशा भोसले एक बहन हैं। लता दीदी आशा भोसले को बहुत प्यार करती थी। इसलिए वह उन्हें हर समय साथ रखती थी। स्कूल में भी वह आशा को साथ ले जाती थी। स्कूल में उन्हें इसके लिए मना किया गया। इसलिए लता मंगेशकर ने अगले दिन ही स्कूल को अलविदा कह दिया।



लता मंगेशकर का सम्मान
लता मंगेशकर ने अपने गायिकी के दौर में कई पुरस्कार और सम्मान पाए। उन्हें, भारत सरकार ने भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया। उन्हें फ्रांस की सरकार ने ऑफिसर ऑफ़ द फ्रेंच लीजन ऑफ़ ऑनर से सम्मानित किया। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड ने १५ बार सम्मानित किया। उन्हें अपनी श्रेष्ठ गायिकी के लिए ४ बार फिल्मफेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। ढेरों पुरस्कार जीतने वाली लता मंगेशकर के नाम पर पुरस्कारों की स्थापना भी की गई। मध्य प्रदेश सरकार ने १९८४ में लता मंगेशकर अवार्ड की स्थापना की। बाद में, १९९२ में महाराष्ट्र सरकार ने भी लता मंगेशकर अवार्ड की स्थापना की।



बेसुरी नहीं होती कम्बख्त !
लता मंगेशकर की गायिकी की श्रेष्ठता का अंदाजा उनके बारे में दिग्गजों की टिप्पणियों से लगाया जा सकता है। उस्ताद बड़े गुलाम अली खान कहा करते थे, “कमबख्त कभी बेसुरी न होती।दिलीप कुमार तो उन्हें अपनी छोटी बहन मानते थे और खुदा की कुदरत का करिश्मा बताते थे।



४ फिल्मों का निर्माण ५ में संगीत
लता मंगेशकर ने चार फिल्मों का निर्माण भी किया था। उनके द्वारा निर्मित चार फिल्मों में एक मराठी फिल्म थी। तीन हिंदी फिल्मों में झांझर का निर्माण उन्होंने सी रामचंद्र के साथ किया था। दो हिंदी फिल्मों में कंचन गंगा और लेकिन थी। लता मंगेशकर ने पांच मराठी फिल्मों का संगीत भी तैयार किया था।



जब रो पड़े नेहरू
यह वाकया १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद का है। इस युद्ध में भारत को चीन से करारी हार का सामना करना पड़ा था। पूरा देश शर्म, दुःख और रोष में डूबा हुआ था। उस समय प्रदीप ने श्रद्धांजलिस्वरुप एक गीत ऐ मेरे वतन के लोगों लिखा था। इसे सी रामचंद्र ने संगीतबद्ध किया था और लता मंगेशकर ने गाया था। एक सभा में, तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी में, लता मंगेशकर ने गाया था। कहा जाता है कि इस गीत को सुन कर नेहरू की आँखों में आंसू आ गए थे।



लता मंगेशकर पर टीवी सीरियल और फिल्म
लता मंगेशकर और आशा भोसले के संबंधों पर एक सीरियल मेरी आवाज़ ही पहचान है बनाया गया था।  यह सीरियल २०१६ में एंड टीवी से प्रसारित हुआ था।  इस शो में अमृता राव और दीप्ति नवल ने लता मंगेशकर और अदिति वासुदेव और ज़रीना वहाब ने आशा भोसले के रील लाइफ किरदार किये थे।  इस शो के ९५ एपिसोड्स में, लता मंगेशकर के जीवन पर काफी प्रकाश पड़ता था। 




सोशल मीडिया पर सक्रिय लता मंगेशकर
नब्बे साल की लता मंगेशकर किसी युवा ट्विट्टेराती की तरह सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी। उनके ट्विटर अकाउंट पर नियमित सन्देश अपलोड होते थे। किसी फ़िल्मी हस्ती के जन्मदिन और पुण्य तिथि पर वह अपना सन्देश डालना नहीं भूलती थी। वह भूले बिसरे संगीतकार दत्ता दवाजेकर की स्मृति पर भी सन्देश देती है तो सचिनदेव बर्मन के संगीत को भी याद करती थी। किसी के पुरस्कार-सम्मान जीतने और निधन की खबर पर बधाई और शोक संदेशों में लता मंगेशकर की वाल आगे रहती थी। वह राजनीतिक हस्तियों को भी याद करती। पंडित जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गाँधी सरदार पटेल की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर लता जी के सन्देश देखे जा सकते हैं तो वह प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी बधाई देती है। राहुल गांधी की भी उपेक्षा नहीं करती।