Thursday, 2 April 2026

#Queen2 : #KanganaRanaut की रानी की वापसी !



बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री से सांसद बनी, अभिनेत्री कंगना रनौत की तो नहीं, किन्तु उनकी क्वीन की वापसी होने जा रही है। कंगना की विगत फिल्म  २०२५ में प्रदर्शित इमरजेंसी थी।  उसके बाद से उनकी किसी नई फिल्म की अधिक चर्चा नहीं हुई। 





अब, स्रोतों से ज्ञात हुआ है कि कंगना रनौत की रानी वापसी करने जा रही है। कंगना रनौत ने २०१४ में प्रदर्शित विकास बहल निर्देशित फिल्म क्वीन में रानी की भूमिका की थी। रानी का चरित्र एक मध्यमवर्गीय परिवार से था। वह अपना हनीमून यूरोप में मनाना  चाहती थी।  किन्तु, ठीक शादी के मौके पर उसका मंगेतर उससे विवाह करने से मना कर देता है। इस घटना से रानी का दिल टूट जाती है। किन्तु, वह तय करती है कि वह अपनी पूर्व निर्धारित हनीमून ट्रिप पूरी करेगी।  





फिल्म क्वीन का यह चरित्र सशक्त था। आत्मनिर्भर और दृढ निश्चय वाली स्त्री का सशक्त चरित्र। रानी का चरित्र काफी कुछ कंगना रनौत की वास्तविक छवि के अनुरुरूप था।  इसलिए फिल्म क्वीन को बड़ी सफलता मिली। 





क्वीन के तीन साल पूर्व, कंगना रनौत की फिल्म तनु वेड्स मनु (२०११) प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म में कंगना रनौत ने, कानपुर में रहने वाली मध्यमवर्गीय परिवार की तनूजा त्रिवेदी उर्फ़ तनु की भूमिका की थी। इस फिल्म ने कंगना रनौत को एक तेज तर्रार लड़की तनूजा की छवि ओढ़ा दी थी। यह फिल्म फिल्मफेयर पुरस्कारों के लिए नामित हुई थी। किन्तु, कंगना को फिल्म के लिए कोई पुरस्कार नहीं मिला। 





क्वीन ने, कंगना की तनूजा को रानी बना दिया था। दोनों चरित्र काफी हद तक एक दूसरे को सहयोग करने वाले थे। इसी के परिणामस्वरुप, कंगना रनौत को तनु वेड्स मनु की २०१५ में प्रदर्शित सीक्वल फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स ने फिल्मफेयर पुरस्कार तो दिलाया ही, वह अपना तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने में भी सफल हो गई।  





वास्तविकता यह है कि कंगना रनौत को फिल्म फैशन में श्रेष्ठ सह अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल जाने के बाद,  श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार एक साल पहले ही फिल्म क्वीन से मिल चुका था।  तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की दोहरी भूमिका के लिए वह अपना तीसरा राष्ट्रिय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कर रही थी।





कंगना रनौत को श्रेष्ठ अभिनेत्री बनाने वाली विकास बहल की फिल्म क्वीन का की सीक्वल फिल्म क्वीन २ की शूटिंग अप्रैल के अंतिम सप्ताह से प्रारम्भ होगी।  पता चला है कि इस फिल्म का पहला कार्यक्रम मुंबई में, एक शहर का सेट लगा कर  प्रारम्भ किया जायेगा।  यह कार्यक्रम लगभग एक माह का है।  इसके बाद, फिल्म की पूरी यूनिट भारत के मेट्रो शहरों में शूटिंग पूरी करेगी। 





बताया जा रहा है कि जहाँ क्वीन की पृष्ठभूमि विदेशी लोकेशन वाली थी। क्वीन २ की लोकेशन भारत की ही होंगी। क्वीन २ की रानी अब अपनी पहचान के लिए भारत के शहरों में घूमेंगी। यह सीक्वल रानी के शहरी अवतार पर केंद्रित होगा, जिसमें उसके जीवन के एक नए दौर और व्यक्तिगत विकास को दिखाया जाएगा। कहानी में रानी की पूरे भारत की यात्राओं को दिखाया जाएगा, जिसमें कहानी का मुख्य विषय आज़ादी और आत्म-बोध होगा। यह शूटिंग तीन माह में पूरी हो जाएगी।





यह भी पता चला है कि फिल्म कंगना रनौत ही एकमात्र ऐसी कलाकार होंगी जो इस फिल्म में वापसी कर रही हैं, जबकि अन्य सहायक कलाकारो राजकुमार राव और लिसा हेडन के स्थान पर नए चरित्रों को गढ़ा गया है तथा इन्हे नए कलाकार निबाहेंगे।  क्वीन २ के अतिरिक्त कंगना रनौत की दो अन्य परियोजनाएं भी दिलचस्प है।  क्वीन २ की शूटिंग के बाद, कंगना रनौत २०११ में प्रदर्शित फिल्म तनु वेड्स मनु और २०१५ में प्रदर्शित फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स की तीसरी कड़ी तनु वेड्स मनु ३ की शूटिंग प्रारम्भ कर देंगी। 





क्वीन २ और तनु वेड्स मनु ३ के अतिरिक्त कंगना की कुछ और फ़िल्में भी पाइपलाइन में हैं।इनमें से एक फिल्म भारत भाग्य विधाता इस दृष्टि से विशेष हैं कि  इस फिल्म की निर्माता स्वयं कंगना रनौत है। बताते हैं कि यह फ़िल्म २६/११ के मुंबई आतंकी हमलों पर आधारित है, जिसमें कामा हॉस्पिटल के स्टाफ़ पर फ़ोकस किया गया है। 





इस के अतिरिक्त कंगना रनौत अपनी फिल्म तनु वेड्स मनु के मनु आर. माधवन के साथ सर्कल नाम की फ़िल्म भी कर रही है।  इस फिल्म को ए.एल. विजय निर्देशित कर रहे है। ए  एल विजय ने, कंगना रनौत की फिल्म अभिनेत्री से तमिलनाडु की मुख्य मंत्री बनी जे जयललिता पर फिल्म हिंदी तमिल फिल्म थलेवि का निर्देशन किया था। ज्ञात हुआ है कि भारत भाग्य विधाता और सर्कल को इसी साल रिलीज़ किया जा सकता है।  

#Ramayan का #teaser भव्यता है पर भाव नहीं !



निर्माता नामित मल्होत्रा की रामायण महाकाव्य पर, दो भागों में दो साल में प्रदर्शित होने जा रही फिल्म रामायण पार्ट १ की झलकियां कुछ देर पूर्व पत्रकारों के सामने प्रदर्शित की गई।   यह झलकियां २ मिनट ३८ सेकंड लम्बे वीडियो में सहेजी गई है।  मैंने इन झलकियों को सोशल मीडिया के माध्यम से ही देखा है। 






इस फिल्म के विषय में बताया जा रहा है कि  फिल्म का बजट अवतार के बजट २३५ मिलियन डॉलर से ४० मिलियन डॉलर अधिक में बनाई गई है।  निर्माता नामित मल्होत्रा का कथन है कि उनकी इस फिल्म के दोनों भागों को ४००० करोड़ के बजट से बनाया जा रहा है।  इस फिल्म के काम में दुनिया भर के १० हजार लोग लगे हैं। इस महाकाव्य को आईमैक्स प्रभाव के साथ बनाया गया है। इस त्रिआयामी फिल्म के लिए ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त कंपनी डेंग और ओएनईजी ने प्रभावशाली वीएफएक्स बनाया है। फिल्म  का संगीत भारतीय संगीतकार एआर रहमान के साथ हॉलीवुड के दो ऑस्कर जीत चुके  हेंस ज़िम्मर ने तैयार किया है। 





फिल्म के तकनीकी पक्ष पर, सोशल मीडिया पर झलकियां देख कर कुछ नहीं कहा जा सकता है।  क्योंकि, पार्श्व संगीत का प्रभाव बड़े परदे पर, श्रेष्ठ तकनीक से सजे छविगृहों में ही स्पष्ट होता है। लैपटॉप या कंप्यूटर पर यह प्रभाव नहीं आ सकते।  किन्तु, दृश्य प्रभाव तो आंका ही जा सकता है।






मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर फिल्म बनाना सरल नहीं। इसमें न केवल अभिनेता अभिनेत्रियों, बल्कि लेखक और निर्देशक की भावनाएं भी सम्मिलित होनी चाहिए।  पटकथा लेखक की सशक्त लेखनी और निर्देशक की कल्पनाशीलता फिल्म का प्रभाव बढ़ा सकती है। इस दृष्टि से भी टीज़र में कोई संवाद नहीं है। केवल छोटी छोटी दृश्यावलियां है। इनका प्रभाव बड़े परदे पर ही पता चल सकता है। 






रह जाती है फिल्म के नायक नायिका और अन्य पात्रों को करने वाले एक्टरों की बात तो यह पक्ष महत्वपूर्ण है।  झलकियों में अभिनेता रणबीर कपूर के राम की झलकियां ही दिखाई गई है।  टीज़र के अंत में रावण का चरित्र पार्श्व से दिखाई देता है।  इस दृष्टि से रणबीर कपूर के राम पर ही कुछ कहा जा सकता है। रणबीर कपूर ने कोई संवाद नहीं बोला है।  उन्हें लॉन्ग शॉट या क्लोज अप में ही देखा गया। लगभग एक मिनट से कुछ अधिक के अंतराल में वह अधिक प्रभावित नहीं कर पाते।  बिलकुल सामान्य लगते हैं।  जबकि उनके राम में भव्यता और प्रभावित कर पाने की क्षमता होनी चाहिए। 






रामायण में अन्य भूमिकाओं में सीता के रूप में, तमिल फिल्म अभिनेत्री तथा हिंदी पेटी में द कश्मीर फाइल्स के कश्मीर में मुसलमानों द्वारा कश्मीरी  के कत्लेआम और भगाये जाने को गौ मांस के आरोप के कारण लिंच किये जाने वाले मुसलामनों से कर के विवादित शोहरत पाई अभिनेत्री साई पल्लवी है। निश्चित रूप से उनकी अभिनय क्षमता पर संदेह किये जाने के कारण नहीं है। किन्तु, चेहरे से वह सीता के चरित्र के लिए बिलकुल अनुपयुक्त लगती है।  इस फिल्म में रावण की भूमिका में कन्नड़ फिल्म अभिनेता और केजीएफ फिल्मों के अभिनेता यश है। हनुमान की भूमिका अपने ढाई किलों के मुक्के वाले सनी देओल है। इस टीज़र में इनमे से किसी की झलकियां नहीं है।






इतनी धूमधाम और चर्चाओं के बीच अनावृत इस टीज़र का क्या प्रभाव पड़ता है ? जानने के लिए आपको भी फिल्म की झलकियां देखनी होंगी।  किन्तु, मैं इतना कह सकता हूँ कि इतने शोरशराबे के साथ जारी किया गया फिल्म का टीज़र भव्य तो है, किन्तु उसमे भाव नहीं है। राम के चरित्र और उनके काल की सुगंध झलकियों में नहीं है। टीज़र से निर्देशक नितेश तिवारी के समर्पण और भक्ति का पता नहीं चलता। जबकि, धर्मिक फिल्मों के लिए यह अति आवश्यक है। फिल्म का टीज़र भव्य हो सकता है, किन्तु, इसमें भाव नहीं है। दर्शकों कोई कुछ 'फील' नहीं होता। 






एक बात और।  मर्यादा पुरुषोत्तम राम में मर्यादा है, वह अप्रतिम योद्धा है।  उन्होंने रावण जैसे महान विद्वान और वीर को भी परास्त किया था। लेकिन, यकीन जानिए वह किसी भी प्रकार से हॉलीवुड के सुपरहीरो ही-मैन : मास्टर्स ऑफ़ द यूनिवर्स जैसे नहीं थे। इस टीज़र में उन्हें ही - मैन जैसा पोज़ दिया गया है। किसलिए ! 

Wednesday, 1 April 2026

बदलता रहा है #Bollywood की #Spy फ़िल्मों का चेहरा!




यद्यपि, धुरंधर फिल्मों के निर्देशक आदित्य धर ने खंडन कर दिया है कि वह धुरंधर ३ बनाने जा रहे है। इससे स्पष्ट है कि धुरंधर ३, हालफिलहाल नहीं बनने जा रही है। किन्तु, इस फिल्म ने दर्शकों में ऎसी ही श्रेष्ठ स्पाई फिल्मों की चाहत पैदा कर दी है। वह अपने, विशेष रूप से बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं से ऎसी ही यथार्थवादी जासूसी फ़िल्में बनाते देखना चाहते है। क्या ऐसा होने जा रहा है ? क्या बदले यथार्थ के निकट जासूसी फिल्मे दर्शकों को देखने को मिलेंगी ?




बॉलीवुड में जासूसी फ़िल्मों का जॉनर काफ़ी बदल गया है। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों की शैली में समय के साथ बदलाव होता रहा है। बॉलीवुड, कभी-कभार बनने वाली कोल्ड वॉर-युग की थ्रिलर फ़िल्मों और १९७०-८० के दशक की आँखें या द हीरो: लव स्टोरी ऑफ़ अ स्पाई जैसी एक्शन फ़िल्मों से आगे बढ़कर, २०१० के दशक के मध्य से एक प्रमुख और अति लोकप्रिय जॉनर बन गया है।





अब इसमें देशभक्ति, भू-राजनीति (अक्सर भारत-पाकिस्तान तनाव या आतंकवाद-विरोधी मुद्दे), निजी बलिदान, और अलग-अलग मात्रा में यथार्थवाद और मसाला मनोरंजन का मेल देखने को मिलता है। यह तेज़ी असल दुनिया की घटनाओं से जुड़ी है, जैसे उरी हमले पर उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक, आदि। राष्ट्रीय सुरक्षा पर बढ़ती चर्चा के साथ ही, बड़े पर्दे पर ज़बरदस्त एक्शन और ओटीटी पर गहरी कहानियों के लिए दर्शकों की बढ़ती चाहत भी इसकी एक वजह है।





इसमें कोई संदेह नहीं कि २०१० से पूर्व भी जासूसी कहानियों वाली फिल्मों का निर्माण किया गया है। किन्तु, अधिकतर एजेंट विनोद और फ़र्ज़ जैसी एक्शन, ग्लैमर या कॉमेडी फ़िल्में होती थीं। इन फिल्मों में गहराई की कमी होती थी। यह फ़िल्में जासूसी की बारीकियों के बजाय विदेशी लोकेशन के प्रदर्शन और गैजेट्स पर अधिक ध्यान देती थीं।





जासूसी फिल्मों का आधुनिक पुनरुद्धार नीरज पांडे की अक्षय कुमार की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म बेबी (२०१५) बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों को अहम मोड़ देने वाली फिल्म कही जा सकती है। यह फिल्म एक जासूस और मिशन का ज़मीनी और बेहतरीन चित्रण करने वाली थी। फिल्म में आतंकवाद-विरोधी टीम दिखाई गई थी । इसने रणनीति, नैतिक दुविधाओं, और बिना किसी फालतू रोमांस या गानों के सीधे-सीधे एक्शन पर ज़ोर दिया। इसने ऐसी फ़िल्मों की एक लहर के लिए रास्ता बनाया, जो जासूसी की मानवीय कीमत को दिखाती हैं।




विवाद के बावजूद, मेघना गुलज़ार की फ़िल्म राज़ी अपनी भावनात्मक गहराई, नैतिक दुविधाओं, और एक महिला जासूस के अंदरूनी संघर्ष पर ध्यान देने की वजह से सबसे अलग है। यह 'दुश्मन' को भी एक इंसान के तौर पर दिखाती है और शांत देशभक्ति का जश्न मनाती है। यद्यापि, किताब के मुकाबले फ़िल्म में कुछ चीज़ों को नरम दिखाने के लिए इसकी आलोचना भी हुई थी। आलिया भट्ट की एक्टिंग ने शारीरिक स्टंट्स के बजाय जासूसी के मानसिक दबाव को ज़्यादा अच्छे से उभारा।





इसी प्रकार की अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में २०१३ ने प्रदर्शित जॉन अब्राहम की फिल्म मद्रास कैफ़े राजनीतिक हत्याओं पर अपनी बेबाक राय और रिसर्च-आधारित यथार्थवाद के लिए स्मरणीय है। २०१३ में ही प्रदर्शित निखिल अडवाणी की फिल्म डी-डे कमांडो-शैली के मिशन २०१५ में प्रदर्शित फिल्म फ़ैंटम बदले की थीम पर आधारित होने के लिए उल्लेखनीय बन जाती है।




यश राज फ़िल्म्स ने, जब २०१२ में सलमान खान के साथ जासूसी फिल्म एक था टाइगर का निर्माण किया था, तब उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि वह एक स्पाई यूनिवर्स का निर्माण करने जा रहे है। २०१७ में प्रदर्शित एक था टाइगर की सीक्वल फिल्म टाइगर ज़िंदा है ने इसे स्थापित कर दिया। बाद में वॉर और पठान ने इस यूनिवर्स को विस्तृत कर दिया। वॉर (२०१९) में ऋतिक रोशन ने एक बागी एजेंट कबीर की भूमिका की थी। इस यूनिवर्स की फिल्म पठान (२०२३) ने शाहरुख खान की रॉ एजेंट के रूप में इंडस्ट्री में वापसी भी करवा दी। यद्यपि, बाद में प्रदर्शित फिल्म टाइगर ३ और वॉर २ के साथ इस यूनिवर्स का विस्तार हुआ। किन्तु, इन फिल्मों में ज़बरदस्त स्टंट, विदेशी लोकेशन, बड़े सितारों की मौजूदगी और दूसरी फिल्मों के किरदारों के कैमियो पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया था । ऐसी फिल्में आम दर्शकों को तो पसंद आ सकती हैं, किन्तु, इनकी इस बात के लिए आलोचना होती है कि ये कहानी के सार के बजाय सिर्फ़ स्टाइल पर ज़्यादा ध्यान देती हैं। इस कड़ी में, यशराज फिल्म्स की महिला-प्रधान स्पाई फिल्म अल्फा में आलिया भट्ट और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। यह फिल्म इसी साल प्रदर्शित हो सकती है।





इस जॉनर में अब दो मुख्य धाराएँ देखने को मिल रही हैं- ज़मीनी/यथार्थवादी थ्रिल। ये फिल्में सच्ची घटनाओं या असल खुफिया ऑपरेशन्स से प्रेरित होती हैं। इनमें नैतिक दुविधाओं, मानसिक तनाव और सीमा पार की साज़िशों पर खास ज़ोर दिया जाता है। इसके कुछ उदाहरणों में फिल्म मिशन मजनू में सिद्धार्थ मल्होत्रा ​​पाकिस्तान में एक परमाणु मिशन को ध्वस्त करने जाते हैं। विशाल भारद्वाज की जासूसी फिल्म ख़ुफ़िया में तब्बू और उलझ में जान्हवी कपूर अपने मिशन को पूरा करती है । ये फिल्में उन दर्शकों को ज़्यादा पसंद आती हैं जो सिर्फ़ ग्लैमर के बजाय असलियत देखना चाहते हैं। इन फिल्मों पर असल जासूसों का भी मानना ​​है कि इनमें से कुछ ही फिल्में (जैसे 'मद्रास कैफ़े' और 'राज़ी') जासूसी की गंभीर और अकेली दुनिया को सही मायनों में दिखा पाती हैं, जबकि बॉलीवुड की ज़्यादातर फिल्में इसे बहुत ही भड़कीले अंदाज़ में पेश करती हैं।




महत्वाकांक्षी और ज़्यादा गंभीर सीमा पार के ड्रामे पर धुरंधर और धुरंधर: द रिवेंज इस जॉनर की बेहतरीन मिसाल फ़िल्में हैं। कराची के लयारी गैंग वॉर की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में रॉ की घुसपैठ के एंगल भी दिखाए गए हैं। इसमें असल घटनाओं से प्रेरित तत्वों (जैसे अंडरवर्ल्ड के किरदार और खुफिया ऑपरेशन्स) को काल्पनिक ट्विस्ट के साथ मिलाकर पेश किया गया है। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त कमाई (सैकड़ों करोड़) की और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर राजनीतिक विवाद भी खड़ा किया।




यह इस बात का संकेत है कि अब कहानियाँ अधिक जटिल और गंभीर होती जा रही हैं। इन फिल्मों में जासूसों को हमेशा अजेय हीरो के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे किरदारों के तौर पर दिखाया जाता है जिन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह बदलाव इस बात को भी दर्शाता है कि दर्शक अब सिर्फ़ मसाला फिल्मों से ऊब चुके हैं और एक्शन के साथ-साथ कहानी में गहराई और किरदारों की मनोवैज्ञानिक बारीकियों को भी देखना चाहते हैं।





वरुण धवन अमेज़न सीरीज सिटाडेल हनी बन्नी का इंटरनेशनल जासूसी थीम वाला टाई-इन इस यात्रा को आगे बढ़ाने वाला है।





बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों में महिला जासूसों की बढ़ती संख्या इस ट्रेंड को अलग मोड़ देती है। आलिया भट्ट की फिल्म अल्फ़ा और राजी के अतिरिक्त तापसी पन्नू की फिल्म नाम शबाना ओरिजिनल/सीरीज़ पहुंच का विस्तार कर रही हैं। नेटफ्लिक्स पर भारतीय जासूसी सामग्री की वैश्विक सफलता निर्यात क्षमता को उजागर करती है।





बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों में अभी भी कमियां है। आलोचक और खुफिया एजेंसियों के विशेषज्ञ इसमें मौजूद कमियों की ओर इशारा करते है। वास्तविक जासूसी व्यवस्थित और ग्लैमर से रहित होती है, स्टंट से भरी नहीं। फिर भी, यह शैली व्यावसायिक रूप से फल-फूल रही है, हाल के वर्षों में कम से कम दस से अधिक फिल्में और फ्रेंचाइजी इसकी दीर्घायु सुनिश्चित कर रही हैं।

#Bollywood ने पहले भी तोडा मरोड़ा है कथानकों को !

 



यहाँ बॉलीवुड की कुछ ऐसी फिल्मों के खास उदाहरण दिए गए हैंजिनकी कहानी मूल किताब से अलग होने की वजह से उनकी आलोचना हुई या उन पर बहस छिड़ गई। ऎसी ही कुछ फिल्मों का उल्लेख नीचे किया जा रहा है। 




3 इडियट्स, चेतन भगत के उपन्यास फाइव पॉइंट समवन पर आधारित थी। राजकुमार हिरानी की यह ब्लॉकबस्टर फिल्मभारत की शिक्षा व्यवस्था की कमियों को मज़ाक और दोस्ती के ज़रिए दिखाने की वजह से ज़बरदस्त हिट हुई थी। हालाँकिचेतन भगत ने शुरू में फिल्म में उन्हें सही श्रेय न दिए जाने और कहानी में अपनी मर्ज़ी से किए गए उन बदलावों पर सार्वजनिक रूप से नाराज़गी ज़ाहिर की थीजिनकी वजह से फिल्म का ध्यान उपन्यास में दिखाए गए कैंपस की ज़िंदगी और आत्महत्या के दबावों के तीखे और कड़वे सच से हटकर सिर्फ मनोरंजन पर चला गया था। फिल्म में कुछ ऐसे यादगार सीन और एक ऐसा सुखद अंत जोड़ा गयाजिससे कई लोगों को लगा कि किताब में दिखाए गए कड़वे सच को कमर्शियल बना दिया गया है।




चेतन भगत के दूसरे उपन्यासों पर बनी फिल्मों में एक काई पो चे' (उपन्यास द 3 मिस्टेक्स ऑफ़ माई लाइफ़)  और   2 स्टेट्सके साथ भी ऐसी ही दिक्कतें सामने आईंजहाँ कहानी के निजी पहलुओं को आम दर्शकों को पसंद आने लायक बनाने के लिए ज़्यादा ही रोमांटिक बना दिया गया या उन्हें आसान तरीके से पेश किया गया। 

 

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के मशहूर उपन्यास देवदास पर आधारित फिल्म देवदास २००२ में प्रदर्शित हुई थी । संजय लीला भंसाली की यह भव्य फिल्म में शाहरुख खानऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं। फिल्म दृश्य की दृष्टि से बेहद खूबसूरत हैलेकिन इसमें बहुत ज़्यादा गाने-नाच के सीन जोड़ने और पारो और चंद्रमुखी के बीच एक नाटकीय मुलाकात दिखाने की वजह से इसकी काफी आलोचना हुई थी। पहले भी इसके फिल्म रूपांतरण बन चुके थेलेकिन भंसाली पर आरोप लगा कि उन्होंने उपन्यास में शराब की लत, सामाजिक वर्ग और एकतरफ़ा प्यार के कच्चे चित्रण के बजाय भव्यता को ज़्यादा महत्व दिया।



इस दृष्टि से एक अधिक आधुनिक नज़रिए वाला रूपांतरण  अनुराग कश्यप की फिल्म देव.डी (२००९) में, बिल्कुल विपरीत दिशा में किया गया। फिल्म में कहानी के मूल चरित्र दोषों को बरकरार रखते हुए उसे आज के ज़माने के हिसाब से पूरी तरह बदल दिया।

  



पिंजर (२००३)अमृता प्रीतम के इसी शीर्षक वाले उपन्यास पर आधारित उर्मिला मातोंडकर अभिनीत फिल्म थी, जो विभाजन-काल की पृष्ठभूमि में १९४७ के दौरान अपहरण,  पहचान और सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों को दिखाता है।फिल्म में, जहाँ एक तरफ़ इसकी संवेदनशीलता की तारीफ़ हुईवहीं कुछ लोगों ने इसमें किए गए उन बदलावों पर भी गौर किया जो कुछ खास भावनात्मक पहलुओं पर ज़ोर देने या फ़िल्मी प्रवाह के लिए राजनीतिक मुद्दों की धार को कम करने के लिए किए गए थे। यद्यपि, फिल्म में सामान्य रूप से किताब के उस नारीवादी और मानवीय मूल-भाव का सम्मान कियाजो ऐतिहासिक त्रासदी में फँसी महिलाओं के बारे में था।




लेखक विकास स्वरुप के उपन्यास फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर (२००८)  पर आधारित इसी शीर्षक वाली फिल्म का निर्माण ने किया  था। डैनी बॉयल ने उपन्यास की संरचनालहजे और कुछ पात्रों की प्रेरणाओं में बदलाव किएताकि इसे एक ऐसी कहानी का रूप दिया जा सके जिसमें एक गरीब लड़का अमीर बनता है और जो एक गेम-शो पर आधारित हो। किताब भारतीय समाज के बारे में ज़्यादा गंभीर और व्यंग्यात्मक हैफ़िल्म ने इसे एक प्रेरणादायक कहानी में बदल दिया। इससे फ़िल्म को दुनिया भर में सफलता तो मिलीलेकिन किताब के प्रशंसकों ने इसकी आलोचना की और इस पर कहानी के मूल यथार्थ को हॉलीवुड-शैली में ढालने का आरोप लगाया।





ओ. हेनरी की लघुकथा द लास्ट लीफ़ से प्रेरित रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा अभिनीत तथा विक्रम आदित्य मोटवानी निर्देशित फिल्म लुटेरा में ऐतिहासिक प्रेम कहानी में भारतीय यादोंरोमांस और त्रासदी की ऐसी परतें जोड़ी गईं जो मूल संक्षिप्त कहानी का मुख्य हिस्सा नहीं थीं। हालाँकिकहानी का वह निस्वार्थ मोड़ तो बरकरार रहालेकिन फ़िल्म की अवधि बढ़ाने और भावनात्मक गहराई लाने के लिए किए गए विस्तार ने कहानी के मूल सादे और सीधे प्रभाव को बदल दिया। फिर भीकई लोगों ने इसे कहानी के साथ विश्वासघात मानने के बजाय एक सफल रचनात्मक विस्तार के रूप में देखा।




 

 

सकारात्मक पक्ष देखें तोआर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित फिल्म गाइड, शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित फिल्म परिणीता या विशाल भारद्वाज की शेक्सपियर के नाटकों पर बनी फिल्मों जैसे वफादार या सोच-समझकर किए गए रूपांतरण यह दिखाते हैं कि बिना उसके मूल तत्व को खोए बदलाव करने से फिल्म की प्रासंगिकता बढ़ सकती है। विशाल की फिल्मों में महत्वाकांक्षाईर्ष्या या बदले जैसे विषयों को आज के भारतीय संदर्भों में ढालकर दिखाया गया था ।





कुल मिलाकरबॉलीवुड के रूपांतरण से जुड़ी चुनौतियाँ उसके व्यावसायिक माहौल से पैदा होती हैं: फिल्मों को अलग-अलग तरह के दर्शकों का मनोरंजन करना होता हैसेंसरशिप की बाधाओं से निपटना होता हैऔर सितारों की लोकप्रियता का ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठाना होता हैजिसकी वजह से अक्सर समझौते करने पड़ते हैं। यह वैश्विक रुझानों को ही दर्शाता है। हॉलीवुड में भी अक्सर किताबों ढालता है और उनमें मसाला डाल देता है।  लेकिन भारत मेंइसका मेल सांस्कृतिकभाषाई और कभी-कभी राजनीतिक अपेक्षाओं से भी होता है। 

#Dhurandhar2 के बहाने 'राजी' पर सिक्का !


 

लेखक निर्देशक आदित्य धर की रणवीर सिंह की धुरंधर भूमिका वाली फिल्म धुरंधर २ की अभूतपूर्व सफलता का प्रभाव दिखाई देने लगा है।  २०१८ में प्रदर्शित आलिया भट्ट अभिनीत फिल्म राज़ी के लेखक हरिंदर सिक्का ने एक बार फिर फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार की कटु आलोचना की है।  उन्होंने खेद व्यक्त किया है कि उन्होंने मेघना गुलजार को अपनी पुस्तक कालिंग सहमत पर फिल्म बनाने की सहमति दी। यद्यपि, उन्होंने  कई लोगों ने सचेत किया था। 





सिक्का का आरोप है कि मूल कहानी के कई हिस्सों को बदल दिया गया तथा फिल्म की कहानी में पाकिस्तान को दिखाने का तरीका नरम कर दिया गया, ताकि वह एक खास नज़रिए के हिसाब से सही लगे। जबकि, सिक्का के मुताबिक, उनकी किताब का मकसद सीमा पार की असलियतों और अंदरूनी चुनौतियों को ज़्यादा मज़बूती से सामने लाना था। वह अपनी गलती मानते हुए कहते हैं, "यह मेरी गलती थी... मुझे कहा गया था कि भरोसा मत करना, लेकिन मैं यकीन नहीं कर पाया। आज मैं समझ पाया हूँ कि भरोसा करो, लेकिन उसकी जाँच भी करो।"






 

बॉलीवुड का पुस्तकों, उपन्यासों, छोटी कहानियों और नाटकों को फिल्मों में ढालने का एक लंबा इतिहास रहा है। अक्सर वे मूल सामग्री को बदलकर उसे गानों, बड़े सितारों वाली फिल्मों, रोमांस या ज़्यादा बड़े दर्शकों को पसंद आने वाली चीज़ों जैसी व्यावसायिक आवश्यकताओं के दृष्टिगत ढाल लेते हैं। जहाँ कुछ फिल्में मूल कहानी के काफ़ी करीब रहती हैं और कला के लिहाज़ से सफल होती हैं (जैसे, विशाल भारद्वाज की शेक्सपियर पर बनी तीन फिल्में: मैकबेथ से 'मकबूल', ओथेलो से 'ओमकारा' और हैमलेट से 'हैदर' — जो इन दुखद कहानियों को मुंबई के अंडरवर्ल्ड, UP की राजनीति और कश्मीर विवाद जैसे भारतीय माहौल में ढालती हैं), वहीं कुछ फिल्में कहानी में बड़े बदलावों की वजह से विवादों में घिर जाती हैं। इन बदलावों में कहानी के तीखेपन को कम करना, 'मसाला' डालना, दर्शकों को 'पसंद आने लायक' बनाने के लिए कहानी का मिजाज बदलना, या कहानी में अपनी तरफ से कुछ बातें जोड़ देना शामिल हो सकता है। ऐसा ही कुछ 'राज़ी' (2018) के मामले में भी हुआ था, जब लेखक हरिंदर सिक्का ने डायरेक्टर मेघना गुलज़ार पर बार-बार यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनके उपन्यास 'कॉलिंग सहमत' से जासूसी की गंभीरता और सीमा पार की असलियत को कमज़ोर कर दिया है।





 

राज़ी, जिसमें आलिया भट्ट ने एक युवा भारतीय महिला सहमत, जिसकी शादी एक पाकिस्तानी मिलिट्री परिवार में हुई थी ताकि वह 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान RAW के लिए जासूसी कर सके, का किरदार निभाया था। फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल और समीक्षकों सके सराही गई फिल्म थी। इसने दुनिया भर में ₹200 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की और अपने तनावपूर्ण जासूसी थ्रिलर तत्वों, बारीकी से निभाए गए किरदारों (खासकर भट्ट और उनके पति के रूप में विक्की कौशल), और सीमा के दोनों ओर के किरदारों के संतुलित मानवीय चित्रण के लिए तारीफ़ बटोरी थी।   

 



सिक्का ने, वर्त्तमान से पूर्व भी बार-बार दावा किया था कि वह इस रूपांतरण के लिए अनिच्छा से राज़ी हुए थे, जिसका मुख्य कारण मेघना के पिता कवि-गीतकार और फिल्म निर्देशक गुलज़ार से किया गया एक निजी वादा था। बाद में उन्होंने मेघना को डायरेक्टर के तौर पर नियुक्त करने को अपनी "सबसे बड़ी ग़लती" बताया, और आरोप लगाया कि उन्होंने संभावित "वैचारिक पूर्वाग्रह" के बारे में मिली चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया और "भरोसा करो, लेकिन जाँच भी करो" के सिद्धांत का पालन नहीं किया। उन्होंने टीम पर आरोप लगाया कि उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के बावजूद उन्हें डायरेक्टर का कट नहीं दिखाया और डील होने के बाद उन्हें किनारे कर दिया । जिसके कारण उनकी पुस्तक की लॉन्चिंग में देरी हुई। उन्हें प्रमोशन के दौरान कम महत्त्व  दिया गया





  

सिक्का की किताब का नाम 'कॉलिंग सहमत' है। सिक्का चाहते थे कि फ़िल्म का नाम भी "सहमत" ही रखा जाए, ताकि मुख्य चरित्र की पहचान और देशभक्ति पर ज़ोर दिया जा सके। जबकि, फिल्म की टीम ने 'राज़ी' (जिसका मतलब इस मिशन के संदर्भ में "समझौता" या "सहमति" होता है) नाम चुना, जिसका एक कारण यह भी था कि वे इसे आलिया भट्ट के लिए सिर्फ़ एक स्टार- व्हीकल जैसा नहीं दिखाना चाहते थे। आलिया ने बाद में इंटरव्यू में बताया कि अगर फ़िल्म का नाम किरदार के नाम पर रखा जाता, तो शायद लोगों का ध्यान कहानी से हटकर एक्टर पर चला जाता। सिक्का को यह बात असली सहमत के योगदान को कम करके दिखाने जैसा लगा।  





 

हरिंदर सिक्का की किताब में, सहमत भारत लौटती है, जहाँ उसका हीरो जैसा स्वागत होता है—राष्ट्रीय गान (जन गण मन) बजता है और भारतीय प्रतीक (जैसे तिरंगा) प्रमुखता से दिखाई देते हैं। खबरों के मुताबिक, फिल्म में इन चीज़ों को या तो हटा दिया गया है या कम करके दिखाया गया है, जबकि पाकिस्तानी झंडे को ज़्यादा प्रमुखता से दिखाया गया है। सिक्का का दावा है कि भारतीय तिरंगे को पूरी तरह से हटा दिया गया था, और क्लाइमेक्स में सहमत को अपराध-बोध या डिप्रेशन से ग्रस्त दिखाया गया है—जैसे कि उसने भारत के लिए जासूसी करके "कोई गलती" कर दी हो। इसके विपरीत, किताब की सहमत एक दृढ़ देशभक्त है जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर काम करती है, न कि सिर्फ़ कर्तव्य-बोध से। उसे मिशन पूरा होने के बाद टूटने के बजाय गर्व महसूस होता है। सिक्का ने यह भी आरोप लगाया है कि पाकिस्तानी सेना और किरदारों को सकारात्मक रूप में दिखाया गया है। किताब में सीमा-पार की वास्तविकताओं की जो तीखी आलोचना की गई थी, उसे नज़रअंदाज़ करके "दुश्मन" को मानवीय रूप दिया गया है। 





 

किताब में सहमत को एक प्रशिक्षितजिसमें शारीरिक फुर्ती हैजो मारनेझूठ बोलने और ब्लैकमेल करने को भी तैयार निष्ठुर जासूस के रूप में बताया गया है । जबकि फिल्म की सहमत शुरुआत में ज़्यादा अनाड़ी और हिचकिचाने वाली लगती है—बंदूक की गोली चलने पर वह डर जाती है—और मार्गदर्शन के लिए वह भारतीय हैंडलर्स/दूतावास के सहयोग वाले नेटवर्क पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहती है। फिल्म में उसके आंतरिक भावनात्मक संघर्ष को जासूसी की नैतिक कीमत पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया है।





किताब में भारत में सहमत के प्रेमी (अभिनव/एबी), उसके कॉलेज जीवन, उसके जुनून और परिवार से जुड़ी जानकारियाँ (जिसमें उसके माता-पिता की विवादास्पद प्रेम कहानी भी शामिल है) दी गई हैं। फिल्म की अवधि और मुख्य विषय पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इन चीज़ों को बड़े पैमाने पर हटा दिया गया या संक्षिप्त कर दिया गया।





किताब की तुलना में, फिल्म में सहमत के ज़मीनी जासूसी नेटवर्क (रिक्शा चालक, फेरीवाले) का विस्तार किया गया है—जबकि किताब में उसके मददगारों की संख्या सीमित थी और वे कहानी में काफ़ी बाद में सामने आते हैं। किताब में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक संवेदनशीलता और मतभेदों की गहराई से पड़ताल की गई है; वहीं फिल्म में धर्म के ऊपर राष्ट्रभक्ति को प्राथमिकता दी गई है।





किताब में मिशन के बाद के कुछ अतिरिक्त अध्याय भी हैं (जिनमें सहमत का एक साधु के सानिध्य में मानसिक शांति पाना, और पंजाब से जुड़े तत्वों या व्यापक खुलासों के संदर्भ शामिल हैं)। फिल्म में इन चीज़ों को संक्षिप्त कर दिया गया है, और इसका अंत निश्छल वीरता के बजाय मानसिक आघात (ट्रॉमा) के भाव के साथ होता है। सिक्का का दावा है कि कुछ प्रमुख उपलब्धियों (जैसे INS विक्रांत को नुकसान से बचाना) को या तो कम करके दिखाया गया है या उनमें बदलाव कर दिया गया है। 






पटकथा लेखक मेघना गुलज़ार और भवानी अय्यर ने कहानी के मुख्य आधार को तो अपनाया, लेकिन भावनात्मक गहराई, गानों (जो कम थे, पर असरदार थे) और ज़्यादा लोगों को पसंद आने के लिए इसमें कुछ "सिनेमैटिक आज़ादियाँ" भी लीं। प्रोड्यूसर्स में धर्मा प्रोडक्शंस शामिल थे, जिसका असर फ़िल्म के साफ़-सुथरे, मुख्यधारा वाले थ्रिलर अंदाज़ पर दिखा। सिक्का ने आरोप लगाया है कि फ़िल्म में "वामपंथी नज़रिए" का इस्तेमाल करके पाकिस्तान-विरोधी तेवर को नरम कर दिया गया और भारत की इंटेलिजेंस एजेंसी की छवि को कमज़ोर दिखाया गया, जिससे एजेंट्स को निर्देश देने वाले अधिकारी कम निर्णायक लगे।