यद्यपि, धुरंधर फिल्मों के निर्देशक आदित्य धर ने खंडन कर दिया है कि वह धुरंधर ३ बनाने जा रहे है। इससे स्पष्ट है कि धुरंधर ३, हालफिलहाल नहीं बनने जा रही है। किन्तु, इस फिल्म ने दर्शकों में ऎसी ही श्रेष्ठ स्पाई फिल्मों की चाहत पैदा कर दी है। वह अपने, विशेष रूप से बॉलीवुड फिल्म निर्माताओं से ऎसी ही यथार्थवादी जासूसी फ़िल्में बनाते देखना चाहते है। क्या ऐसा होने जा रहा है ? क्या बदले यथार्थ के निकट जासूसी फिल्मे दर्शकों को देखने को मिलेंगी ?
बॉलीवुड में जासूसी फ़िल्मों का जॉनर काफ़ी बदल गया है। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों की शैली में समय के साथ बदलाव होता रहा है। बॉलीवुड, कभी-कभार बनने वाली कोल्ड वॉर-युग की थ्रिलर फ़िल्मों और १९७०-८० के दशक की आँखें या द हीरो: लव स्टोरी ऑफ़ अ स्पाई जैसी एक्शन फ़िल्मों से आगे बढ़कर, २०१० के दशक के मध्य से एक प्रमुख और अति लोकप्रिय जॉनर बन गया है।
अब इसमें देशभक्ति, भू-राजनीति (अक्सर भारत-पाकिस्तान तनाव या आतंकवाद-विरोधी मुद्दे), निजी बलिदान, और अलग-अलग मात्रा में यथार्थवाद और मसाला मनोरंजन का मेल देखने को मिलता है। यह तेज़ी असल दुनिया की घटनाओं से जुड़ी है, जैसे उरी हमले पर उरी : द सर्जिकल स्ट्राइक, आदि। राष्ट्रीय सुरक्षा पर बढ़ती चर्चा के साथ ही, बड़े पर्दे पर ज़बरदस्त एक्शन और ओटीटी पर गहरी कहानियों के लिए दर्शकों की बढ़ती चाहत भी इसकी एक वजह है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि २०१० से पूर्व भी जासूसी कहानियों वाली फिल्मों का निर्माण किया गया है। किन्तु, अधिकतर एजेंट विनोद और फ़र्ज़ जैसी एक्शन, ग्लैमर या कॉमेडी फ़िल्में होती थीं। इन फिल्मों में गहराई की कमी होती थी। यह फ़िल्में जासूसी की बारीकियों के बजाय विदेशी लोकेशन के प्रदर्शन और गैजेट्स पर अधिक ध्यान देती थीं।
जासूसी फिल्मों का आधुनिक पुनरुद्धार नीरज पांडे की अक्षय कुमार की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म बेबी (२०१५) बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों को अहम मोड़ देने वाली फिल्म कही जा सकती है। यह फिल्म एक जासूस और मिशन का ज़मीनी और बेहतरीन चित्रण करने वाली थी। फिल्म में आतंकवाद-विरोधी टीम दिखाई गई थी । इसने रणनीति, नैतिक दुविधाओं, और बिना किसी फालतू रोमांस या गानों के सीधे-सीधे एक्शन पर ज़ोर दिया। इसने ऐसी फ़िल्मों की एक लहर के लिए रास्ता बनाया, जो जासूसी की मानवीय कीमत को दिखाती हैं।
विवाद के बावजूद, मेघना गुलज़ार की फ़िल्म राज़ी अपनी भावनात्मक गहराई, नैतिक दुविधाओं, और एक महिला जासूस के अंदरूनी संघर्ष पर ध्यान देने की वजह से सबसे अलग है। यह 'दुश्मन' को भी एक इंसान के तौर पर दिखाती है और शांत देशभक्ति का जश्न मनाती है। यद्यापि, किताब के मुकाबले फ़िल्म में कुछ चीज़ों को नरम दिखाने के लिए इसकी आलोचना भी हुई थी। आलिया भट्ट की एक्टिंग ने शारीरिक स्टंट्स के बजाय जासूसी के मानसिक दबाव को ज़्यादा अच्छे से उभारा।
इसी प्रकार की अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में २०१३ ने प्रदर्शित जॉन अब्राहम की फिल्म मद्रास कैफ़े राजनीतिक हत्याओं पर अपनी बेबाक राय और रिसर्च-आधारित यथार्थवाद के लिए स्मरणीय है। २०१३ में ही प्रदर्शित निखिल अडवाणी की फिल्म डी-डे कमांडो-शैली के मिशन २०१५ में प्रदर्शित फिल्म फ़ैंटम बदले की थीम पर आधारित होने के लिए उल्लेखनीय बन जाती है।
यश राज फ़िल्म्स ने, जब २०१२ में सलमान खान के साथ जासूसी फिल्म एक था टाइगर का निर्माण किया था, तब उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि वह एक स्पाई यूनिवर्स का निर्माण करने जा रहे है। २०१७ में प्रदर्शित एक था टाइगर की सीक्वल फिल्म टाइगर ज़िंदा है ने इसे स्थापित कर दिया। बाद में वॉर और पठान ने इस यूनिवर्स को विस्तृत कर दिया। वॉर (२०१९) में ऋतिक रोशन ने एक बागी एजेंट कबीर की भूमिका की थी। इस यूनिवर्स की फिल्म पठान (२०२३) ने शाहरुख खान की रॉ एजेंट के रूप में इंडस्ट्री में वापसी भी करवा दी। यद्यपि, बाद में प्रदर्शित फिल्म टाइगर ३ और वॉर २ के साथ इस यूनिवर्स का विस्तार हुआ। किन्तु, इन फिल्मों में ज़बरदस्त स्टंट, विदेशी लोकेशन, बड़े सितारों की मौजूदगी और दूसरी फिल्मों के किरदारों के कैमियो पर ज़्यादा ज़ोर दिया गया था । ऐसी फिल्में आम दर्शकों को तो पसंद आ सकती हैं, किन्तु, इनकी इस बात के लिए आलोचना होती है कि ये कहानी के सार के बजाय सिर्फ़ स्टाइल पर ज़्यादा ध्यान देती हैं। इस कड़ी में, यशराज फिल्म्स की महिला-प्रधान स्पाई फिल्म अल्फा में आलिया भट्ट और शरवरी मुख्य भूमिका में हैं। यह फिल्म इसी साल प्रदर्शित हो सकती है।
इस जॉनर में अब दो मुख्य धाराएँ देखने को मिल रही हैं- ज़मीनी/यथार्थवादी थ्रिल। ये फिल्में सच्ची घटनाओं या असल खुफिया ऑपरेशन्स से प्रेरित होती हैं। इनमें नैतिक दुविधाओं, मानसिक तनाव और सीमा पार की साज़िशों पर खास ज़ोर दिया जाता है। इसके कुछ उदाहरणों में फिल्म मिशन मजनू में सिद्धार्थ मल्होत्रा पाकिस्तान में एक परमाणु मिशन को ध्वस्त करने जाते हैं। विशाल भारद्वाज की जासूसी फिल्म ख़ुफ़िया में तब्बू और उलझ में जान्हवी कपूर अपने मिशन को पूरा करती है । ये फिल्में उन दर्शकों को ज़्यादा पसंद आती हैं जो सिर्फ़ ग्लैमर के बजाय असलियत देखना चाहते हैं। इन फिल्मों पर असल जासूसों का भी मानना है कि इनमें से कुछ ही फिल्में (जैसे 'मद्रास कैफ़े' और 'राज़ी') जासूसी की गंभीर और अकेली दुनिया को सही मायनों में दिखा पाती हैं, जबकि बॉलीवुड की ज़्यादातर फिल्में इसे बहुत ही भड़कीले अंदाज़ में पेश करती हैं।
महत्वाकांक्षी और ज़्यादा गंभीर सीमा पार के ड्रामे पर धुरंधर और धुरंधर: द रिवेंज इस जॉनर की बेहतरीन मिसाल फ़िल्में हैं। कराची के लयारी गैंग वॉर की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में रॉ की घुसपैठ के एंगल भी दिखाए गए हैं। इसमें असल घटनाओं से प्रेरित तत्वों (जैसे अंडरवर्ल्ड के किरदार और खुफिया ऑपरेशन्स) को काल्पनिक ट्विस्ट के साथ मिलाकर पेश किया गया है। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ज़बरदस्त कमाई (सैकड़ों करोड़) की और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर राजनीतिक विवाद भी खड़ा किया।
यह इस बात का संकेत है कि अब कहानियाँ अधिक जटिल और गंभीर होती जा रही हैं। इन फिल्मों में जासूसों को हमेशा अजेय हीरो के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे किरदारों के तौर पर दिखाया जाता है जिन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। यह बदलाव इस बात को भी दर्शाता है कि दर्शक अब सिर्फ़ मसाला फिल्मों से ऊब चुके हैं और एक्शन के साथ-साथ कहानी में गहराई और किरदारों की मनोवैज्ञानिक बारीकियों को भी देखना चाहते हैं।
वरुण धवन अमेज़न सीरीज सिटाडेल हनी बन्नी का इंटरनेशनल जासूसी थीम वाला टाई-इन इस यात्रा को आगे बढ़ाने वाला है।
बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों में महिला जासूसों की बढ़ती संख्या इस ट्रेंड को अलग मोड़ देती है। आलिया भट्ट की फिल्म अल्फ़ा और राजी के अतिरिक्त तापसी पन्नू की फिल्म नाम शबाना ओरिजिनल/सीरीज़ पहुंच का विस्तार कर रही हैं। नेटफ्लिक्स पर भारतीय जासूसी सामग्री की वैश्विक सफलता निर्यात क्षमता को उजागर करती है।
बॉलीवुड की जासूसी फिल्मों में अभी भी कमियां है। आलोचक और खुफिया एजेंसियों के विशेषज्ञ इसमें मौजूद कमियों की ओर इशारा करते है। वास्तविक जासूसी व्यवस्थित और ग्लैमर से रहित होती है, स्टंट से भरी नहीं। फिर भी, यह शैली व्यावसायिक रूप से फल-फूल रही है, हाल के वर्षों में कम से कम दस से अधिक फिल्में और फ्रेंचाइजी इसकी दीर्घायु सुनिश्चित कर रही हैं।

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