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Sunday, 23 November 2025

बंद हो गई सलमान खान और अलिया भट्ट की जोडी वाली इंशाअल्लाह !



जैसे ही मार्च २०१९ में, सलमान खान की फिल्म इंशाअल्लाह की घोषणा हुई, सलमान खान के प्रंशक दर्शक उन्हें ईद २०२० में ईदी देने के लिए तैयार हो गए। फिल्म में, सलमान खान के ४० साल के व्यवसाई की २० साल की फिल्म अभिनेत्री (आलिया भट्ट) से प्रेम की कहानी थी। इस फिल्म को ईद २०२० को प्रदर्शित होना था। मुसलमानों का यह त्यौहार खान अभिनेताओं के लिए ईदी पाने वाला जैसा होता है।





किन्तु, फिल्म अभी प्रारम्भ नहीं हुई थी। किन्तु, सलमान खान, अपने प्रिय निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथ फिल्म करने के लिए अत्यंत उत्सुक थे। सलमान खान ने, २००७ में प्रदर्शित और बॉक्स ऑफिस पर मुंह के बल गिरने वाली फिल्म सांवरिया में एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका की थी। सांवरिया की असफलता के बाद, सलमान खान ने संजय लीला भंसाली के साथ कोई फिल्म नहीं की थी।





संजय लीला भंसाली ने, सलमान खान के साथ फिल्म ख़ामोशी द म्यूजिकल और हम दिल चुके सनम जैसी फ़िल्में की थी। हम दिल दे चुके सनम को, न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता मिली थी, बल्कि फिल्म में सलमान खान के अभिनय की प्रशंसा हुई थी। इसलिए, स्वाभाविक था कि सलमान खान, भंसाली जैसे निर्देशक की फिल्म करने का इच्छुक हो। किन्तु, रुकावट !





मार्च में, इंशाअल्लाह की घोषणा के पश्चात् फिल्म की शूटिंग को लेकर कोई समाचार नहीं मिला। यद्यपि, आलिया भट्ट के ट्रेनिंग सेशन करने के समाचार आ रहे थे। यकायक, अगस्त २०१९ को समाचार पत्रों में यह समाचार था कि सलमान खान की फिल्म इंशाअल्लाह अब ईद २०२० पर प्रदर्शित नहीं होगी। किन्तु, यह अवश्य सूचित किया गया कि अब यह फिल्म ईद २०२१ पर प्रदर्शित होगी।





सलमान खान और संजय लीला भंसाली की फिल्म इंशाअल्लाह का जीवन दो घोषणाओं से अधिक जीवित नहीं रह सका। इस फिल्म को छह महीने के अंदर, सितम्बर २०१९ को बंद कर दिए जाने की घोषणा कर दी गई। कारण यह बताया गया कि सलमान खान और संजय लीला भंसाली के मध्य क्रिएटिव डिफरेंस पैदा हो जाने के कारण बंद कर दी गई है। इस प्रकार से आलिया भट्ट के हाथों से सलमान खान की नायिका बनने का अवसर निकल गया।





इंशाअल्लाह के बंद हो जाने का सबसे अधिक दुःख आलिया भट्ट को हुआ। बताते हैं कि इंशाअल्लाह के बंद हो जाने के समाचार से आलिया भट्ट बहुत रोई चिल्लाई थी। तब संजय लीला भन्साली ने उन्हें गंगूबाई काठियावाड़ी की लॉली पॉप थमा कर उन्हें बहला दिया था। अब यह बात दूसरी है कि आलिया भट्ट आज भी इस उम्मीद में है कि संजय सर एक दिन, सलमान खान के साथ या उनके बिना इंशाअल्लाह का निर्माण करेंगे।





इंशाल्लाह बनेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि, इंशाअल्लाह के बाद से, संजय लीला भंसाली रणवीर सिंह के साथ दीपिका पादुकोण की जोड़ी बना कर गोलियाँ की रास लीला रामलीला, बाजीराव मस्तानी और पद्मावत बना चुके है। उन्होंने आलिया को भी गंगूबाई काठियावाड़ी की गंगूबाई बना कर, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलवा दिया है।





इस समय, संजय लीला भंसाली फिल्म लव एंड वॉर के निर्माण में व्यस्त है। यह फिल्म आलिया भट्ट के लिए घरेलु परियोजना जैसी है। क्योंकि, फिल्म में आलिया भट्ट के एक नायक उनके पति रणबीर कपूर है। उनके दूसरे नायक विक्की कौशल है। संजय ने, विक्की कौशल को फिल्म पद्मावत में दीपिका पादुकोण की पद्मावती के पति की भूमिका दी थी। किन्तु, दीपिका की आपत्ति के बाद, विक्की के स्थान पर शाहिद कपूर को ले लिया गया था।

Saturday, 22 November 2025

क्यों बंद हो गई प्रियंका चोपड़ा की फिल्म मैडमजी?



यद्यपि, अप्रैल २०१५ में ही निश्चित हो चुका था कि मैडमजी बंद कर दी जाएगी। कारन यह नहीं था कि मैडमजी के कथानक में बदलाव किये जाने थे।  क्योंकि, मैडमजी की कहानी भी मल्लिका शेरावत की फिल्म डर्टी पॉलिटिक्स से मिलती-जुलती थी।







निर्देशक केसी बोकाडिया की फिल्म  डर्टी पॉलिटिक्स का कथानक भी एक नर्तकी पर केंद्रित था, जो राजनीति में पकड़ बनाने के लिए एक राजनेता का बिस्तर गर्म करती है और फिर उसे ब्लैकमेल करती है।  इस पर नाराज नेता उसकी हत्या करवा देता है। बाकी की फिल्म इस हत्या की जाँच पर केंद्रित हो जाता है।






किन्तु, मैडमजी का निर्देशन मधुर भंडारकर करने वाले थे।  इसलिए ऐसा नहीं लगता कि वह इतना मिलता जुलता कथानक लेकर फिल्म निर्माण करेंगे।  वह रियल चरित्रों और घटनाओं पर प्रभावशाली फिल्मे बनाने के लिए जाने जाते है।  फिर चाहे फिल्म चांदनी बार हो या पेज 3फैशन और हीरोइन, उनकी शैली चुटीली ही होती थी।






निर्माता प्रियंका चोपड़ा की फिल्म मैडमजी का मैडमजी एक आइटम गर्ल के पॉलिटिक्स से रिश्ते के कथानक पर थी । मैडमजी, अपनी राजनीतिक यात्रा में संघर्ष करते हुए भिन्न शहरों में भटकती फिरती है। इस भूमिका को फिल्म की निर्माता प्रियंका चोपड़ा ही करने वाली थी। २९ अक्टूबर २०१४ को समाचार था कि फिल्म मैडमजी की शूटिंग १ नवंबर २०१४ से प्रारम्भ होगी । 






किन्तु, मैडमजी के निर्माण की घोषणा के बाद, प्रियंका चोपड़ा सब कुछ छोड़ कर अमेरिकन टीवी शो क्वांटिको की शूटिंग में व्यस्त हो गई।  इस पर निर्देशक मधुर भंडारकर ने अपनी आगामी फिल्म कैलेंडर गर्ल्स को प्राथमिकता दे दी। इस प्रकार से मैडमजी की शूटिंग १ नवंबर २०१४ से प्रारम्भ नहीं हो सकी। 






क़्वान्टिको की शूटिग से वापस आ कर प्रियंका चोपड़ा ने, संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक रोमांस फिल्म बाजीराव मस्तानी की शूटिंग प्रारम्भ कर दी। इस फिल्म में वह दीपिका पादुकोण की तवायफ मस्तानी के विरुद्ध बाजीराव की पत्नी काशीबाई की भूमिका कर रही थी।  





मैडमजी एक आइटम गर्ल की राजनीतिक यात्रा और संघर्ष को दिखाती थी, जो अपने शरीर का उपयोग कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली जाती है और एक प्रसिद्द राजनेता बन जाती है। इस फ़िल्म की शूटिंग भारत के अलग-अलग शहरों भोपालदिल्ली, जौनपुरलखनऊ और मुंबई में होनी थी ।






इसी समय यह समाचार आया कि प्रियंका चोपड़ा, मैडमजी को लेकर काफी उत्साहित हैं। किन्तु, वह मैडमजी की शूटिंग संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी की शूटिंग समाप्त होने के पश्चात् ही करना चाहती थी, ताकि मैडमजी की शूटिग  में कोई रुकावट न आये। इस पर फिल्म को दिसंबर तक के लिए टाल दिया गया। किन्तु, एबीसी के साथ एक अनुबंध के बाद, मैडमजी को मई २०१५ तक के लिए फिर टाल दिया गया। 





निर्माता प्रियंका चोपड़ा, मधुर भंडारकर और राम मीरचंदानी की फिल्म मैडमजी की घोषणा विवादों में फंसने  के लिए ही की गई थी। क्योंकि एक समाचार आया कि मैडमजी के निर्देशक के रूप में मधुर भंडारकर को हटा दिया गया है।  कहा गया कि मधुर ने फिल्म के निर्देशन के लिए पांच करोड़ की फीस की मांग रख दी थी। इस पर प्रियंका ने मैडमजी से मधुर भंडारकार को अलग कर किसी दूसरे निर्देशक की तलाश प्रारम्भ कर दी। यद्यपि, मधुर भंडारकर के निकट सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मैडमजी एक सहकार फिल्म थी तथा मधुर स्वयं एक निर्माता थे। इसलिए उनके द्वारा इतनी फीस मांगे जाने का प्रश्न ही नहीं था। 






बताते हैं कि जब मैडमजी की शूटिंग मई २०१५ से प्रारम्भ किये जाने का निर्णय लिया गया था, तभी यह निर्णय हो चुका था कि मैडमजी अब नहीं बनेगी। इसका कारण यह था कि फ़िल्मकार मधुर भंडारकर क्षुब्ध थे कि बिना उनसे मिले,  प्रियंका चोपड़ा ने क़्वान्टिको की शूटिंग से वापस आने के बाद, संजय लीला भन्साली की फिल्म की शूटिंग प्रारम्भ कर दी। इसके बाद, वह अन्य नए प्रोजेक्ट साइन करने लगी। बाजीराव मस्तानी की शूटिंग पूरी करने के पश्चात् प्रियंका चोपड़ा ने पाकिस्तानी फिल्म अभिनेता फवाद खान के साथ रीमा कागती की अनाम फिल्म की शूटिंग करने का निर्णय ले लिया। किन्तु, मैडमजी पर कोई बात नहीं की। 






इसके बाद, लम्बे समय तक यह कहा जाता रहा कि मैडमजी की शूटिंग प्रारम्भ होगी।  क्योंकि, यह फिल्म प्रियंका चोपड़ा के दिल के काफी नजदीक है। वह इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित भी थी। जब जब प्रियंका चोपड़ा से मैडमजी के विषय पर प्रश्न किये गए, प्रियंका चोपड़ा ने यही कहा कि मैडमजी होल्ड पर है, वह फिल्म प्रारम्भ करेंगी। तब से पंद्रह साल बीत गए है। मैडमजी का होल्ड समाप्त नहीं हुआ। 

Friday, 21 November 2025

वहीदा रहमान ने फिर क्यों नहीं की राज खोसला के साथ फिल्म ?



देवानंद और गीताबाली की साथ फिल्म मिलाप (१९५५) का निर्देशन करने वाले निर्देशक राज खोसला हिंदी दर्शकों की रूचि समझते थे।  वह जानते थे कि किसी भी युग के दर्शकों को सबसे अधिक रूचि हत्या रहस्य और रोमांच से मिलती है।  इस शैली में बनी फिल्मे, दर्शकों को अवश्य पसंद आएंगी।

 

 

 

 

 

यही कारण था कि उन्होंने कॉमेडी ड्रामा फिल्म मिलाप के बाद, क्राइम थ्रिलर एक्शन फिल्मों का निर्माण प्रारम्भ किया। उन्होंने समय के अनुरूप भिन्न शैली की फिल्म का निर्माण भी किया।

 

 

 

 

 

 

राज खोसला के निर्देशन में सीआईडी क्राइम थ्रिलर शैली में बनी, अगली फिल्म थी। इस फिल्म की सफलता के बाद, उन्होंने थ्रिलर फिल्मों को अधिक महत्त्व दिया।  राज खोसला की इसी समझ का परिणाम था कि वह हर अगली फिल्म दर्शकों की पसंद के अनुरूप सुपरहिट बना देते।

 

 

 

 

 

 

 

उनके नाम के पारस पत्थर ने काला पानी, सोलहवा साल, बम्बई का बाबू, एक मुसाफिर एक हसीना, वह कौन थी, मेरा साया, दो बदन, अनीता, चिराग, दो रास्ते, मेरा गांव मेरा देश, शरीफ बदमाश, कच्चे धागे, आदि फिल्मे हिट करा डाली।

 

 

 

 

 

 

उन्होंने अपनी फिल्मों का ट्रैक भी बदला। पारिवारिक प्रेम कथानक वाली फ़िल्में प्रेम कहानी, मैं तुलसी तेरे आँगन की, दो प्रेमी, दोस्ताना, दो रास्ते, आदि फ़िल्में उनकी भिन्न शैली और दर्शकों की रूचि के अनुरूप फिल्मे बना सकने की क्षमता का प्रमाण है।

 

 

 

 

 

 

हर अभिनेता या अभिनेत्री उनकी निर्देशित फिल्मों की स्टारकास्ट में सम्मिलित होना चाहती। किन्तु, वहीदा रहमान ही, कदाचित ऎसी अभिनेत्री थी, जिन्होंने, राज खोसला के साथ दो हिट फिल्मे करने के बावजूद फिर २६ साल तक कोई फिल्म नहीं की।

 

 

 

 

 

 

 

ऐसा क्या हो गया था कि वहीदा रहमान ने, सोने के हाथ वाले निर्देशक की बाद की फिल्मों में अभिनय नहीं किया, जबकि वह उनके साथ सीआईडी और सोलहवा साल जैसी हिट फिल्मो में अभिनय कर चुकी थी? इसका कारण भी इन्ही फिल्मों  के शूटिंग के समय हुए घटनाक्रम में छुपा है।

 

 

 

 

 

 

 

वहीदा रहमान को हिंदी फिल्मों में अवसर दिया, स्वर्गीय गुरुदत्त ने। उन्होंने, वहीदा रहमान की तमिल और तेलुगु फिल्मों को देखा था। वह वहीदा रहमान से प्रभावित हुए। उन्होंने, वहीदा रहमान को, राज खोसला द्वारा निर्देशित की जाने वाली फिल्म सीआईडी में देवानंद और शकीला के साथ सह-भूमिका में ले लिया। राज खोसला के साथ मनमुटाव का प्रारम्भ इसी फिल्म से हुआ।

 

 

 

 

 

 

 

सीआईडी की कामिनी एक क्लब डांसर थी। राज खोसला के साथ मनमुटाव का प्रारम्भ इसी फिल्म के गीत कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना की शूटिंग दौरान से हुआ था। इस गीत के लिए, राज खोसला क्लब डांसर के अनुरूप वहीदा रहमान को थोड़ा लो कट कुर्ता पहनाना चाहते थे। किन्तु, अपने परिधान के लिए सचेत वहीदा रहमान ने ऎसी कोई पोशाक पहनने से साफ मना कर दिया।

 

 

 

 

 

 

दोनों के बीच तीखी बहस हुई।  शूटिंग में व्यवधान भी पड़ा। अंत में, फिल्म के नायक देवानंद के बीच में पड़ने के बाद, वहीदा रहमान ने एक दुपट्टा डाल कर ही फिल्म का गीत किया। इसी फिल्म में, वहीदा रहमान ने, एक सीन में अपना दुपट्टा गिराने से मना कर दिया।

 

 

 

 

 

 

दूसरा टकराव हुआ, देवानंद के साथ वहीदा रहमान की राज खोसला निर्देशित फिल्म सोलहवा साल की शूटिंग के दौरान। हॉलीवुड फिल्म इट हैप्पेन्स वन नाईट की नक़ल पर बनी फिल्म सोलहवा साल एक युवती के शादी के ठीक पहले अपने प्रेमी के साथ भाग निकलने के एक रात के कथानक पर थी। फिल्म मुख्य रूप से वहीदा रहमान, उनके प्रेमी जगदेव और रिपोर्टर देवानंद पर केंद्रित थी।

 

 

 

 

 

 

इस फिल्म के एक दृश्य में नायिका वहीदा रहमान, भारी बारिश में भीग जाती है। एक घर में उन्हें शरण मिलती है। वहां वहीदा रहमान अपने कपडे बदलती है। राज खोसला इस दृश्य में चाहते थे कि नायिका को उनके साइज और पसंद के कपडे नहीं मिलने के कारण थोड़ी खुली ड्रेस पहननी पड़ती है। किन्तु, यहाँ भी वहीदा रहमान ने ऎसी ड्रेस न पहनने की का निर्णय लिया।

 

 

 

 

 

 

 

इस पर, निर्देशक राज खोसला के साथ वहीदा रहमान की गर्मागर्म बहस हुई। क्रुद्ध राज खोसला ने, फिल्म की शूटिंग रद्द कर दी।  यहाँ भी देवानंद बीच में पड़े। उन्होंने वहीदा रहमान का पक्ष लेते हुए, राज खोसला को उनकी पसंद की ड्रेस पहनने के लिए मना लिया। किन्तु, इस घटना के बाद, वहीदा रहमान ने, फिर कभी राज खोसला के साथ फिल्म करने से मना कर दिया।

 

 

 

 

 

 

 

वहीदा रहमान की, राज खोसला के साथ मनमुटाव का परिणाम था कि राज खोसला के हाथ से, गाइड के हिंदी संस्करण के निर्देशन का अवसर निकल गया। जैसे ही वहीदा रहमान को गाइड के निर्देशक के रूप में राज खोसला के नाम का पता चला, उन्होंने देवानंद को साफ कर दिया कि यदि गाइड का निर्देशन राज खोसला करते हैं तो वह फिल्म नहीं करेंगी। ऐसे में वहीदा रहमान पर मोहित देवानंद ने  गाइड के निर्देशन की कमान राज खोसला से लेकर अपने भाई विजय आनंद को सौंप दी।

 

 

 

 

 

 

 

वहीदा रहमान ने, राज खोसला के साथ अपने मतभेद भुलाते हुए, २६ साल बाद फिल्म सनी करने पर सहमति दी थी। इस फिल्म के नायक सनी देओल थे। नायिका अमृता सिंह और शर्मीला टैगोर के साथ, वहीदा रहमान ने फिल्म सनी में एक नकारात्मक चरित्र किया था।  इस फिल्म में धर्मेंद्र का कैमिया हुआ था। किन्तु, यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो सकी।  इस प्रकार से, वहीदा रहमान की राज खोसला के साथ २६ साल बाद तीसरी फिल्म असफल हुई।  

Wednesday, 19 November 2025

निराशाजनक समाज पर वेश्या को अपनाने वाला नायक था 'प्यासा' का विजय !



भारत की स्वतंत्रता के समय, २२ साल के वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण के नेत्रों में, सामान्य युवा की तरह कुछ सपने थे।  यह सपने समय के साथ धूमिल पड़ते गए। उनमे निराशा की धूल ज़मने लगी। ऐसे समय में, वसंत कुमार के मस्तिष्क में एक कहानी कश्मकश का जन्म हुआ।  इस कथानक में, वसंत के प्रारंभिक संघर्ष की छाप थी। 




 

जब वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण ने, गुरुदत्त बन कर फिल्म बनाने का निर्णय लिया तो उनके मस्तिष्क में इसी कहानी का विचार था।  इस कथानक में गीतकार साहिर लुधियानवी के लेखिका अमृता प्रीतम के साथ असफल प्रेम का मिश्रण किया गया।  इसके साथ ही गुरुदत्त के निर्देशन में बनी सातवीं फिल्म प्यासा का जन्म हुआ।  





गुरुदत्त अपने मन में  चार साल से चल रहे विषय पर ही फिल्म प्यासा को अपनी पहली निर्देशित फिल्म बनाना चाहते थे।  किन्तु, उनके मित्रों ने सलाह दी कि इस प्रयोगात्मक फिल्म से पूर्व कुछ ऎसी फिल्मे बना लो, जो उस समय दर्शकों की पसंदगी के अनुरूप हों तथा जिनसे पैसा कमाया जा सके।





गुरुदत्त ने, अपने मित्रों की बात मानी।  इस निर्णय का परिणाम, गुरुदत्त के निर्देशन में बनी बाज़ी (१९५१), जाल (१९५२), बाज़ (१९५३), आर पार (१९५४) और मिस्टर एंड मिसेज ५५ (१९५५) जैसी मनोरंजक और उतनी ही सकरात्मक फिल्मे हिंदी दर्शकों को देखने को मिली। यह सभी फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट हुई।  






इन फिल्मों के पश्चात, जब गुरुदत्त ने अपने सह  निर्देशक राज खोसला को अपराध फिल्म सीआईडी की कमान सौंप कर, स्वयं प्यासा पर काम करना प्रारम्भ कर दिया। इसका अर्थ यह नहीं था कि १९५१ से निरंतर प्रत्येक वर्ष हिट फिल्मे दे रहे गुरुदत्त ने १९५६ में को फिल्म निर्देशित नहीं की! उनके द्वारा निर्देशित अभी भट्टाचार्य, गीता बाली और स्मृति विश्वास के साथ फिल्म सैलाब प्रदर्शित हुई थी।






प्यासा २२ फरवरी १९५७ को प्रदर्शित हुई थी।  इस फिल्म में गुरुदत्त, वहीदा रहमान, माला सिन्हा, रहमान और जॉनी वाकर अभिनय कर रहे थे। किन्तु, यह स्टारकास्ट प्रारम्भ में नहीं थी। स्वयं गुरुदत्त को स्वयं पर विश्वास नहीं था कि वह हल्कीफुल्की करते हुए, इतनी गंभीर और दुखांत भूमिका कर सकते थे। इसलिए उन्होंने इस फिल्म के लिए दिलीप  कुमार, मधुबाला और नरगिस को लिया जाना तय किया था। किन्तु, किसी न किसी कारण से, यह सितारे एक के बाद एक फिल्म से बाहर होते चले गए। 





प्यासा में दिलीप कुमार की चाहती अभिनेत्रियां नरगिस और मधुबाला थी।  किन्तु, बताया जाता है कि किन्ही कारणोंवश दिलीप कुमार शूटिग के पहले दिन सेट पर नहीं पहुंचे, इसलिए गुरुदत्त ने इस भूमिका को स्वयं करने का निर्णय लिया।  कुछ का कहना है कि दिलीप कुमार दुखांत भूमिकाएं करते करते  मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गए थे। उन्हें डॉक्टर ने सलाह दी कि अब वह दुखांत भूमिकाये न करे। कुछ का कहना है कि दिलीप कुमार को प्यासा का कथानक अपने द्वारा अभिनीत फिल्म   देवदास जैसा लगा था। 





नरगिस और मधुबाला के निकलने के कारण भी भिन्न है।  कहा जाता है कि शीर्ष की यह दोनों अभिनेत्रियां यह तय नहीं कर पा रही थी कि वह कौन सी भूमिका करें।  इस अनिर्णय की स्थिति में, गुरुदत्त ने मधुबाला के स्थान पर १९५४ में हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने वाली अभिनेत्री माला सिन्हा को ले लिया और नरगिस वाली भूमिका अपनी खोज वहीदा रहमान को दे दी।  





वहीदा रहमान वेश्या गुलाबों फिल्म के लेखक के वास्तविक जीवन के एक चरित्र पर आधारित था।  बताते हैं कि जब अबरार अल्वी अपने दोस्तों के साथ मुंबई गए, तो वे रेड लाइट एरिया भी गए, जहाँ उनकी मुलाकात एक युवा वेश्या से हुई जिसका नाम गुलाबो था। लड़की ने दावा किया कि उसे ज़िंदगी में पहली बार गालियों के बजाय इतना सम्मान मिला था। लेखक अबरार अल्वी ने उन बातों को अपनी फिल्मों में रखा ही, वहीदा रहमान के चरित्र को नाम भी गुलाबो ही दिया ।





फिल्म के अंत को लेकर भी लेखक अबरार अल्वी और गुरु दत्त के बीच मतभेद था। लेखक का मानना ​​था कि गुरुदत्त के चरित्र विजय को उस समाज को छोड़ना नहीं चाहिए। बल्कि, उसे समाज की बुराइयों से लड़ना चाहिए। यद्यपि,  गुरु दत्त अपनी बात पर अड़े रहे और अंततः अबरार को झुकना पड़ा। 





मूल क्लाइमेक्स में विजय के चरित्र को अकेला दिखाया जाना था। लेकिन वितरकों ने गुरुदत्त से कहा कि वह विजय को अकेला नहीं दिखाए। वितरकों के इस अनुरोध पर गुरु दत्त ने अंत में विजय और गुलाबों को साथ जाते दिखाया था । इस अंत पर भी, गुरु दत्त और अबरार अल्वी के बीच बहस हुई क्योंकि अबरार अल्वी मूल अंत चाहते थे। 






प्यासा को प्रारम्भ में बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रसाद नहीं मिला था।  किन्तु बाद में फिल्म ने गति पकड़ ली और १९५७ की दस सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्मों में सम्मिलित हो गई।  यह बात अलग है कि फिल्म को तत्कालीन पत्रकारों ने बहुत नापसंद किया था। उनका कहना था कि विजय कैसा समाज विरोधी चरित्र था, जो समाज पर एक वेश्या को महत्त्व देता था।  इस चरित्र को निराशाजनक भी माना गया। यहाँ तक कि फिल्म कंपेनियन द्वारा २०२३ किए गए सर्वेक्षण में, १५० फिल्म समालोचकों, निर्देशकों और उद्योग के विशेषज्ञों ने सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली और गुरुदत्त की प्यासा से आगे, शोले को सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ भारतीय फिल्म चुना। जबकि, इस फिल्म को टाइम मैगज़ीन की २०वीं सदी की शीर्ष १०० फ़िल्मों की सूची में सत्यजीत रे की अपू त्रयी के साथ सम्मिलित किया गया ।  





गुरुदत्त की निर्देशक के रूप में प्यासा अंतिम सफल फिल्म थी। प्यासा के बाद उन्होंने कागज़ के फूल का निर्देशन किया, जो उनकी आखिरी निर्देशित फिल्म थी। यह फिल्म बड़ी फ्लॉप हुई थी।  

Friday, 7 November 2025

फिल्म रिलीज़ से पहले बिकिनी से चर्चित हुई थी मुनमुन सेन !








१९८४ में एक एक्शन फिल्म अंदर बाहर की बहुत चर्चा थी।  यह चर्चा फिल्म के दो नायकों अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ के कारण नहीं, बल्कि इस फिल्म की नायिका के कारण थी।  फिल्म प्रदर्शित होने से पहले ही चर्चित हो चुकी यह अभिनेत्री मुनमुन सेन थी।  





मुनमुन से की दो कारणों से चर्चा थी।  निर्माता रोमू सिप्पी और निर्देशक राज एन सिप्पी की, हॉलीवुड फिल्म ४८ ऑवरस की हिंदी रीमेक फिल्म की नायिका टू पीस  बिकिनी में चित्र बॉम्बे की बड़ी अंग्रेजी हिंदी पत्र पत्रिकाओं में पसरे हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था कि बॉलीवुड को नई सेक्स बम मिल गई।  





उस समय कई ऎसी ऎसी अभिनेत्रियां थी,  जो बिंदास अंग प्रदर्शन कर रही थी।  मुनमुन सेन के उरोजों और पतली कमर में ऐसा क्या था कि हर जगह एक नाम था मुनमुन सेन? इसका कारण था मुनमुन सेन की माँ और उनका राजघराने से सम्बंधित होना।  





मुनमुन सेन की माँ, बॉलीवुड की प्रख्यात फिल्म अभिनेत्री सुचित्रा सेन थी।  सुचित्रा सेन हिंदी फिल्मों की रोमांटिक नायिका नहीं थी। वह एक ऎसी अभिनेत्री थी, जिनके अभिनय का लोहा सभी मानते थे। वह एक ऎसी अभिनेत्री थी, जिनके शरीर से पल्लू हटता नहीं था। ऎसी प्रतिष्ठा वाली अभिनेत्री की बेटी बिकिनी में ! यह हिंदी दर्शकों का आठवां आश्चर्य था। दूसरा यह कि वह त्रिपुरा के राजघराने के दीवान की पड़पोती थी। उनकी सास, कूच बिहार के राजघराने की थी। 





कुछ भी हो, अंदर बाहर २८ सितम्बर १९८४ को प्रदर्शित हुई।  अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ की सुपरहिट जोड़ी वाली अंदर बाहर को मुनमुन सेन की बिकिनी नहीं बचा सकी।  फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी।  मुनमुन सेन की बिकिनी का जादू समुद्र के ज्वार की तरह पीछे उतर गया। 





सुचित्रा सेन ने असफल प्रवेश फिल्म के बाद भी हिंदी और बांगला सही लगभग ६० फिल्मों और चालीस टीवी में शो में अभिनय किया।  किन्तु, एक भी ऐसी फिल्म नहीं है, जिसकी सफलता का श्रेय मुनमुन सेन के अभिनय को मिले।





हाँ, शादीशुदा होने के बावजूद उनके रोमांस के चर्चे खूब हुए।  उनका यह रोमांस, पहली फिल्म अंदर बाहर के निर्माता रोमू सिप्पी के साथ शुरू हो गया था।  बाद में, उनका नाम सैफ अली खान और विक्टर बनर्जी के साथ भी जुड़ा।  अब यह बात दूसरी है कि उनकी बिकिनी की तरह उनके रोमांस भी ठन्डे साबित हुए। 





मुनमुन सेन की फिल्म तनाव, फूलों के जख्म, सन्देश द डाउट, लेडीज जेल, एक और एक  ग्यारह जैसी फ़िल्में बनने से पहले ही बंद हो गई। फिल्म बारूद द फायर (२०१०) के बाद, उनकी कोई भी हिंदी फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई।  

Monday, 3 November 2025

गैंगस्टर फिल्मों का प्रारंभ करने वाली परिंदा !



यह घटनाक्रम १९८५ का है।  विधु विनोद चोपड़ा अपनी पंकज कपूर, सोनी राजदान, अमोल पालेकर, नसीरुद्दीन शाह और शबाना आज़मी अभिनीत फिल्म खामोश को छविगृहों में प्रदर्शित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे।  कोई भी वितरक इस फिल्म को लेने के लिए तैयार नही था। बताते हैं कि विधु को खामोश को स्वयं ही मुंबई के एक सिनेमाघर रीगल में एक प्रिंट में प्रदर्शित करना  पड़ा था।  इसलिए, उनके सामने अपनी फिल्म परिंदा के लिए वितरक जुटाने की चिंता तो थी ही।




  

हिंदी फिल्म उद्योग में, कई वर्जनाएं अर्थात टैबू रहे है। इन्हे किसी न किसी फिल्म  ने ही तोडा है। परिंदा ऎसी ही एक फिल्म थी। यह पहली फिल्म  थी,जिसमे एक गैंगस्टर को केंद्र  में रखा गया था। इसने फ़िल्म निर्माताओं की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया था।  विशेष रूप से राम गोपाल वर्मा और महेश मांजरेकर प्रमुख थे।  इन दोनों फिल्मकारों ने डरवर्ल्ड पर आधारित दो प्रशंसित फ़िल्में सत्या (१९९८) और वास्तव: द रियलिटी (१९९९)। गैंगस्टर फिल्मों के माहिर अनुराग कश्यप भी इन फिल्मों से  प्रभावित हुए।  उन्होंने कहा था कि परिंदा और शिवा की हिंसा ने उन पर प्रभाव डाला था। 




इस फिल्म को यथार्थवादी शैली में फ़िल्माया गया था। अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के रोमांटिक जोड़े के बावजूद फिल्म में  केवल दो गाने रखे  गए थे। कमरों के दृश्य में प्रकाश का उपयोग दिन के समय सूरज के प्रकाश में किया था । इस फिल्म का मूल शीर्षक कबूतरखाना था। फिल्म में, अनुपम खेर के चरित्र के मारे जाने का दृश्य, इसी भीड़-भाड़ वाले दादर, मुंबई स्थित कबूतरखाना में ही फिल्माया गया था। 




बम्बइया फिल्मों की परंपरा में, परिंदा की स्टारकास्ट भी बदलती रही। फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा ने इस फिल्म का विषय कर्मा के सेट पर अनिल  कपूर को सुनाया  । अनिल को कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने फिल्म तुरंत साइन कर ली ।




किशन की भूमिका के लिए, विनोद चोपड़ा किशन की  भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन को लेना चाहते थे। किन्तु, अमिताभ बच्चन ने अज्ञात कारणों से मना कर दिया।  फिर विधु ने किशन के किरदार के लिए नसीरुद्दीन शाह को साइन करने की कोशिश की, लेकिन विधु के साथ कुछ समस्याओं के कारण उन्होंने मना कर दिया। अगले कुछ महीनों में विनोद खन्ना, सुरेश ओबेरॉय, अजीत वच्चानी, यहाँ तक कि नाना पाटेकर भी किशन के किरदार के लिए विचार में थे।





नाना पाटेकर को अनिल कपूर ने अस्वीकार किया था। अनिल ने विधु से कहा कि नाना पाटेकर उनके भाई जैसे नहीं लगेंगे। अनिल ने सुझाव दिया कि जैकी श्रॉफ को लिया जाए। लेकिन किसी कारण से जैकी को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। जैकी तो विधु से मिलने में भी रुचि नहीं रखते थे। जब कास्टिंग बहुत मुश्किल हो गई, तो विधु ने अनिल को बड़े भाई और कुमार गौरव को छोटे भाई के किरदार में रखने का विचार किया। लेकिन विधु को लगा कि कुमार गौरव शायद गुस्से वाले किरदार में जंचेंगे नहीं। आखिरकार अनिल ने जैकी को फ़िल्म के लिए मना लिया। जैकी, अनिल पर फ़िल्माए जाने वाले एक गाने को सुनने के बाद मान गए। नाना पाटेकर को इस बात का बुरा लगा था कि अनिल कपूर ने उन्हें अपने बड़े भाई की भूमिका नहीं मिलने दी।  इस फिल्म के बाद, उनकी अनिल कपूर के साथ पहली फिल्म वेलकम थी। 





परिंदा के सितारों की तारीखें और लोकेशन की उपलब्धता के कारण परिंदा को शूट होने में तीन साल लग गए।  यद्यपि इस फिल्म की शूटिंग चालीस दिनों में पूरी हुई। इस फिल्म ने दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पांच फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, और यह 1990 के सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए अकादमी पुरस्कार हेतु भारत की आधिकारिक चयन थी, लेकिन यह फिल्म ऑस्कर के लिए  नामांकित नहीं हो पाई ।





परिंदा नाना पाटेकर की प्रमुख फिल्मों में एक थी। यद्यपि, नाना पाटेकर ने, परिंदा से पूर्व कम से कम दो दर्जन से मराठी और हिंदी फिल्मे कर चुके थे। उन्हें गमन में छोटी भूमिका के पश्चात बीआर चोपड़ा की फिल्म आज की आवाज़ में जगमोहन की भूमिका से पहचान मिली। उनकी मोहरा,अंधा युद्ध, अंकुश, आदि सफल फिल्मे कर चुके थे। किन्तु, परिंदा ने उन्हें अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित की उपस्थिति में भी अपनी भिन्न पहिचान बनाई। 





नाना पाटेकर के चरित्र अन्ना आग से डरता था और अपना सर पीटने लगता था। पाटेकर को, इसकी प्रेरणा हॉलीवुड फिल्म रेनमैन में डस्टिन हॉफमैन के चरित्र से मिली। इस फिल्म के क्लाइमेक्स में अन्ना आग से घिर कर मारा जाता है। इस शूटिंग में नाना पाटेकर के हाथ इस बुरी तरह से जल गए थे कि उन्हें दो महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था।  





इतनी बड़ी स्टारकास्ट के बाद भी, परिंदा का बजट मात्र १२ लाख तक सीमित था।  किन्तु, इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपना  झंडा गाड़ते हुए निर्माता को ९ करोड़ का व्यवसाय करवा दिया। 





परिंदा के गीत प्यार के मोड़ पे का निर्देशन संजय लीला भंसाली ने किया था, जो इस फिल्म में निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा के सहायक थे। उनके काम से खुश होकर, चोपड़ा ने भंसाली को अपनी अगली फिल्म १९४२ अ लव स्टोरी (१९९४) के सभी गानों के निर्देशन की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी ।





कुछ रोचक तथ्य- 

इस फिल्म में नया वर्ष मानाने का दृश्य नए वर्ष के दिन ही फिल्माया गया।  सेट पर ही शैम्पेन पी कर नया वर्ष मनाया गया। 





फिल्म के एक दृश्य में दिखाई गई  नाना पाटेकर के परिवार की तस्वीर, नाना के वास्तविक परिवार पत्नी नीलकांति और पुत्र मल्हार की थी। यह चित्र १९८५ ने खींचा गया था। ऑस्कर फिल्म विजेता निर्देशक डैन्नी बॉयल ने स्वीकार किया कि उन्हें अपनी फिल्म स्लमडॉग  मिलियनेयर के लिए मुंबई को समझने में फिल्म परिंदा से सहायता मिली।





वितरकों ने विधु विनोद चोपड़ा को क्लाइमेक्स में अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की जगह जैकी श्रॉफ का किरदार निभाने के लिए दस लाख रुपये मुफ़्त में देने का वादा किया था। लेकिन विधु विनोद चोपड़ा ने अपनी कहानी में कोई बदलाव नहीं किया।





विधु विनोद चोपड़ा ने उस दृश्य में एक लाश, एक वेटर का किरदार निभाया था जब अनिल टॉम ऑल्टर को मारने जाते हैं और उन्होंने ५-६  लोगों के लिए डबिंग भी की थी।





फिल्म में अन्ना का मुख्यालय एंटॉप हिल पर एक पानी की टंकी पर बनाया गया था, जिस पर आस-पास की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों का कूड़ा-कचरा फैला हुआ था। चोपड़ा ने यह जगह बृहन्मुंबई नगर निगम से किराए पर ली थी।





विधु विनोद चोपड़ा ने इस फिल्म की रीमेक ब्रोकन हॉर्सेज  २०१५ बनाई थी।