Sunday, 28 June 2026

#Pathan को ललकार रहा #AjayDevgn का #Chauhan !



अजय देवगन की आगामी एक्शन ड्रामा फिल्म चौहान की घोषणा उनके पिता और दिग्गज एक्शन डायरेक्टर वीरू देवगन की जयंती पर की गई है। यह फिल्म कश्मीर की पृष्ठभूमि है। इस फिल्म में अजय एक फौजी के अवतार में दिखाई देंगे। फिल्म १ अक्टूबर २०२७ को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।




  

फिल्म चौहान का टीज़र अनावृत होते ही इंटरनेट पर छा गया है। इसमें अजय देवगन का एक दमदार डायलॉग काफी वायरल हो रहा है, "पठानों से कहना, चौहान आ रहा है।" 
फिल्म की घोषणा के वीडियो में कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं और भारतीय सैनिकों की चुनौतियों को दिखाया गया है।  






अजय देवगन का बोला गया यह संवाद पठानों से अधिक शाहरुख़ खान के पठान को मिर्ची लगाने वाला प्रतीत होता है। कुछ ने यहाँ तक समाचार रेल दिया कि शाहरुख़ खान इस संवाद से बेहद झल्लाए हुए है। उन्हें यह अपने लिए चुनौतीपूर्ण संवाद लग रहा है। इसके कारण भी है। 





अजय देवगन और शाहरुख़ खान की प्रतिद्वंद्विता का प्रारम्भ १९९५ में, राकेश रोशन की फिल्म करण अर्जुन की कास्टिंग के समय जन्मा था।  उस समय, प्रारम्भ में इस फिल्म में शाहरुख़ खान के साथ अजय देवगन को लिया जाना तय हुआ था। कहा जाता है कि शाहरुख़ खान और अजय देवगन, दोनों को ही फिल्म की स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई थी। इसलिए दोनों ने ही यह तय किया कि वह फिल्म से निकल जाए। किन्तु, बताते हैं कि शाहरुख़ खान ने अजय देवगन को धोखा दिया और बाद में वापस आ कर राकेश रोशन से सौदेबाजी कर फिल्म में वापस आ गए और अजय देवगन की जगह सलमान खान को ले लिया गया। 





इन दोनों का दूसरा टकराव २०१२ की दिवाली में हुआ।  उस दिवाली शाहरुख़ खान की फिल्म जब तक है जान और अजय देवगन की फिल्म सन ऑफ़ सरदार प्रदर्शित हो रही थी।  जब तक है जान यशराज फिल्म्स की थी। जैसी की इस बैनर की तिकड़म होती है, इस बैनर ने वितरको पर दबाव बना कर अपनी फिल्म के लिए सिनेमाघर हथियाने शुरू कर दिए।  इसे लेकर अजय देवगन कम्पटीशन कमीशन ऑफ़ इंडिया भी गए थे। यद्यपि, अजय देवगन को दिवाली का हीरो माना जाता था। किन्तु, यशराज फिल्म्स की तिकड़मों के कारण अजय देवगन की फिल्म दिवाली का पूरा फायदा नहीं उठा पाई।






इस फिल्म का निर्देशन नीरज यादव कर रहे है। किन्तु, जिओ स्टूडियोज के साथ एक अन्य निर्माता आनंद एल राय का कलर येलो प्रोडक्शंस भी है।   बताते चले कि आनंद एल राय ने  शाहरुख़ खान के साथ फिल्म जीरो बनाई थी। यह फिल्म २०१८ की विनाशकारी फिल्म साबित हुई थी। 





कुछ भी हो शाहरुख़ खान को मिर्च लगना स्वभाविक है। वैसे वह भी इस प्रकार के खेल खेलते रहते हैं। उनकी फिल्म जवान के 'बेटे को हाथ लगाने से पहले बाप से बात कर' को सरकार के विरोध में तक उपयोग किया गया था।  इसलिए वह अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि आनंद एल राय और अजय देवगन ने इस बार खेला कर दिया है।  फिल्म चौहान का 'पठानो से यह कहना, चौहान आ रहा है' फिल्म को हिट बना चुका है।  अजय देवगन के प्रशंसक 'पठानों से कहना' शब्द को 'पठान से कहना' बना कर शाहरुख़ खान और उनकी फिल्म पठान के लिए चुनौती की तरह पेश कर रहे है। इस तरकीब से अजय देवगन की १ अक्टूबर २०२७ के प्रदर्शन के लिए तय फिल्म भारी प्रचार बटोर चुकी है।  






फिल्म के संवादों का इस तरह का प्रयोग निश्चित रूप से सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है।  कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह आज के समय में फिल्मों के विपणन और प्रचार की एक सोची-समझी रणनीति का भाग है। बॉलीवुड और भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक या सीमा-पार के संघर्षों पर आधारित फिल्मों के लिए ऐसे भारी-भरकम और आक्रामक संवादों का उपयोग सामान्य रहा है। फिल्म निर्माता जानते हैं कि ऐसे बयानों से सोशल मीडिया पर तुरंत चर्चा मिलती है और बहस शुरू हो जाती है। इससे फिल्म को मुफ्त का प्रचार मिल जाता है।






कश्मीर या पाकिस्तान के साथ संघर्ष की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों  का एक लक्षित दर्शक होता है।  ऐसे संवाद फिल्म के मुख्य नायक (चौहान) के साहसी और कड़े चरित्र को स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो राष्ट्रवाद और एक्शन फिल्मों के शौकीन दर्शकों को सिनेमाघरों तक आकर्षित करने का प्रयास है। 






यद्यपि, आलोचकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसी विशिष्ट समुदाय (जैसे पठान या कोई अन्य जातीय समूह) को सीधे तौर पर एक विलेन या चुनौती के रूप में पेश करने वाले संवाद सामाजिक विभाजन या रूढ़िवादिता को बढ़ावा दे सकते हैं। किन्तु, कल्पना के घोड़े पर सवार बॉलीवुड फिल्मे ऐसा विभाजन करने में विशेष समर्थ नहीं होती। 






इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार के संवाद केवल मनोरंजन और कहानी के विलेन-हीरो के टकराव के रूप में ही देखे जाने चाहिए। इसे समकालीन सामाजिक-राजनीतिक वातावरण का लाभ उठाने के प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है। यह दर्शको में फिल्म के  प्रदर्शन से पर्याप्त पूर्व ही भावनात्मक प्रतिक्रिया देने वाली कोशिश साबित होती है।  






अब कुछ हल्का हो जाये। फिल्म चौहान के टीज़र में जुम्मा चुम्मा दे दे गाने का प्रयोग फिल्म निर्माताओं की एक गहरी और दोहरी रणनीति को दर्शाता है। इसका अमिताभ बच्चन से कोई सीधा मिलान (Crossover) नहीं है, लेकिन इसके पीछे कुछ खास रचनात्मक और सामाजिक कारण अवश्य है 1 फिल्म में इस गीत का उपयोग कर विरोधाभास और प्रभाव पैदा करना।







टीज़र में कश्मीर (पुलवामा) के तनावपूर्ण माहौल, शुक्रवार की नमाज़ (जुम्मा) के बाद होने वाली पत्थरबाजी और लाउडस्पीकर पर होने वाले ऐलानों को दिखाया गया है।  इसी गंभीर बैकग्राउंड के बीच में अचानक से यह एनर्जेटिक और मस्ती भरा गाना बजता है, जो दर्शकों को चौंकाने और अजय देवगन की दमदार एंट्री को धमाकेदार बनाने के लिए पर्याप्त है।




निर्माताओं ने कश्मीर में जुम्मे (शुक्रवार) के दिन होने वाली पत्थरबाजी और पठान (स्थानीय चुनौती) को काउंटर करने के लिए फिल्मी अंदाज़ में इस गाने के शब्दों का सहारा लिया है।






'जुम्मा चुम्मा' एक बेहद लोकप्रिय रेट्रो गाना है। एक्शन फिल्मों में पुराने गानों को मॉडर्न बीट्स के साथ रीमिक्स या बैकग्राउंड में यूज़ करना आज की तारीख में दर्शकों को आकर्षित करने का एक लोकप्रिय ट्रेंड बन चुका  है।






पर इसका अमिताभ बच्चन से कोई सीधा मिलान नहीं है। टीज़र में अपने गाने के इस नए वर्जन के इस्तेमाल पर अमिताभ बच्चन ने सोशल मीडिया पर खुद इस वीडियो को शेयर किया।  उन्होंने अजय देवगन और मेकर्स की सराहना करते हुए लिखा, "अजय की सराहना, चौहान आ रहा है।"







अब यह बात दूसरी है कि सोशल मीडिया पर शाहरुख खान और अजय देवगन के प्रशंसकों के बीच युद्ध सा छिड़ गया है। कई इसे शाहरुख खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'पठान' पर सीधा कटाक्ष या ओपन चैलेंज मान रहे हैं।






ऎसी फिल्मों में राजनीतिक एंगल  (फिल्म में २०१८ के पुलवामा विस्फोट की पृष्ठभूमि और बड़े पैमाने पर पत्थरबाजी को दिखाए जाने के कारण) इंटरनेट पर एक वर्ग इसे प्रोपेगैंडा फिल्म कह रहा है। सोशल मीडिया यूजर्स इसकी तुलना 'द कश्मीर फाइल्स', 'द केरल स्टोरी' और हालिया राजनीतिक थ्रिलर फिल्मों से कर रहे हैं। वहीं कुछ आलोचकों का आरोप है कि फिल्म में एक खास 'हिंदू-मुस्लिम' और ध्रुवीकरण का एंगल देने की कोशिश की गई है।






विवाद चाहे जो भी खड़े किये जाएँ फिल्म चौहान पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। फिल्म के १५ महीने बाद प्रदर्शित होने तक हवा और बनेगी।  यह हवा निम्न कारणों से बनेगी -  






फिल्म चौहान  की कहानी की पृष्ठभूमि पुलवामा और कश्मीर का यथार्थ है। यह फिल्म की कहानी २०१८ के पुलवामा विस्फोट के बाद अपने तनाव की पृष्ठभूमि पर है।   





 
फिल्म में पत्थरबाजी का मुद्दा उठाया गया है। घटनाक्रम कश्मीर में होने वाली लोकल पत्थरबाजी और दंगों के इर्द-गिर्द है। टीज़र में दिखाया गया है कि कैसे स्थानीय युवाओं को गुमराह करके उनके हाथों में पत्थर थमाए जाते हैं।  






फिल्म भारतीय सुरक्षाबलों को चुनौतियां भी दिखाने वाली है कि  कैसे भारतीय सेना और सुरक्षाबल इन विषम परिस्थितियों और उपद्रवियों का सामना करते हैं। अजय देवगन इसमें एक निडर आर्मी ऑफिसर (चौहान) की भूमिका में हैं, जो आतंकवाद और हिंसा के खिलाफ एक बड़ी ताकत बनकर खड़ा होता हैं। 





   
यह फिल्म एक खास जुड़ाव का परिणाम है। यह पहली बार है जब अजय देवगन और फिल्म निर्माता आनंद एल राय किसी प्रोजेक्ट के लिए एक साथ आए हैं।  

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