यदि फ़िल्मकार गुरुदत्त आज जीवित होते
तो आगामी ९ जुलाई २०२५ को जीवन की शतकीय पारी खेल जाते। किन्तु, मात्र ३९ साल की अल्पायु में, १०
अक्टूबर १९६४ को इस प्रतिभाशाली फिल्मकार ने आत्महत्या कर इस संसार से विदा ले ली।
१९५१ में फिल्म बाज़ी से, निर्देशक के रूप में हिंदी फिल्म दर्शकों को मनमोहित करने वाले
गुरुदत्त ने, निर्देशक के रूप में बाजी के अतिरिक्त जाल, बाज़,
आरपार, मिस्टर
एंड मिसेज ५५, सैलाब, प्यासा
और कागज़ के फूल का निर्देशन किया।
उन्होंने निर्माता के रूप में, स्वयं के द्वारा निर्देशित फिल्मों के
अतिरिक्त सीआईडी,
चौदहवी का चाँद, साहब बीवी और गुलाम तथा बहारें फिर भी आएंगी जैसी कुल आठ फिल्मों का
निर्माण किया। उनके द्वारा बनाई गई बाद की इन चार फिल्मों के निर्देशक राज खोसला, एम् सादिक, अबरार अल्वी और शाहिद लतीफ़ थे।
यहाँ बताना उपयुक्त होगा कि गुरुदत्त
द्वारा निर्देशित प्यासा और कागज के फूल कालजई फ़िल्में मानी जाती है। गुरुदत्त की फिल्मों के कालजयी स्वरुप को देखते
हुए भारतीय कंपनी अल्ट्रा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट ग्रुप ने उनकी कालजयी फिल्मों का
पुनरुद्धार कर, गुरुदत्त के प्रशंसकों को श्रद्धांजलि स्वरुप
प्रस्तुत किया है। इन फिल्मों का अनावरण
कांस में चल रहे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में किया गया।
उनकी 100वीं जयंती समारोह के हिस्से के
रूप में, अल्ट्रा उन्हें एक महीने तक श्रद्धांजलि दे रहा
है। जुलाई 2025 में पूरे भारत में गुरुदत्त की पुनरुद्धारित की गई फिल्मों को पूरे
भारत के सिनेमाघरों में पुनः प्रदर्शित किया किया जाएगा। अल्ट्रा ने, गुरुदत्त की फिल्मों को किस कुशलता से
पुरारुद्धारित किया है, इसका अनुमान ऊपर दिए गए कोलाज में प्यासा और कागज के फूल के पहले और
बाद के चित्रों की तुलना कर किया जा सकता है.
डायमंड, पीएफ
क्लीन, रिवाइवल आदि जैसे उद्योग-अग्रणी सॉफ़्टवेयर का
उपयोग करके एक सावधानीपूर्वक फ्रेम-दर-फ्रेम 4K/2K मैनुअल बहाली प्रक्रिया के माध्यम से किया गया है । अल्ट्रा ने इन
पुरानी क्लासिक फिल्मों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए पुनर्जीवित किया है। यह पहल
भारत की सिनेमाई विरासत को संरक्षित करने और इसे दुनिया के साथ साझा करने की कंपनी
की व्यापक प्रतिबद्धता का एक हिस्सा है।
कंपनी ने अपनी खुद की स्वामित्व वाली तकनीकों का उपयोग करके चोरी चोरी, पैगाम (दिलीप कुमार), इंसानियत (देव आनंद और दिलीप कुमार की एक साथ अभिनीत एकमात्र फिल्म) जैसी भारतीय क्लासिक फिल्मों को रंगीन भी किया है। इस प्रकार रंगीन की गई फिल्में दर्शकों को कितना प्रभावित कर पाती है, इसका अनुमान तो इन फिल्मों के छविगृहों में प्रदर्शित होने के बाद ही लगाया जा सकता है,




