बजट की दृष्टि से १२० से १५० करोड़ के बजट से बनी बताई जा रहे, कुबेर बॉक्स ऑफिस पर निर्माताओं के लिए कुबेर का खजाना जुटाने वाली फिल्म नहीं बन पाई। इसने बॉक्स ऑफिस पर मात्र १३२ करोड़ का ग्रॉस ही किया। इस प्रकार से, कुबेर निर्माता श्री वेंकटेश्वर सिनेमाज और अमिगोस क्रिएशन्स की फिल्म कुबेर बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप फिल्म के खाने में दर्ज हो गई।
प्राइम वीडियो पर, कुबेर ३ घंटा दो मिनट की अवधि में स्ट्रीम हो रही यह फिल्म प्रारम्भ से ही दर्शकों में उत्सुकता पैदा कर देती है । समुद्र में तेल खोजने वाली सरकारी कंपनी को बढ़िया तेल का बड़ा भण्डार मिलने की सूचना मिलती है। किन्तु, भ्रष्ट मंत्री एक पूंजीपति से मिल कर इस खबर को असत्य घोषित कर देता है। वह पूंजीपति से मिल कर प्लेटफार्म पर विस्फोट कर, तेल खोजने वाले सभी तकनीशियनों को मार देता है। उसके बाद, यह घोषित कर कि उस कुएं से करोडो रुपये खर्च करने के बाद भी तेल नहीं मिला। इसके बाद, उस कुएं को पूंजीपति को बेच दिया जाता है।
इस घटनाक्रम को देखते हुए दर्शक स्तब्ध रह जाता है। उसकी सांस रुकी रहती है कि पूंजीपति और राजनेता गठजोड़ देश को कितना नुकसान पहुंचा रहा है। अब फिल्म घूमती है, पूंजीपति द्वारा नेताओं को पैसे ट्रांसफर करने की और। किस प्रकार से मासूम भिखारियों का प्रयोग कर, फर्जी कंपनियां खोली जाती हैं। भिखारियों के फर्जी खाते खोल कर हजारों ट्रांसफर किये जाते है। यह तमाम घटनाएं अत्यधिक चतुराई से बनी गई है। दर्शक इन्हे देखते रहनी को विवश हो जाता है।
किन्तु, उत्तरार्ध आते आते फिल्म बिखरने लगती है। फण्ड ट्रांसफर के लिए चुने गए चार भिखारियों में एक धनुष भी है। फण्ड ट्रांसफर का फर्जीवाड़ा करने वाले सजायाफ्ता सीबीआई अधिकारी नागार्जुन बने है। इस फर्जीवाड़े में पेंच तब पैदा होता है, जब पूंजीपति उन भिखारियों को एक एक कर मारना प्रारम्भ कर देता है। यही से धनुष और नागार्जुन इस फर्जीवाड़े के विरुद्ध हो जाते है।
फिल्म के कथानक के इस भाग को लिखने में शेखर कामुला असफल रहे है। उनका , निर्देशक असहाय हो जाता है। पटकथा बिखर जाती है। जब फिल्म का अंत होता है, तब तक प्रभाव खो चुकी होती है। फिल्म का फुसफुसे और पिटे घटनाक्रम के साथ अंत हो जाता है। दर्शक निराश हो उठता है।
तकनीक की दृष्टि से फिल्म सशक्त है। फिल्म का छायांकन बढ़िया हुआ है। कूड़े के बड़े ढेर पर फिल्माए गए दृश्य संकेत देते है कि किसी कुबेरपति को भी कूड़े के ढेर में मरना नसीब हो सकता है। फिल्म में देवी श्री प्रसाद का संगीत फिल्म की जान है। कार्तिक श्रीनिवास को फिल्म के संपादन में ढील नहीं छोड़नी चाहिए थी। फिल्म की लम्बाई थोड़ी कम की जानी चाहिए थी।
अभिनय की दृष्टि से फिल्म प्रशंसनीय है। धनुष अपना चरित्र बड़े महीन तरीके से करते है। वह एक भिखारी के मनोभाव को उकेरने में सफल होते है। नागार्जुन ने गलत तरीके से फंसा कर सजा दिलवाये गए पूर्व सीबीआई अधिकारी की भूमिका को स्वाभाविक तरीके से किया है। जिम सर्ब अपने खल चरित्र को पूरी निर्ममता से निभा जाते है। दलीप ताहिल इसमें उनके साथ है। फिल्म में अभिनेत्री रश्मिका मंदना प्रभावित कर सकती थी, किन्तु, उनकी समीरा को आधा अधूरा लिखा गया है। किन्तु, वह इस भूमिका को भी अच्छी तरह से कर ले जाती है।
अपने कथानक से कौतूहल पैदा करने वाली फिल्म कुबेर लेखन की कमजोरी के फिल्म के निर्माताओं के लिए कुबेर का खजाना नहीं जुटा पाती। किन्तु, ओटीटी प्लेटफार्म प्राइम वीडियो फिल्म को ४७ से ५० करोड़ में खरीद कर कुबेर का खजाना भरने का प्रयास करता है। फिल्म को ओटीटी के दर्शक एक बार तो देख ही सकते हैं।

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