आज, जिस फिल्म ब्लास्ट की बात की जा रही है, यह २०२६ में प्रदर्शित तमिल भाषा की मार्शल आर्ट्स एक्शन-थ्रिलर है। इस फिल्म को सुभाष के. राज ने निर्देशित किया है और निर्माता एजीएस एंटरटेनमेंट है।
फिल्म में एक्शन किंग अर्जुन एक कराटे मास्टर के रोल में हैं, जो अपने कॉम्बैट-ट्रेंड परिवार के साथ मिलकर एक बेरहम कॉर्पोरेट सिंडिकेट से लड़ता है। यह फिल्म २८ मई २०२६ को छविगृहों में प्रदर्शित हुई। अब यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है ।
फिल्म में तमिल फिल्मों के एक्शन किंग अर्जुन सरजा राजारमन (कराटे टीचर और समर्पित पिता) प्रीति मुकुंदन नीला (राजरमन की मार्शल-आर्टिस्ट बेटी) अभिरामी नीलावेनी (राजरमन की पत्नी), जॉन कोकेन वरुण दयालन (मुख्य विलेन और कॉर्पोरेट सिंडिकेट हेड) के रोल में।
फिल्म की कहानी राजारमन की है, जो एक मिडिल-क्लास मार्शल आर्ट्स टीचर है, और अपनी पत्नी और बेटी के साथ शांति से ज़िंदगी जी रहा है। उनका शांत रूटीन तब बिखर जाता है जब वरुण दयालन की लीडरशिप में एक बेरहम कॉर्पोरेट सिंडिकेट पास के पहाड़ में एक खास चीज़ के लिए ड्रिल करने की कोशिश करता है, एक ऐसा प्रोजेक्ट जिससे एक लोकल गांव के खत्म होने का खतरा है।
सिंडिकेट के शैतानी योजना की सबसे बड़ी बाधा राजारमन परिवार बनता है, जिससे लड़ाई की ट्रेनिंग पाए परिवार और कॉर्पोरेट हत्यारों के बीच एक बड़ा, स्टंट वाला टकराव शुरू हो जाता है।
फिल्म को इसके पुराने ज़माने के, जैकी चैन-स्टाइल एक्शन कोरियोग्राफी और हाई-एनर्जी थ्रिल के लिए आम तौर पर पॉजिटिव रिव्यू मिले। कई क्रिटिक्स ने खास तौर पर प्रीति मुखुनधन की परफॉर्मेंस और मार्शल आर्ट्स एक्शन के पीछे के मजबूत इमोशनल सपोर्ट को हाईलाइट किया।
यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक दृष्टि से सफल रही है। फिल्म ने अपने पहले कुछ दिनों में ही अपना १८ करोड़ का बजट वसूल कर लिया था। यह फिल्म अब तक पूरी दुनिया में ७० करोड़ से अधिक की कमाई कर चुकी है ।
ब्लास्ट को देखते समय आप अपनी जगह से हिलना नहीं चाहेंगे। फिल्म इतनी दिलचस्प है कि अगला सीन छोड़ने का मन नहीं करेगा। यद्यपि, फिल्म देखते समय, दर्शकों को मोहनलाल की मलयालम फिल्म दृश्यम की याद आ सकती है। किन्तु, इस फिल्म का ट्रीटमेंट, मोहनलाल की फिल्म से बिलकुल इतर है।
ब्लास्ट का कथानक भावनात्मक संवेगों के साथ साथ मार्शल आर्ट्स की कलाबाजियों के साथ आगे बढ़ता जाता है। कराटे में माहिर राजाराम का परिवार हार मानना नहीं सीखा है। वह टूटता नहीं। प्रत्येक घटना उन्हें सशक्त बनाती जाती है। यद्यपि, आपको कथानक में अतिरेक और अस्वाभाविकता लग सकती है। किन्तु, यही तो फिल्मों का संसार है।
| अर्जुन सरजा |
















