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Saturday, 4 April 2026

#NamitMalhotra की #Ramayan को पश्चिमी मान्यता की जरुरत क्यों ?



दो भागों में बनाई जा रही हिन्दू धार्मिक महाकाव्य रामायण पर आधारित फिल्म रामायण के निर्माता नमित मल्होत्रा, रामायण के कल ३ अप्रैल को अनावृत टीज़र पर भारतीय दर्शकों की प्रतिक्रिया से क्षुब्ध लगते हैं।   उन्होंने इसे लेकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा- मैं इसे (रामायण को) भारत में रहने वाले भारतीयों को खुश करने के लिए नहीं बना रहा हूँ। मेरी दृष्टि  में, यदि पश्चिम के लोगों को यह (टीज़र) पसंद नहीं आता, तो मैं इसे अपनी असफलता मानता। यह पूरी दुनिया के लिए है।





प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​के वक्तव्य से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर, कन्नड़ सुपरस्टार यश और बॉलीवुड अभिनेता सनी देओल अभिनीत यह फ़िल्म रामायण प्रारम्भ से ही एक ग्लोबल प्रोजेक्ट है। वह इसकी सफलता को मुख्य रूप से भारतीय दर्शकों की पसंद के बजाय पश्चिमी दर्शकों की स्वीकृति से मापते हैं।





नितेश तिवारी द्वारा निर्देशित, निर्माता नामित तिवारी की फिल्म रामायण का निर्माण भी पूरी विश्वस्तरीय भव्यता के साथ किया है। इस फ़िल्म में अवतार जैसी भव्यता के लिए अवतार के बजट से कहीं अधिक व्यय किया है। भारतीय संगीतकार एआर रहमान के साथ फिल्म का संगीत हॉलीवुड की डयन, द लायन किंग, ग्लैडिएटर, पाइरेट्स ऑफ़ द कॅरीबीयन, द डार्क नाइट त्रयी के संगीत निर्देशक हैंस ज़िमर  है। यह दो हिस्सों वाली महागाथा की पहली गाथा फ़िल्म दिवाली २०२६ पर रिलीज़ प्रदर्शित होने वाली है।




नामित मल्होत्रा का यह ट्वीट थोड़ा आक्रामक लगता है।  जैसे वह अति आत्मविश्वास दिखा रहे हों। इससे, टीज़र को देखने  के बाद कड़ी प्रतिक्रिया देने वाले दर्शक उत्तेजित हो सकते है।  क्या नामित यह वक्तव्य भारतीय दर्शकों की मानसिकता पर कोई बुरा  प्रभाव डाल सकता है ?

यदि, नामित के वक्तव्य को सकरात्मक सोंच के साथ पढ़ा जाये तो उनका यह बयान का स्वतः ही भारतीय दर्शकों की मानसिकता पर कोई दुष्प्रभाव पड़ता नहीं लगता। निःसंदेह कुछ लोगों को यह वक्तव्य भारतीय दर्शकों की उपेक्षा करने वाला या अभिजात्यवर्गीय लग सकता है, जिससे उनमें निराशा या अपनी संस्कृति को दरकिनार किए जाने अनुभूति हो सकती है। किन्तु, यह अनुभूति  गहरी मनोवैज्ञानिक क्षति के बजाय, ज़्यादातर लोगों की सोच, बयान के तरीके और संदर्भ पर निर्भर करती है।

नमित मल्होत्रा ​​ने प्रारम्भ से ही 'रामायण' को एक वैश्विक परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया है।  उन्होंने रामायण फ़िल्म 'केवल भारत में रहने वाले भारतीयों के लिए'  नहीं है, बल्कि एक ऐसी सार्वभौमिक महागाथा है जिसमें अवतार जैसी वीएफएक्स भव्यता के लिए डेंग का सहयोग, आईमैक्स प्रभाव और ऐसे कथानक को लिया गया है, जो दुनिया भर के लोगों को पसंद आए। उस समय उन्होंने कहा था कि वह चाहते हैं कि यह फ़िल्म एक उच्च-गुणवत्ता वाली सिनेमाई कृति के रूप में उभरे, जिसे किसी भी तरह की सांस्कृतिक  पहरेदारी की आवश्यकता न पड़े। पहले हॉलीवुड भारतीय कहानियों को 'गरीब और पीड़ित' लोगों की कहानियों के रूप में देखता था। इस फ़िल्म का उद्देश्य भारत की सभ्यतागत शक्ति को दुनिया के सामने लाना है।





उनके वक्तव्य के इस अंश कि 'यदि यह फिल्म पश्चिमी लोगों को पसंद नहीं आती है, तभी मैं इसे अपनी असफलता मानूंगा' मार्केटिंग की एक साहसी शैली है। दूसरे देशों के प्रोड्यूसर/निर्देशक (जैसे चीन की ब्लॉकबस्टर फ़िल्में या कोरियाई कंटेंट) भी अपनी घरेलू दर्शकों की उपेक्षा किए बिना अपनी फ़िल्मों की ग्लोबल पहुँच के बारे में बात करते हैं। मल्होत्रा ​​ने यह साफ़ किया है कि दुनिया के लिए 'एक ही रामायण' है। इसमें पूरब और पश्चिम का कोई बँटवारा नहीं है, और भारतीय लोग दुनिया भर में हर जगह रहते हैं।





कुछ भारतीय दर्शकों को यह बात क्यों चुभ सकती है।क्योंकि, रामायण केवल मनोरंजन नहीं है, यह एक पवित्र महाकाव्य है जो करोड़ों लोगों की हिंदू पहचान, मूल्यों (धर्म, मर्यादा, आदि) और राष्ट्रीय गौरव से गहराई से जुड़ा है। सफलता को मुख्य रूप से पश्चिमी मान्यता के इर्द-गिर्द गढ़ना ऐसा महसूस करा सकता है कि 'हमें अपनी ही कहानी के लिए बाहरी लोगों की मंज़ूरी चाहिए' यह औपनिवेशिक काल के बाद की उन पुरानी  संवेदनशीलताओं को जगाता है कि भारतीय संस्कृति को योग्य बनने के लिए 'तराशने' या उसे सार्वभौमिक बनाने की ज़रूरत है।





कई भारतीयों ने इसके दृश्यों को लेकर कुछ ने जीवों के डिज़ाइन को सामान्य/ओर्क जैसा या पीएस ४ के स्तर का कहा, अति वीएफएक्स प्रभाव, भक्ति-भाव की कमी की आलोचना की। जब निर्माता भारतीय दर्शकों की मुख्य उम्मीदों के स्थान पर वैश्विक (जिसे अक्सर पश्चिमी समझा जाता है) पसंद को प्राथमिकता देता हुआ लगता है, तो निराशा और बढ़ जाती है और लोग कहते हैं कि वे हमारी विरासत को बेच रहे हैं।





होता यह है कि हमारा मनोविज्ञान है कि भारतीय चीज़ें तभी सफल होती हैं जब पश्चिम उनकी तारीफ़ करता है। इससे  औपनिवेशिक हीन भावना वाली मानसिकता मज़बूत हो सकती है। बॉलीवुड में लंबे समय से दर्शकों को लेकर एक दोहरा तनाव रहा है 'आम भारतीय दर्शक बनाम वैश्विक अपील वाला। यदि कोई फ़िल्म घरेलू स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करती, लेकिन ऑस्कर/पश्चिमी तारीफ़ महत्वपूर्ण लगती  है, तो कुछ लोगों को लग सकता है कि उनके भावनात्मक/सांस्कृतिक जुड़ाव को कम करके आंका जा रहा है।





दर्शक बहुत समझदार होते हैं। वह टिकट खरीद कर, फिल्म देखने के बाद दूसरे लोगों को बताकर अपना फ़ैसला सुनाते हैं। मज़बूत सांस्कृतिक जुड़ाव, अच्छा निष्पादन आमतौर पर निर्माता के बयानों की परवाह किए बिना स्थानीय स्तर पर जीत दिलाता है। संभावित सकारात्मक पहलू, यथा गरीब भारत और पीड़ित महिला वाली वैश्विक रूढ़ि को तोड़ने की महत्वाकांक्षा, अगर सफल होती है, तो वास्तव में सामूहिक गौरव को बढ़ा सकती है। रामायण को भारतीय मूल सामग्री को हॉलीवुड-स्तर की तकनीक के साथ दिखाना, सशक्त अनुभव करा सकता है कि हमारी कहानियाँ सबसे बड़े मंच की हक़दार हैं।





ज़्यादातर भारतीय दर्शक मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर नहीं होते। वे हॉलीवुड, के-ड्रामा, एनीमे, आदि का आनंद बिना किसी पहचान के संकट के लेते हैं। वे तभी आलोचना करते हैं जब कोई फ़िल्म उन्हें असली नहीं लगती, इसलिए नहीं कि किसी निर्माता ने 'वैश्विक' शब्द का इस्तेमाल किया है।




निष्कर्ष के रूप में यह बयान रामायण जैसे भावनात्मक रूप से संवेदनशील विषय के लिए भड़काऊ और खराब शब्दों में कहा गया है, जैसी यह तीखी प्रतिक्रिया को न्योता देने वाला है और घरेलू भावनाओं के प्रति असंवेदनशील लगता है । इससे उन मुख्य दर्शकों के नाराज़ होने का खतरा है, जिन्हें लगता है कि 'हमारे महाकाव्य को पश्चिमी मान्यता की आवश्यकता अनुभव नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसे मानसिकता के लिए हानिकारक कहना बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना होगा। असली नुकसान तो तब होगा, जब फ़िल्म खुद कहानी की आत्मा को कमज़ोर कर दे, जैसे, सबको पसंद आने लायक बनाने के लिए बहुत ज़्यादा बदलाव करना या तकनीकी रूप से कमज़ोर बनना । दर्शकों की अपनी मर्ज़ी होती है। वह २०२६ की दिवाली पर परदे पर जो देखेंगे, उसके आधार पर फ़िल्म को पसंद या नापसंद कर सकते हैं, न कि किसी एक इंटरव्यू की किसी एक लाइन के आधार पर। अगर फ़िल्म भावनात्मक रूप से दिल को छू लेने वाले राम, मज़बूत मूल्यों और भव्यता को बिना कहानी के मूल तत्व से समझौता किए पेश करती है, तो भारतीय दर्शक इसे दिल खोलकर अपनाएँगे। अब चाहे पश्चिमी मान्यता मिले या न मिले।   

Friday, 24 October 2025

#Akhanda2Thaandavam का टीज़र

Thursday, 4 September 2025

कल ५ सितम्बर से प्रदर्शित हो रही है @MsAnushkaShetty ⁩ की फिल्म #Ghaati


 

Monday, 11 August 2025

#Animal की नक़ल की झलक #Baaghi4



निर्माता साजिद नाडियाडवाला की फिल्म बागी ४ की झलकियां आज इस फ्रैंचाइज़ी फिल्म के प्रशंसक दर्शकों के समक्ष है। बागी ४ के लिए, साजिद नाडियाडवाला निर्माता के अतिरिक्त कहानीकार और पटकथा लेखक की भूमिका में भी है। इस फिल्म के निर्देशक ए हर्षा है।





फिल्म का टीज़र खून से सने हुए हिंसक चेहरों से पटा हुआ है। फिल्म में संजय दत्त और टाइगर श्रॉफ जैसे अभिनेता ही रक्तरंजित नहीं है, बल्कि २०२१ की मिस यूनिवर्स हरनाज़ संधू और पंजाबी फिल्मों की हीर सोनम बाजवा भी खून से सनी हुई क़त्ल करती दिखाई गई है। हास्यास्पद बात यह है कि संजय दत्त तो संजय दत्त,  हरनाज़ भी धारदार हथियार से सामने वाले पर वार कर उसे ऊपर तान देती है।  कुछ ऎसी ही हिंसक दशा सोनम बाजवा की भी है।






कहानी पर रणबीर कपूर की संदीप रेड्डी वंगा निर्देशित फिल्म एनिमल की छाप है।  साजिद ने पटकथा लिखने में एनिमल के दृश्य साफ़ साफ़ कॉपी किये है। टीज़र का हर दृश्य एनिमल की चुगली करता है।  इसमें कोई नयापन है तो वह यह कि फिल्म की हसीनाएं भी कातिल है। कोई भी मुस्कुरा नहीं रही, हिंसक गुर्राहट दर्शकों की तरफ फेंक रही है।






फिल्म के पोस्टर तो एनिमल की चुगली करते ही है, टीज़र में जारी गीत मरजाना भी एनिमल के प्राक के गए सारी दुनिया जला देंगे की नक़ल है।





फिल्म बागी ४ से हरनाज संधू और निर्देशक ए हर्षा का बॉलीवुड से पहला परिचय हो रहा है। फिल्म ५ सितम्बर २०२५ को प्रदर्शित हो रही है। 

Saturday, 18 May 2024

#DulquerSalmaan की फिल्म #Lucky Baskhar का हिंदी टीज़र