Friday, 30 August 2013

प्रकाश झा का कमज़ोर 'सत्याग्रह'


प्रकाश झा की आज रिलीज़ हुई फिल्म सत्याग्रह की पूरी कहानी  मशहूर सामाजसेवी  अन्ना हजारे के दिल्ली में छेड़े गए आमरण अनशन और सत्याग्रह की चरित्र by चरित्र नक़ल है. प्रकाश झा और  उनकी लेखक टीम का कोई ओरिजिनल है तो वह यह कि अन्ना से प्रेरित करैक्टर दद्दू जी फिल्म के क्लाइमेक्स में पुलिस की फायरिंग का शिकार हो जाता है.  फिल्म को लिखा जितना मामूली गया है, उतना ही मामूली काम अजय देवगन, अमिताभ बच्चन, अर्जुन रामपाल, करीना कपूर, अमृता राव, विपिन शर्मा, आदि से लिया गया है, यहाँ तक कि  मनोज बाजपाई भी अपनी पिछली फिल्मों आरक्षण और राजनीती के करैक्टर को बुरी तरह से दोहराते हैं. प्रकाश झा को एक स्टार दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इतने बड़े सितारों की ऐसी की तैसी कर दी. बेचारी अमृता राव को न तो ढंग का रोल मिला, न ढंग के कपडे ही. अजय देवगन अब काफी थक चुके लगते हैं. भगवान् का शुक्र है कि अभी वह चुके नहीं हैं. अच्छा होगा कि  वह दोस्ती निभाने के बजाय रोल देखना शुरू कर दें. करीना कपूर ने खूबसूरत शक्ल के साथ बुरा काम अंजाम दिया है. ऐसा लग रहा है कि अमिताभ बच्चन ज़ल्द ही मिल्लेनियम फ्लॉप स्टार बनाने जा रहे हैं.   
आरक्षण फियास्को के बाद से प्रकाश झा अब अपनी फिल्मों के किसी जीवित या मृत,  वास्तविक या काल्पनिक घटना से रेसेम्ब्लेंस से साफ़ इनकार करते है, वह सत्याग्रह को अन्ना हजारे के आन्दोलन से प्रेरित मानने से इनकार करते हैं, लेकिन फिल्म का हर फ्रेम अन्ना के आन्दोलन की याद दिलाता है. पर इसके बावजूद उनका यह रील लाइफ आन्दोलन बिलकुल भी प्रभावित नहीं कर पाता. प्रकाश झा ने अन्ना के आन्दोलन को बीजेपी के समर्थन का आरोप भी फिल्म में लगाया है. विपिन शर्मा का गौरी शंकर का किरदार बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की याद ताज़ा करता है. प्रकाश झा ने जनता की नब्ज़ पकड़ने वाला विषय लिया ज़रूर था. लेकिन, वह खुद आन्दोलन की नब्ज़ नहीं समझ पाए. उनकी फिल्म का आन्दोलन बेहद सतही और निर्जीव लगता है. यह आन्दोलन जनता का नहीं इंडिविजुअल ख्वाहिशों वाला बन जाता है. सब कुछ इतना आसान दिखाया गया है कि एक आन्दोलन की भावना बिल्ड नहीं होने पाती. प्रकाश झा की फिल्म अन्ना के आन्दोलन का समर्थन भी नहीं करती और उसकी पोल खोलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती। अगर प्रकाश झा अजय देवगन के किरदार के जरिये पूंजीपतियों के अन्ना के आन्दोलन को समर्थन की पोल खोलते और अन्ना के समर्थकों की व्यक्तिगत ख्वाहिशों की पोल खोल पाते तो एक अच्छा काम कर पाते। लेकिन, वह शायद अन्ना के आन्दोलन से इतने भयभीत हैं कि उसकी पोल खोलने वाली कहानी गढ़ने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाते। कहा जा सकता है कि सत्याग्रह प्रकाश झा की सबसे कमज़ोर फिल्मों में से एक है.
अब बात आती है फिल्म देखने और इसे स्टार देने की. यह फिल्म प्रकाश झा की अन्ना के जन आन्दोलन पर बेहद कमज़ोर फिल्म है. आप देखना चाहे तो देखे ताकि यह जान सकें कि अन्ना के आन्दोलन के प्रति फिल्मकारों का रवैया क्या है. रही बात स्टार की तो मैं स्टार देता नहीं. क्योंकि, मुझे स्टार देने लायक फिल्म देखना आता नहीं। मैं जो लिखता हूँ आम दर्शक के नजरिये से. इस नज़रिए से मैं प्रकाश झा को एक स्टार देना चाहूँगा की उन्होंने बड़ी आसानी से इतने बड़े सितारों को मटियामेट कर दिया।  

Monday, 26 August 2013

मद्रास कैफ़े जा रहे हैं दर्शक

                                                       मद्रास कैफ़े, चेन्नई एक्सप्रेस और वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा का वीकेंड बॉक्स ऑफिस कलेक्शन देखिये, ज़मीन  आसमान का फर्क नज़र आएगा।  दो हज़ार स्क्रीन में रिलीज़ जॉन अब्राहम  की फिल्म मद्रास कैफ़े ने पहले दिन स्लो स्टार्ट करते हुए २५ से ३५ प्रतिशत की ऑक्यूपेंसी के सात ५.१७ करोड़ का बिज़नस किया. शुक्रवार की शाम से ही मद्रास कैफ़े ने pickup करना शुरू किया. इस प्रकार से फिल्म ने शनिवार को ७ करोड़ कमाए। सन्डे को फिल्म ने जम्प लिया. बिज़नस हुआ ८.५० करोड़ का. इस प्रकार से मद्रास कैफ़े का वीकेंड कलेक्शन २०.६७ करोड़ का हुआ. इस प्रकार से जॉन अब्राहम ने अपनी पिछली सोलो फिल्म फ़ोर्स के वीकेंड रिकॉर्ड में सुधार कर लिया. फ़ोर्स ने वीकेंड में ५.०५, ४.७५ और ६.२० करोड़ का बिज़नस करते हुए कुल १६ करोड़ का वीकेंड कलेक्शन किया था.
                             चेन्नई एक्सप्रेस का कलेक्शन देखिये. शुक्रवार को इस फिल्म ने मद्रास कैफ़े के कलेक्शन का डेढ़ गुना यानि ३३.१२ करोड़ का कलेक्शन किया। इसके बाद फिल्म का कलेक्शन गिरना शुरू हुआ और अगले दो दिनों में फिल्म ने २८.०५ और ३२.५० का कलेक्शन किया, जो पहले दिन के कलेक्शन से कम था. ऐसा इस लिए हुआ कि चेन्नई एक्सप्रेस बेसिर पैर की स्टार अट्रैक्शन पर आधारित फिल्म थी.  जबकि,मद्रास कैफ़े में कंटेंट था. फिल्म मकर की  ईमानदारी थी. जबकि, चेन्नई एक्सप्रेस हॉलिडे क्राउड को भुनाने के लिए प्रदर्शित की गयी थी. ऐसी फिल्मों का दर्शक फिल्म के कंटेंट से नहीं, फिल्म के अग्रेस्सिव पब्लिसिटी का शिकार हो कर फिल्म देखने आता है. मद्रास के चेन्नई संस्करण की यही त्रासदी है.  

Friday, 23 August 2013

एक बार ज़रूर जाइये 'मद्रास कैफ़े'

                   
                     निर्माता जॉन अब्राहम की इस शुक्रवार रिलीज़ फिल्म मद्रास कैफ़े बॉक्स ऑफिस पर खान अभिनेताओं वाली फिल्मों जैसा धमाल नहीं मचाएगी. यह फिल्म सौ करोड़ क्लब में आने की सोच भी नहीं सकती. लेकिन, इतना तय है कि मद्रास कैफ़े जॉन अब्राहम और शुजित सिरकार की जोड़ी एक ईमानदार कोशिश है. विक्की डोनर से उन्होंने लीक से हट कर फिल्मों का जो सिलसिला शुरू  था, उसकी दूसरी कड़ी है मद्रास कैफ़े।
                      मद्रास कैफ़े का हीरो जॉन अब्राहम हैं. लेकिन उन्होंने कहीं भी अपने करैक्टर को लार्जर देन लाइफ बना कर दर्शकों की तालियाँ बटोरने की झूठी कोशिश नहीं की. मद्रास कैफ़े की कहानी ८० के  दशक और शुरूआती ९० के दशक तक फैले श्रीलंका के सिविल वॉर पर है. फिल्म में रियल करैक्टर के नाम बदल दिए गए हैं. श्रीलंका की सेना और तमिल ईलम के विद्रोहियों के संघर्ष, भारतीय सेना का पीस कीपिंग फ़ोर्स के रूप में सिविल वॉर में हस्तक्षेप और असफलता जैसी प्रोमिनेन्ट घटनाओं को फिल्म में शामिल किया गया है. फिल्म ख़त्म होती है राजीव गांधी की हत्या के साथ.
                      जॉन अब्राहम ने विक्की डोनर के शुजित सिरकार को एक बार फिर अपनी फिल्म का डायरेक्टर बनाया है.  फिल्म को शोमनाथ डे और शुदेंदु भट्टाचार्य ने लिखा है. इन दोनों ने बहुत चुस्ती से अपना काम किया है. शुजित ने हर फ्रेम को बिना अतिरेक में गए स्वाभाविक ढंग से फिल्माया है. फिल्म में श्रीलंका में संघर्ष के दृश्य हैं, लेकिन कहीं भी documentry का एहसास नहीं होता. फिल्म देखते समय ऐसा लगता है जैसे हम रियल श्रीलंका में घूम रहे हैं. फिल्म कहीं भी हिंसक नहीं लगती. तभी तो इस फिल्म को यु /ए  प्रमाण पत्र दिया गया है. मद्रास कैफ़े का रॉ एजेंट विक्रम सिंह आम आदमी से थोडा हट कर ही है. पर उसे सुपरमैन नहीं कहा जा सकता. वह लिट्टे के लोगों द्वारा पकड़ा जाता है. उसके डिपार्टमेंट के लोग उसे धोखा देते है. लेकिन, वह इन सबसे रेम्बो के अंदाज़ में नहीं निबटता। एक जिम्मेदार अधिकारी जैसा व्यवहार करेगा, वैसा ही व्यवहार विक्रम सिंह करता है. यही फिल्म की खासियत है.
                      मद्रास कैफ़े की सबसे बड़ी खासियत है इसके सामान्य और स्वाभाविक चरित्र। यहाँ तक कि प्रभाकरन और उसके साथियों का चित्रण भी स्वाभाविक हुआ है. श्रीलंका से लेकर दिल्ली तक तमाम करैक्टर अपने स्वाभाविक अंदाज़ में हैं, यहाँ तक कि राजीव गांधी का चरित्र भी. फिल्म के हीरो जॉन अब्राहम है. वह बहुत अच्छे एक्टर नहीं। लेकिन अपना काम ईमानदारी से करते हैं. उन्हें एक एजेंट के रोल में अपने शरीर पर थोड़ी चुस्ती लानी चाहिए थी. चलने फिरने के अंदाज़ को बदलना चाहिए था. शुजित सिरकार को इस और ध्यान देना चाहिए था।  लेकिन शायद उनके लिए करैक्टर के बजाय कथ्य ज्यादा महत्त्व रखते थे. रॉकस्टार के बाद नर्गिस फाखरी एक विदेशी अखबार की पत्रकार जाया के रोल में हैं. उन्होंने अपना काम ठीक ठाक कर दिया है. यह रोल टेलर मेड जैसा था. जॉन अब्राहम की पत्नी के रोल में राशी खन्ना का काम बढ़िया है. अजय रत्नम एना भास्करन की भूमिका में स्वाभाविक हैं. श्री के रोल में कन्नन भास्करन स्वाभाविक हैं.श्रीलंका में रॉ के लिए काम कर रहे बल की भूमिका में प्रकाश बेलावादी के लिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि उनके रूप में हिंदी फिल्मों को एक विलेन मिल गया. लेकिन उनमे संभावनाएं हैं.  कैबिनेट सेक्रेटरी की भूमिका में पियूष पाण्डेय ठीक लगे हैं. सिद्धार्थ बासु रॉ चीफ के रूप में जमे नहीं।                      
                       इस फिल्म के लिए शांतनु मोइत्रा का संगीत, चंद्रशेखर प्रजापति का संपादन, कमलजीत नेगी का कैमरा वर्क ,मनोहर वर्मा के स्टंट वीरा कपूर की डिजाइनिंग और मेकअप डिपार्टमेंट की टीम का काम एसेट की तरह है. यह लोग फिल्म को रिच और दर्शनीय बनाते हैं. मद्रास कैफ़े को बेहतरीन टीम वर्क का नमूना कहा जाना चाहिए।
                       अभी मई में जॉन अब्राहम की फिल्म शूटआउट at वडाला रिलीज़ हुई थी. मान्य सुर्वे बने जॉन अब्राहम की ज़बरदस्त बॉडी और ओवर एक्टिंग पर खूब तालियाँ बजी थीं. मगर इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है. मौका निकाल कर सलमान खान की तरह बॉडी दिखाने के बजाय जॉन ने अपने अभिनय के जरिये अपना काम ईमानदारी से किया है. यकीन जानिये सिनेमाहाल में बैठा दर्शक जॉन अब्राहम के कारनामों पर तालियाँ नहीं बजाता। लेकिन, जब फिल्म ख़त्म होती है तो वह कुछ सोचता सा उठता है. वह मद्रास कैफ़े में कहीं खोया हुआ होता है. यही फिल्म की सफलता है.
                       जॉन अब्राहम ने अपना काम ईमानदारी से कर दिया है. अब बारी दर्शकों की है. वह मद्रास कैफ़े में एक बार ज़रूर। यहाँ मिलने वाली श्रीलंका की कॉफ़ी आपको निहाल कर देगी. तो क्या जा रहे हैं आप दर्शक बन कर आज ही.










 

Monday, 19 August 2013

शिकागो में तीन महीने तक धूम (3)


पिछले दिनों यशराज फिल्म्स  बैनर तले बनी धूम सीरीज की तीसरी फिल्म धूम ३ इसी साल दिसम्बर में दिसम्बर में क्रिसमस डे वीकेंड में रिलीज़ होगी.  इस फिल्म में दो धूम फिल्मों के अभिषेक  बच्चन और उदय चोपड़ा अपनी अपनी  भूमिका निबाह रहे  हैं।  पिछले दिनों इस फिल्म की शूटिंग शिकागो शहर में तीन  महीने तक हुइ. इस शूटिंग की कुछ झलकियाँ जारी हुई है. पेश है इनमे से कुछ फोटो।





 

Sunday, 18 August 2013

पैसे वालों की पिंकी बांधेगी तेजा की ज़ंजीर

                          अपूर्व लाखिया  की फिल्म ज़ंजीर २.० रीमेक है १९७३ में रिलीज़ अमिताभ बच्चन की हिट फिल्म ज़ंजीर  का रीमेक है. इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के इंस्पेक्टर विजय खन्ना दक्षिण के सुपर स्टार रामचरन  तेजा बने हैं। प्राण के शेर खान संजय दत्त बने हैं तो अजित का रोल प्रकाश राज कर रहे हैं.  प्रिया गिल २०१३ की मोना डार्लिंग हैं. महत्वपूर्ण है ज़ंजीर में जया बच्चन का माला का रोल।  रीमेक फिल्म में इसे प्रियंका चोपरा कर रही हैं. लेकिन, जया बच्चन की माला और प्रियंका चोपरा की माला में फर्क है. जया बच्चन  ज़ंजीर में एक चाकू छुरी तेज़ करने वाली लड़की की भूमिका में थी, जो सड़क पर ही मारा मारी करने को तैयार हो जाती थी. प्रियंका चोपरा की माला एक एन आर आई लड़की है. वह एक मर्डर की चश्मदीद गवाह है. जाहिर है कि १९७३ की माला और २०१३ की माला में फर्क होने के बावजूद समानता यह है कि दोनों ही मालाएं सड़क पर ही डांस गा सकती है. इस मामले में प्रियंका चोपरा की माला जया बच्चन की माला  से ज्यादा सेक्सी हो गयी है. प्रकाश महरा की ज़ंजीर में जया बच्चन चक्कू छुरियां तेज़ करा लो की  हांक लगा कर लोगों को आकर्षित करती थीं. पर इसमे सेक्स अपील जैसी कोई बात नहीं थी. इसका जिम्मा मोना डार्लिंग बनी बिंदु को सौंपा गया था. लेकिन, २०१३ की ज़ंजीर में माही गिल जैसी सेक्सी मोना होने के बावजूद प्रियंका चोपरा की माला को भी सेक्सी लगने की ज़रुरत पड़ गयी. वह पिंकी बन कर अपनी सेक्स अपील का प्रदर्शन कर रही है. वह फिल्म शूल की आइटम डांसर शिल्पा शेट्टी की सेंडिल में पैर डालते हुए मुंबई की न दिल्ली  वालों की, पिंकी है पैसे वालों की जैसा ललचाऊ आइटम करके दर्शकों को सेक्स अपील की खुराक दे रही हैं.
                          इसी साल शूटआउट एट वडाला के पिंकी बदमाश आइटम से सनी लियॉन और सोफी चौधरी को टक्कर देने वाली प्रियंका चोपरा खालिस पिंकी बन कर दर्शकों की नींद उड़ाने आ रही है. इसमे उनकी मदद मुन्नी बदनाम हुई जैसा सेक्सी गीत गाने वाली ममता शर्मा और हलकट जवानी और चकनी चमेली जैसे आइटम गीतों के कोरियोग्राफर गणेश अचार्य कर रहे हैं. क्या प्रियंका चोपरा इस साल के सेक्सिएस्ट हिट  आइटम की ज़ंजीर से तेजा की ज़ंजीर को हिट बनाने जा रही हैं!

                           

Thursday, 15 August 2013

कूड़ा एक्सप्रेस से लौटेंगे न दुबारा तक दर्शक

 
                      एक हफ्ते के अन्दर बॉलीवुड के दो बड़े सितारा अभिनेताओं ने बता दिया कि वह किस प्रकार से अपनी सुपर स्टार इमेज के जरिये अपनी कूड़ा फिल्मों को अच्छा इनिशियल दिलवा कर अपने प्रशंसक दर्शकों को बेवक़ूफ़ बना रहे है. ईद के दिन शाहरुख़ खान की चेन्नई  एक्सप्रेस  रिलीज़ हुई थी. पिछले चार सालों से सलमान खान बॉक्स ऑफिस पर अपनी कूड़ा फ़िल्में गिरा कर दर्शकों  को दुह रहे थे. इसीलिए जब ईद २०१३ पर ९ अगस्त को शाहरुख़ खान की फिल्म रिलीज़ होने का ऐलान हुआ तो उनके प्रशंसकों और बॉलीवुड के आम दर्शकों में उम्मीद जगी कि इस खान से कोई क्वालिटी फिल्म देखने को मिलेगी. लेकिन हुआ क्या चेन्नई एक्सप्रेस ने सलमान खान की पहले की कूड़ा फिल्मों की तर्ज़ पर कूड़ा उंडेलते हुए सलमान खान की फिल्मों का बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड तोड़ते हुए सबसे तेज़ १०० करोड़  कमा लिये. लेकिन, चेन्नई एक्सप्रेस पैसेंजर ट्रेन की तरह घटिया चाल और कूड़ा करकट फैली हुई थी. यही कारण था कि रिलीज़ के चौथे दिन इस फिल्म का कलेक्शन ६१ प्रतिशत से ज्यादा गिर गया और तीन  दिनों से बॉक्स ऑफिस पर एक्सप्रेस रफ़्तार भर रही फिल्म पैसेंजर रफ़्तार से चलने लगी. जिस फिल्म के लिए रोज आंकड़ों की बाजीगरी की जा रही थी, वह अब २०० करोड़ तक कब पहुंचेगी, यह कहना मुश्किल लग रहा है.

                      चेन्नई एक्सप्रेस का पैसेंजर निकलना अक्षय कुमार की फिल्म  इन मुंबई दुबारा के लिए वरदान से कम नहीं था.  क्योंकि,चेन्नई एक्सप्रेस के मुकाबले  अपॉन अ टाइम …को स्क्रीन कम मिल पाने के कारण ही वन्स अपॉन की रिलीज़ छह दिन आगे बढ़ा कर १५ अगस्त कर दी गयी थी. वैसे इसके बावजूद वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा को पहले दिन बहुत कम स्क्रीन मिले. दूसरे दिन यानि आज  मात्र २७०० प्लस स्क्रीन में ही रिलीज़ हो पायी है. लेकिन, १५ अगस्त को  खचाखच भरे सिनेमाघरों के दर्शकों ने  फिल्म के लिए मुसीबत पैदा कर दी. वन्स अपॉन के लिए दर्शकों में बेहद उत्साह था. एक तो हिट फिल्म का सीक्वल होने तथा दूसरा अक्षय कुमार की फिल्म होने के कारण।  अक्षय कुमार से दर्शकों को ख़ास अपेक्षा थी, क्योंकि उन्होंने दर्शकों को O M G ओह माय गॉड और स्पेशल २६ जैसी बढ़िया फ़िल्में दी थीं. मगर, एक हफ्ते से भी कम समय में अक्षय कुमार की फिल्म ने भी यह साबित कर दिया की बॉलीवुड के सुपर स्टार फेस्टिवल क्राउड को मूर्ख बना कर अपनी कूड़ा फिल्मों को सौ करोडिया बनाने का गेम खेल रहे है.
                        फेस्टिवल में कूड़ा फैलाने से नाराज़ दर्शकों ने चेन्नई एक्सप्रेस के कलेक्शन में भारी गिरावट पैदा कर सुपर स्टार्स को चेतावनी दे दी है. पूरी उम्मीद है कि दर्शक वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा को दर्शक दुबारा देखने ना जाएँ। ऐसे में अक्षय कुमार की फिल्म का  वीकेंड भी खराब जा सकता  है. पर यह कठोर चेतावनी होगी, दर्शकों की तरफ से बॉलीवुड के तमाम अभिनेताओं को.
                        चेन्नई एक्सप्रेस और वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा के द्वारा ईद-इंडिपेंडेंस डे वीकेंड में फैलायी गयी कूडागिरी के मद्देनज़र सोचने की जितनी ज़रुरत सुपर स्टार्स को है, उससे  कहीं ज्यादा सोचने की ज़रुरत दर्शकों को है कि वह कूड़ा फिल्मों का वहिष्कार करें। उन्हें वह ओपनिंग नहीं दे, जिससे बिग स्टार्स  उत्साहित हो कर अपना कूड़ा माल बॉक्स ऑफिस पर गिरा रहे हैं. अगर ऐसा हो गया तो निश्चित मानिये अगले तीन चार सालों में दर्शकों का फेस्टिवल वीकेंड सचमुच फेस्टिवल वाले उत्साह से भरा होगा.
 

वन्स अपॉन अ टाइम भी यह डॉन रोमांटिक नहीं हो सकता

               बॉलीवुड के फिल्मकारों को पूरा हक है कि वह रावण पर फिल्म बनायें।   लेकिन, यह ध्यान रखें कि रावण  को राम नहीं बनाया जा सकता।  इसलिए, जब रावण पर फिल्म बनानी है तो रावण के चरित्र को सावधानीपूर्वक बनाना पडेगा. ध्यान रखना होगा कि करैक्टर में ऎसी खामियां न रह जाएँ कि रावण न राम रहे , न रावण ही. मिलन लुथरिया निर्देशित रजत अरोरा की लिखी फिल्म वन्स अपॉन अ टाइम  दुबारा में अक्षय कुमार के करैक्टर के साथ ऐसा ही कुछ हुआ है.
               वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा २०१० की मिलन लुथरिया की फिल्म वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई  का सीक्वल है. २०१० की फिल्म हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहीम के रिलेशन पर थी. इसका सीक्वल दाऊद इब्राहीम और एक काल्पनिक करैक्टर की एक ही लड़की से प्रेम की वास्तविक-काल्पनिक प्रेम कहानी है. शोहेब खान गद्दार रावल को मारने इंडिया आता है. यहाँ आकर वह एक लड़की के प्रेम में पड़ जाता है. उसी लड़की से उसका बचपन का दोस्त असलम भी प्रेम करता है.
                फिल्म की निर्माता एकता कपूर और निर्देशक मिलन लुथरिया के साथ अक्षय कुमार भी यह कहते घूम रहे थे कि यह फिल्म दाऊद पर नहीं। लेकिन, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई का सीक्वल होने और अक्षय कुमार के करैक्टर शोहेब के मेकअप और गेटअप से दाऊद का धोखा होने से यह फिल्म दाऊद इब्राहीम पर फिल्म ही बैठती है. जितना आम दर्शक को मालूम है दाऊद एक अव्वल नंबर का ऐय्याश और क्रूर  गैंगस्टर था. उसका शगल फिल्म अभिनेत्रियों के साथ ऐय्याशी करना था. उसने मुंबई में धमाके कर सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जान ली थीं. ऐसे घटिया चरित्र को फिल्म का नायक बनाना मिलन लुथरिया और एकता कपूर की भारी भूल थी. उस पर उसे अपनी इमेज से बिलकुल अलग रोमांटिक दिखाया गया है. अक्षय कुमार पर रोमांस जम सकता है, लेकिन अक्षय कुमार के दाऊद पर यह रोमांस बिलकुल नहीं जमता. सो अक्षय कुमार बिलकुल हत्थे से उखड़े नज़र आते हैं. अलबत्ता कहीं कहीं उनका काम अच्छा है. इमरान खान को एक्टिंग आती ही नहीं। इसलिए वह अपने करैक्टर को बस निबाह ले जाते हैं. सोनाक्षी सिन्हा अब रूटीन होती जा रही हैं. उनके करैक्टर में बिलकुल जान नहीं थी, इसलिए उनकी एक्टिंग में जान का सवाल ही नहीं था. अन्य पात्रों में सोनाली बेन्द्रे, कुरुष देबू, सोफी चौधरी, टिकू , आदि सामान्य है. इस बेजान चरित्रों वाली फिल्म में केवल डेढ़ टांग का करैक्टर ही आकर्षित करता है, वह भी पितोबश त्रिपाठी के बेहतरीन अभिनय के कारण।
                 फिल्म की सबसे बड़ी कमी फिल्म की बेजान कहानी और ढीली ढाली स्क्रिप्ट है. शोहेब का करैक्टर न तो गैंगस्टर लगता है, न रोमांटिक। यह मिलन की बेबसी थी कि उसे एक रियल लाइफ गैंगस्टर को रोमांटिक दिखाना था. अब ऎसी मजबूरी में स्क्रिप्ट की मजबूती की डिमांड तो बनती ही थी. रजत अरोरा और उनकी स्क्रिप्ट टीम मेहनत करती नज़र नहीं आती. कोई भी फ्रेम प्रभावित नहीं करता। रोमांटिक फिल्मों के लिए चरित्रों के बीच की केमिस्ट्री और इंटेंसिटी महत्वपूर्ण होती है. फिल्म के तीनों मुख्य चरित्रों को ठीक ढंग से बुना ही नहीं गया है. सोनाक्षी सिन्हा का यस्मिन का चरित्र ना जाने किस दुनिया का है, जो फिल्म अभिनेत्री तो बन जाती है, लेकिन यह नहीं जानती की शोहेब एक डॉन है. इमरान खान तो त्रिकोण बनाने अनावश्यक टपकाए गए हैं. सो वह टपक कर बह जाते है. इन तीनों कलाकारों को वर्कशॉप करनी चाहिए थी ताकि एक दूसरे के चरित्रों की समझ हो जाती। फिल्म के करैक्टर अंडरवर्ल्ड के हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि भाषा को घटिया स्टार तक गिरा दिया जाये. फिल्म में महिलाओं के लिए अपमानजनक संवादों की भरमार है. डेढ़ टांग और उसकी प्रेमिका के बीच कार में सेक्स के दृश्यों को ख्वामख्वाह तूल दी गयी है. यह अरुचिकर हैं. प्रीतम ने पहली बार फिल्म से ज्यादा बेकार संगीत दिया है. फिल्म का कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं जिसकी तारीफ की जा सके या कुछ कहा जाये. फिल्म की लम्बाई उकताने वाली है.
                  बॉलीवुड का दुर्भाग्य है कि गैंगस्टर से आगे कुछ सोच नहीं पाता. उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह दाऊद की छाया से बाहर नहीं निकल पा रहा. उससे भी बड़ा दुर्भाग्य दर्शकों का है कि उन्हें फेस्टिव सीजन में वन्स अपॉन और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी रद्दी फिल्मों में अपना पैसा गलाना पड़ रहा है. अब यह देश का भी दुर्भाग्य है कि उसका जन गण देश के दुश्मन के  अवतार के लिए तालियाँ और सीटियाँ बजा रहा है.

                      


 

Wednesday, 14 August 2013

इस इंडिपेंडेंस डे दाऊद के लिए बजेंगी तालियाँ !


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Saturday, 10 August 2013

एक्सपंड हुआ The Expendables ३ बाहर हुए ब्रूस विलिस

                       
                          राइटर,  डायरेक्टर और एक्टर के रूप में सिल्वेस्टर स्टेलोन की २०१० में रिलीज़ एक्शन पैक्ड फिल्म The Expendables  में हॉलीवुड के सितारों की भीड़ थी तथा ८० मिलियन डॉलर में बनी इस फिल्म ने वर्ल्ड वाइड बॉक्स ऑफिस पर २७४ मिलियन डॉलर से ज्यादा कमाए थे. इससे उत्साहित हो कर स्टेलोन ने फिल्म के सीक्वल The Expendables २ को २०१२ में प्रदर्शित किया. पर इस सीक्वल फिल्म का निर्देशन साइमन वेस्ट ने किया था. इस फिल्म का बजट १०० मिलियन का था और फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ३०० मिलियन डॉलर से ज्यादा का कलेक्शन किया था. ऐसे सिल्वेस्टर स्टेलोन का फिल्म के तीसरे भाग को बनाना स्वाभाविक था. लेकिन, स्टेलोन का Tweet पढ़ कर लोग उस समय चौंक गए, जिसमे स्टेलोन ने ब्रूस विलिस को लालची बताया था. उसी समय यह कयास लगाया जाने लगा था कि The Expendables ३ में ब्रूस विलिस नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि पहले के दो हिस्सों में ब्रूस विलिस का रोल महत्वपूर्ण था. अब यह खबर है कि ब्रूस विलिस ने १ मिलियन डॉलर प्रतिदिन की मांग की थी। सिल्वेस्टर अपने दोस्त को इतनी ज्यादा रकम देने को तैयार नहीं थे. इसलिए, ब्रूस फिल्म की कास्ट से बाहर हो गए और उनकी जगह मेल गिब्सन आ गये. इन दोनों ने १९९५ में रिलीज़ फिल्म असेसिन में साथ काम किया था. The Expendables ३ के निर्देशन की कमान पैट्रिक Hughes के हाथ में होगी. यह फिल्म अगले साल १५ अगस्त को रिलीज़ होगी. 

Thursday, 8 August 2013

पेसंजरों के इंतज़ार में चेन्नई एक्सप्रेस !




                     राष्ट्रीय पर्वों के अलावा ईद, होली, दीवाली और क्रिसमस ऐसे त्यौहार होते हैं, जिनके वीकेंड में अपनी फ़िल्में रिलीज़ करवा कर तमाम खान और कुमार १०० करोडिया हीरो बन जाते है और सीना ताने घूमते हैं कि वह इतनी इतनी सौ करोडिया  फिल्म के हीरो हैं. यह अभिनेता बिना यह सोचे कि कचरे के ढेर पर खड़े होकर हॉलिडे वीकेंड का फायदा उठाते हुए उन्होंने दर्शकों को मूर्ख बनाया है. पिछले चार सालों से सलमान खान ईद पर अपना कचरा फिल्म परोस कर सौ करोडिया हीरो बने हुए थे. इस बार शाहरुख़ खान की बारी है.
                     रोहित शेट्टी से यह उम्मीद तो नहीं कि जाती कि वह कार ब्लास्ट करने के अलावा किसी सर पैर की कहानी पर फिल्म बनायेंगे. लेकिन दर्शक उम्मीद करता है कि बॉलीवुड का बादशाह खान कुछ अलग सा  देंगे। आज ईद पर रिलीज़ हो रही तथा ईद ईव पर पेड प्रीव्यू में दिखायी जा चुकी, शाहरुख़ खान और दीपिका पादुकोण की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस दोनों उम्मीदें तोड़ती है. रोहित शेट्टी ने ने इस बार बेसिर पैर की कहानी तक नहीं ली है. क्योंकि, फिल्म में कहानी नदारद है. युनुस सजावल की, शायद लोकेशन पर ही लिखी गयी, स्क्रिप्ट पर रोहित शेट्टी ने कैमरा चलवा दिया है. कहानी कही जाए तो बस इतनी सी है कि राहुल अपनी दादी के कहने पर अपने दादा जी की अस्थियाँ रामेश्वरम में विसर्जित करने का धोखा देने के लिए चेन्नई एक्सप्रेस पर बैठ जाता है. वह अपने दादा जी की अस्थियाँ कैसे बहा पाता है, यह फिल्म का ऊटपटांग ट्रैक है. कभी चेन्नई एक्सप्रेस में तो कभी लाल रंग की जीप में खान और पादुकोण भागते नज़र आते हैं. क्लाइमेक्स में आकर तो चेन्नई एक्सप्रेस बुरी तरह से डिरेल हो जाती है. कहा जा सकता है कि खान इस डिरेलमेंट में थोडा घायल हो सकते हैं.
                       फिल्म का कोई भी फ्रेम नया नहीं। लगता है जैसे रोहित शेट्टी ने अपना दिमाग बादशाह खान के हवाले कर दिया था तथा सेट पर स्पॉट बॉय से चाय परोसवाने और जोक क्रैक करने का काम कर रहे थे. शाहरुख़ खान और दीपिका पदुकोन ने अपने उम्दा अभिनय से इस कहानी के बिना घिसटती फिल्म को रफ़्तार देने की कोशिश की है. दीपिका का नाम वाकई खान से पहले रखने वाला है. वह अपने रोल को पूरी शिद्दत और भाव भंगिमाओं के साथ निभाती है. शाहरुख़ खान बहुत बढ़िया और उदाहरण योग्य हास्य अभिनय करते हैं. दक्षिण के निकितन धीर और सत्यराज के रोल टेलर मेड थे. उन्हें अपनी रियल लाइफ जैसा ही कुछ करना था, इसे वह बखूबी कर ले गए है.
                      फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में एक्सप्रेस ट्रेन के कोई लक्षण नहीं। विशाल शेखर का स्टीरिओ सिस्टम इस लायक नहीं कि अमिताभ भट्टाचार्य के बोल सुनाई पड़ सके. फरहाद और साजिद की जोडी अपने संवादों से दर्शकों को हंसा पाने में काफी हद तक कामयाब होती है. स्टीवन बर्नार्ड ने फिल्म को कसने की कोशिश की है. लेकिन, अच्छी स्क्रिप्ट की नामौजूदगी में वह फिल्म को कुछ ख़ास रफ़्तार नहीं दे सके. रोहित शेट्टी ने जय सिंह निज्जर के साथ फाइट कम्पोजीशन की है. इनमे कोई नयापन नहीं है.फिल्म पर भारी पड़ सकते हैं फिल्म के तमिल बहुल संवाद और पृष्ठभूमि। 
                     फिल्म की निर्माता के बतौर गौरी खान तथा UTV के रोंनी स्क्रूवाला और सिद्धार्थ रॉय कपूर का नाम दिया गया है. फिल्म के निर्माण में ९०  करोड़ खर्च होना बताया गया है. इतनी रकम की रिकवरी के लिए चेन्नई एक्सप्रेस के लिए वीकेंड इम्पोर्टेन्ट है. फिल्म को ३७०० से ज्यादा प्रिंट्स में रिलीज़ किया गया है. सब कुछ सोमवार पर निर्भर करेगा कि फिल्म किस हद तक ईद क्राउड को खींच पाती है.

पेसंजरों के इंतज़ार में चेन्नई एक्सप्रेस !

Tuesday, 6 August 2013

चेन्नई एक्सप्रेस के आगे चुनौतियों की मालगाड़ी !

                          
                           अगर कागज़ पर मीडिया  के बनाए शाहरुख़ खान के दुश्मन सलमान खान से भी पूछेंगे तो वह भी यही कहेंगे कि २०१३ की ईद पर रिलीज़ हो रही शाहरुख़ खान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस को हिट होने से कोई रोक नहीं सकता. लेकिन, इसके बावजूद शाहरुख़ खान भी यह स्वीकार करेंगे कि चेन्नई एक्सप्रेस के लिए हिट फिल्म टैग ही काफी नहीं होगा. शाहरुख़ खान बॉलीवुड के सुपर स्टार है. उन्हें बॉक्स ऑफिस का बादशाह खान कहा जाता है. अब यह बात दीगर है कि बॉलीवुड की पहली १०० करोड़ी फिल्म सलमान खान ने दी थी. सलमान खान ने १०० करोड़ कमाने की रफ़्तार कुछ इतनी तेज़ पकड़ी कि वह बॉक्स ऑफिस के टाइगर मान लिए गये. ईद का वीक पिछले चार सालों से सलमान खान को १०० करोड़ की फिल्म  देता रहा है. इस साल यह हफ्ता शाहरुख़ खान के पास है. या यो कह सकते हैं कि पूरा नहीं छह दिन. इसके बाद १५ अगस्त को अक्षय कुमार की फिल्म वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा रिलीज़ हो रही है. पहले, अक्षय कुमार की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के साथ ८ अगस्त को रिलीज़ हो रही थी. अक्षय कुमार और एकता कपूर ने ईद और स्वतंत्रता दिवस का हफ्ता भारी मन से छोड़ा था. इसीलिए, यह दोनों अपनी फिल्म को और  ज्यादा आगे खिसकाने के लिए तैयार नहीं हुए. इस लिए शाहरुख़ खान और उनकी फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के लिए कुछ चुनौतियाँ, बहुत बड़ी चुनौतियाँ लग रही हैं.
                           चेन्नई एक्सप्रेस कहानी है चालीस साल के राहुल की है, जो अपने दादा जी की अस्थियाँ उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार रामेश्वरम में विसर्जित करने के लिए चेन्नई एक्सप्रेस में सफ़र कर रहा है. ट्रेन में उसकी मुलाकात एक तमिल भाषी लड़की मीनम्मा से होती है, जो एक डॉन की बेटी है. राहुल ट्रेन में मीनम्मा  के पिता के गुंडों को एक आदमी का क़त्ल करते देख लेता है. पिता के आदेश पर मीनम्मा राहुल को अपने पिता के पास ले जाती  है. अब यह बात दीगर है कि रास्ते में दोनों का प्यार हो जाता है.
                            चेन्नई एक्सप्रेस रोमांस कहानी नहीं, जो बॉक्स ऑफिस शाहरुख़ खान का सफ़र सुहाना बना दे. क्योंकि, रोमांस तो शाहरुख़ खान का किला है. वह जब तक है जान तक अपनी तमाम रोमांस फिल्मों को हिट बनाते आये हैं. चेन्नई एक्सप्रेस तो एक एक्शन कॉमेडी है. शाहरुख़ खान को एक्शन रास नहीं आता है. उनकी एक्शन मोड वाली फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम होती रही हैं.
                             इसीलिए बादशाह  खान के लिए चुनौतियाँ कुछ ज्यादा कठिन हो जाती है. चेन्नई एक्सप्रेस के बॉक्स ऑफिस पर १०० करोड़ कमा लेने से खान की बादशाहत में मोर पंख नहीं लगेंगें। अब तो फरहान अख्तर का मिल्खा भी बॉक्स ऑफिस पर १०० करोड़ की दौड़ भाग रहा है. शाहरुख़ खान के सामने बड़ी चुनौती उस सलमान खान की फ़िल्में होंगी, जिनके साथ वह बाबा सिद्दीकी की इफ्तार पार्टी में गले लग चुके हैं. सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर के नाम 32.९२ करोड़ का हाईएस्ट सिंगल डे कलेक्शन का रिकॉर्ड दर्ज है. शाहरुख़ खान की एक दिन में सबसे ज्यादा २५ करोड़ का कलेक्शन करने वाली फिल्म रा.वन थी. सलमान खान की फिल्म दबंग २ ने वीकेंड में सबसे ज्यादा ६३.६० करोड़ कमाने का कीर्तिमान भी स्थापित कर रखा है. इसी साल रणबीर कपूर की फिल्म ये जवानी है दीवानी ने वीकेंड में ६२.११ करोड़ का कलेक्शन कर खान की चुनौतियाँ बढ़ा दी हैं. क्या शाहरुख़ खान रणबीर कपूर का रिकॉर्ड भी तोड़ पाएंगे? बात यहीं ख़त्म नहीं होती। सलमान खान द्वारा पेश चुनौतियाँ और भी है. सलमान खान की दो फिल्मों एक था टाइगर और दबंग २ ने सबसे जल्दी छह दिनों में सौ करोड़ कमा लिए थे. जबकि, शाहरुख़ खान की फिल्म रा.वन को सौ करोड़ कमाने में दस दिन लग गए थे. जबकि, यह फिल्म दीवाली वीक में लगी थी.
                                        चूंकि, हिंदी फ़िल्में बड़ी आसानी से, मल्टीप्लेक्स में ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज़ हो कर तथा टिकेट रेट्स बढ़ा कर, १०० करोड़ कमा ले रही हैं. इसलिए खान को आमिर खान की फिल्म ३ इडियट्स की चुनौती का भी सामना करना पड़ेगा, जो सबसे ज्यादा २०२ करोड़ कमा चुकी है. आमिर खान के रिकॉर्ड को तो सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर भी नहीं छू सकी है. टाइगर की बॉक्स ऑफिस पर दहाड़ २०० करोड़ पर आते आते मिमियाहट में बदल गयी थी. एक था टाइगर केवल १९८ करोड़ ही कमा सकी. बादशाह खान के सामने ओवरसीज की चुनौतियाँ भी दरपेश होंगी।  ओवरसीज मार्किट में ३ इडियट्स ने २५ मिलियन डॉलर और शाहरुख़ खान की माय नेम इज खान २३ मिलियन डॉलर की कमाई की थी. चेन्नई एक्सप्रेस को इन दोनों चुनौतियों को ध्वस्त करना होगा. क्या चेन्नई एक्सप्रेस इतनी रफ़्तार  पकड़ सकेगी कि बॉक्स ऑफिस की दौड़ में स्थापित किये गए तमाम माइलस्टोन को ध्वस्त कर सके?
                                        चेन्नई एक्सप्रेस और खान के सामने चुनौतियाँ ढेर हैं. पर फिल्म में उनके साथ मीनम्मा  अर्थात दीपिका पदुकोन है. दीपिका इसी साल दो १०० करोड़ कमाने वाली फ़िल्में रेस २ और यह जवानी है दीवानी दे चुकी हैं. हो सकता है कि वह हैटट्रिक मार लें. पर यह मास्टर स्ट्रोक होना चाहिए, ताकि पहले की चुनौतिया धराशायी हो जाएँ। क्या ऐसा होगा? शाहरुख़ खान की इस फिल्म का पेड प्रीव्यू ८ अगस्त को रखा गया है. हो सकता है कि यह प्रीव्यू कोई इशारा कर सके. 
 

सिल्क स्मिता का चोला पहन कर हिट हो गयी वीना मलिक भी !

                     


                      दक्षिण की फिल्मों में अपने उत्तेजक आइटम नंबर से याद की  जाने वाली सिल्क स्मिता  कभी भी हीरोइन के रूप में सफल नहीं हो सकीं। सिल्क स्मिता  ने सदमा जैसी हिंदी फिल्म में अभिनय भी किया. इस फिल्म में भी वह कामुक ही लगीं थीं।  २३ सितम्बर १९९६ को उनके घर में पायी गयी उनकी मृत देह ने पूरे भारतीय फिल्म उद्योग को दहला कर रख दिया. यहाँ तक कि सुदूर उत्तर भारत में भी उनकी अकाल मौत के सदमे को महसूस किया गया.
                       सिल्क स्मिता अपनी मृत्यु के डेढ़ दशक बाद भी किसी बड़ी एक्ट्रेस की तरह याद की जाती हैं. उनकी जीवनियाँ लिखीं गयीं, जो काफी बिकी भीं. २०११ में निर्माता एकता कपूर ने सिल्क स्मिता के जीवन  पर फिल्म बनाने के लिए मिलन लूथरिया के साथ शुरुआत की. मलयाली विद्या बालन को तेलुगु सिल्क स्मिता बनाया गया. मिलन लूथरिया ने सिल्क स्मिता की निजी ज़िंदगी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए बिना सिल्क स्मिता के जीवन के नाजुक और संवेदनशील लम्हों को छुआ. सिल्क स्मिता द डर्टी पिक्चर से एक ऎसी मासूम अभिनेत्री साबित हुई, जिसका अंत तक शोषण किया गया.
                      द डर्टी पिक्चर की सफलता के साथ ही दक्षिण में सिल्क स्मिता पर फिल्मों की घोषणाओ की बाढ़ आ गयी. कन्नड़ भाषा में बनायी गयी २ अगस्त को रिलीज़ फिल्म सिल्क सक्काथ मगा इनमे से एक फिल्म थी. इस फिल्म में सिल्क स्मिता का रोल पाकिस्तान से आयी अभिनेत्री वीणा मलिक ने किया है. वीणा मलिक आधा दर्जन हिंदी फ़िल्में कर चुकी हैं. इसके बावजूद वह खुद को स्थापित नहीं कर सकी है. आज भी वह अपने नग्न अर्ध नग्न उत्तेजक मुद्राओं वाले चित्रों के कारण विवादित रूप से मशहूर होती रहती है. लेकिन, उनके द्वारा अभिनीत सिल्क स्मिता पर कन्नड़ फिल्म सिल्क सक्काथ मगा ने उन्हें, कम से कम साउथ की फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर ही दिया है.
                    सिल्क सक्काथ मगा कर्णाटक राज्य के मंगलोर, उडुपी, हैदराबाद और मैसूर के ५० थिएटर में १४० स्क्रीन पर हाउस फुल जा रही  है। यह फिल्म ऐसे सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित हुई, जहाँ आम तौर पर कन्नड़ फ़िल्में नहीं प्रदर्शित की जाती है. एशिया के सबसे बड़े, १४८० दर्शक क्षमता वाले थिएटर में सिल्क सक्काथ मगा हाउस फुल दर्शकों द्वारा देखी गयी. यह फिल्म कन्नड़ फिल्म इतिहास की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गयी है.
                    दिलचस्प तथ्य यह है कि सिल्क सक्काथ मगा में सिल्क स्मिता का रोल कर रही वीणा मालिक ने द डर्टी पिक्चर की विद्या बालन जैसा संवेदनशील अभिनय नहीं किया है. उन्होंने फिल्म में ज़बरदस्त अंग प्रदर्शन किया है. उत्तेजक कामुक हाव भाव के जरिये वह दर्शकों को अपना  हैं. फिल्म में उनके ज़्यादातर सीन अंग प्रदर्शक और नाभि दर्शक हैं. वह अपने हीरो अक्षय के साथ गुत्थम गुत्था नज़र आती है. वीना मालिक जैसी उत्तेजना तो शायद अपने जीते जी सिल्क स्मिता तक नहीं पैदा कर सकी होंगी।

 

Monday, 5 August 2013

.....अब मुसीबत में अक्षय कुमार की फिल्म !

                
स्वप्निल जोशी अभिनीत मराठी फिल्म दुनियादारी १९ जुलाई से मुंबई के सिंगल स्क्रीन थियटरों में ज़बरदस्त हाउस फुल चल रही है. ९ अगस्त को  शाहरुख़ खान और दीपिका पादुकोण अभिनीत निर्देशक रोहित शेट्टी की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस रिलीज़  होनी है. शाहरुख़ खान की मास अपील भी है. इसलिए, रोहित शेट्टी इस प्रयास में थे कि उनकी एक्शन कॉमेडी फिल्म को ज्यादा मल्टीप्लेक्स स्क्रीन के अलावा ज्यादा से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थिएटर भी मिल जाएँ। ईद के वीकेंड में किसी खान की फिल्म रिलीज़ होने का मतलब बॉक्स ऑफिस पर सोने की खान खोदना होता है. इसलिए चेन्नई एक्सप्रेस को रिलीज़ करने के लिए दुनियादारी को दिखा रहे सिनेमाघरों को भी hire कर लिया गया. यह खबर राज ठाकरे की मनसे पार्टी की चित्रपट  शाखा को नागवार गुजरी। उन्होंने धमकी दे डाली कि अगर हाउस फुल जा रही दुनियादारी को उतार दिया गया तो वह पूरे महाराष्ट्र में चेन्नई एक्सप्रेस को डिरेल कर देंगे।  यहाँ तक कि चेन्नई एक्सप्रेस के पोस्टर तक उखाड़ फेकेंगे। यह धमकी कारगर साबित हुइ. रोहित शेट्टी ने दुनियादारी वाले सिनेमाघर की ओर नज़र उठाने तक से तौबा कर ली. 
लेकिन, कहानी अभी बाकी है दोस्त. अब मुसीबत अक्षय कुमार की फिल्म पर आने वाली है. अगर उनकी फिल्म वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई दुबारा तयशुदा तारिख यानी १५ अगस्त को रिलीज़ हुई तो स्वप्निल जोशी इस बार उनके लिए चुनौती साबित होंगे। स्वप्निल जोशी की एक अन्य मराठी फिल्म गोविंदा १६ अगस्त को रिलीज़ हो रही है. जिस प्रकार से स्वप्निल की फिल्म दुनियादारी को बॉक्स ऑफिस पर सफलता मिली है, प्रदर्शक ख़ास तौर पर महाराष्ट्र के सिंगल स्क्रीन exhibitor 'गोविंदा' आला रे गाना चाहते है. वह अक्षय कुमार की फिल्म पर स्वप्निल की फिल्म को तरजीह देंगे। चेन्नई एक्सप्रेस के कारण पहले से ही स्क्रीन स्पेस की कमी से जूझ रहे अक्षय कुमार के लिए यह खबर चिंता की खबर बनती जा रही है. अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा celulide के इस दाऊद का! क्योंकि, मराठा सर्किट हिंदी फिल्मों के बिज़नस के लिहाज़ से बड़ी और महत्वपूर्ण टेरिटरी है।
 
 

Friday, 2 August 2013

परिवार की परिवार द्वारा परिवार के लिए नहीं (तो) रब्बा मैं क्या करूं।

                      रब्बा मैं क्या करू निर्देशक अमृत सागर की दूसरी फिल्म है. उनकी  पहली फिल्म १९७१ छह  साल पहले २००७ में रिलीज़ हुई थी. अब छह साल बाद अमृत सागर की दूसरी फिल्म  रब्बा मैं क्या करू रिलीज़ हुई है तो प्रशंसित फिल्म १९७१ के निर्देशक की फिल्म के प्रति दर्शकों के मन में उत्सुकता पैदा होना स्वाभाविक है. मगर रब्बा मैं क्या करू के अमृत सागर दर्शकों को बुरी तरह से निराश करते है. सेक्स कॉमेडी शैली में अमृत सागर की यह फिल्म दो भाइयों और तीन मामाओं की कहानी है. भांजे की शादी होने वाली  है. अब कॉमेडी के नाम पर इस सेक्स कॉमेडी में बड़ा भाई अपने छोटे भाई से शादी से पहले किसी लड़की से सेक्स करने की सलाह देता है, क्योंकि उस लडके ने अपनी मंगेतर से शादी से पहले सेक्स नहीं किया है. मामा लोग भी पूरी तरह से लम्पट है. एक मामा अपनी पत्नी के सामने दूसरी औरत के साथ सेक्स करता है.  दूसरा मामा छुप कर औरतों से चुम्बन बाजी करता है. जब उसकी औरत पूछती है तो कहता है कि सिगरेट पी रहा था. तीसरा मामा पिछले कई सालों से अपने अवैध सम्बन्ध वाली औरत की ब्रा ढून्ढता  फिर रहा है. पूरी फिल्म यह समझ मे नहीं आता कि लेखक आकाश कौशिक क्या स्थापित करना चाहते हैं? क्या यह कि जो लडके शादी से पहले सेक्स नहीं करते वह मूर्ख होती हैं? तमाम औरतें बेदिमाग और मूर्ख होती हैं कि अपने अपने पतियों के लम्पटपन  को भांप नहीं पाती. पता नहीं ऎसी न जाने कितनी बेवकूफियां हैं फिल्म में, जो हंसाती नहीं सर दर्द पैदा करती हैं. अमृत सागर और आकाश कौशिक की अक्ल पर रोना आता है. हंसाने का सवाल ही कहाँ उठता है.
                      फिल्म का कोई पक्ष ऐसा नहीं जिसका जिक्र किया जा सके. इस फिल्म से रामानंद सागर के पोते और अमृत के बेटे आकाश चोपड़ा का लौन्चिंग हुई  है. पर आकाश चोप्रा बुरी तरह से असफल रहे है. उन्हें अगर अभिनय की खुजली लगी हो तो पहले किसी अच्छे इंस्टिट्यूट से अभिनय का क्रेश कोर्स कर लेना चहिये. वैसे उन्होंने फिल्म में बेक ग्राउंड म्यूजिक भी दिया है. पर वह म्यूजिक कम शोर शराबा ही लगता है. नवोदित ताहिरा कोछर से तो भगवान् बचाये. उन्हें दर्शकों पर दया करते हुए कम से कम फिल्मों में अभिनय नहीं करना चहिये. क्योंकि, दर्शक उन्हें अब झेल नहीं सकते. अर्शद वारसी अपने चचेरे भाई को शादी से पहले सेक्स करने की सलाह देते देते  कॉमेडी के नाले में डूब जाते हैं. इस फिल्म में टीनू आनंद, शक्ति कपूर और परेश रावल ने तीन मामाओं का रोल करके  अपना नाम बखूबी डुबो दिया है.  रिया सेन ग्लैमर के लिहाज़ से जितनी फीकी हैं, उतनी ही अभिनय के मामले में भी. अमृत सागर को श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इन वरिष्ठ कलाकारों का नाम डुबोने का काम बखूबी अंजाम दिया है. फिल्म में केवल राज बब्बर ही अपना काम ठीक कर ले जाते हैं. वैसे सिनेमाघर में बैठे दर्शक उन्हें देखते ही पांच रुपये में भरपेट भोजन का नारा बुलंद करने लगते है.
                     सलीम-सुलेमान की जोड़ी ने दर्शकों के सिरों में दर्द पैदा करने में अमृत का भरपूर साथ दिया है. लगता है कि फिल्म के संपादक  सत्यजीत गज्मर को उनके पेमेंट का चेक नहीं दिया गया था. तभी तो वह संपादन के बजाय फिल्म की रीलें ही बढ़ाते रह गये.
                     इस फिल्म के प्रोडक्शन तथा अन्य विभाग से सागर परिवार के सदस्य ही जुड़े हुए हैं. इसलिए कहा जा सकता है कि परिवार की परिवार द्वारा परिवार के लिए नहीं रब्बा मैं क्या करूं। 







 

भाग मिलखा भाग के टैक्स फ्री होने पर बवाल

कल उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक में दो फिल्मों भाग मिलखा भाग और 2 लिटल Indians को  दो महीने के लिए टैक्स फ्री करने का निर्णय लिया। आज अखबारों में caption था कि भाग मिलखा भाग कर मुक्त। यह फिल्म लखनऊ के एक सिंगल स्क्रीन थिएटर और दो तीन मल्टीप्लेक्स में लगी है। अखबारों ने यह तो लिखा कि यह फिल्में टैक्स फ्री हो गईं। लेकिन यह साफ नहीं किया कि शासनादेश जारी हो जाने के बाद ही टैक्स फ्री होगी। अब इस अधूरी खबर का असर यह हुआ कि जिन सिनेमाघरों में मिलखा साहब लगे हैं वहाँ दर्शक झगड़ा कर रहे है कि फिल्म तो टैक्स फ्री है, हमसे पूरा पैसा क्यों ले रहे हो। सिनेमाघर के लोग समझाते समझाते परेशान हैं कि अभी जीओ नहीं हुआ है। तो फिल्म टैक्स फ्री कैसे दिखाई जाये। दूसरी तरफ दिल्ली और Mumbai में बेचैनी है कि फिल्म को टैक्स फ्री होने में अब क्या परेशानी, जब कि गवर्नमेंट ने डिसिशन ले लिया। भाई लोगों को यह नहीं मालूम कि जब तक कोई फ़ाइल के साथ लगे नहीं सचिवालय में फ़ाइल सुस्त रफ्तार चलती है। यह फ़ाइल जब कैबिनेट नोट पर चीफ़ सेक्रेटरी के साइन के बाद, कर एवं निबंधन विभाग को वापस न आ जाए और शासनादेश पर प्रमुख सचिव कर एवं निबंधन के सिग्नेचर न हो जाये, फिल्म सिनेमाघरों में बिना टैक्स के नहीं दिखाई जा सकती। दर्शक यह समझने को तैयार नहीं। उधर फिल्म से जुड़े लोग परेशान हैं कि मिलखा इस हफ्ते जल्दी टैक्स फ्री नहीं हुई तो उसे अगले हफ्ते सिनेमाघर ही नहीं मिलेंगे। क्योंकि, चेन्नई एक्सप्रेस और वंस अपॉन आ टाइम इन मुंबई दोबारा से सभी सभी सिनेमाघर भर जाएंगे। बेचारे मिलखा पाजी! 

 

Thursday, 1 August 2013

क्या पास हो पायेगी बीए पास में शिल्पा शुक्ल !


                         २००७ की बात है. यशराज बैनर की फिल्म चक दे इंडिया धूम  मचा रही थी. फिल्म में भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच कबीर खान की भूमिका शाहरुख़ खान ने की थी. शिमिट अमीन की यह फिल्म सुपर हिट हो गयी थी. चूंकि, फिल्म में शाहरुख़ खान थे, इसलिए स्वाभाविक था कि महिला हॉकी टीम के काल्पनिक वर्ल्ड कप जीतने पर बनी इस फिल्म में भी फोकस खान पर बना. उनका रोल था भी इतना मज़बूत और   सहानुभूतिपूर्ण  कि वह उभर  कर आते. इसके बावजूद कि चक दे इंडिया का सेहरा खान के सर बांध रहा था, फिल्म में हॉकी की फॉरवर्ड खिलाड़ी  बिंदिया नाइक की भूमिका करने वाली अभिनेत्री शिल्पा शुक्ल उभर कर आईं।  बेशक फिल्म में उनका रोल मज़बूत था.  लेकिन,शिल्पा शुक्ल का अभिनय भी काफी दमदार था. वह शाहरुख़ खान के अपोजिट भी मजबूती से खडी रही. इस फिल्म के बाद शिल्पा शुक्ल बिंदिया नाइक के रूप में मशहूर हो गयी. बिंदिया नाइक शिल्पा पर भारी पड़ गयीं
 
                         चक दे इंडिया से पहले शिल्पा की एक फिल्म खामोश पानी रिलीज़ हुई थी. लेकिन, शिल्पी चक दे के बाद ही चर्चित और मशहूर हुईं।  अब यह बात दीगर है कि खूबसूरत अभिनय और हिट चक दे इंडिया के बावजूद शिल्पा शुक्ल को फ़िल्में नहीं मिली. चक दे इंडिया के बाद वह दो साल तक खाली बैठी रहीं। फिर रिलीज़ हुई उनकी फिल्म चल चलें।  यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर चल नहीं सकी. शिल्पा भी नहीं चलीं। सीजन ग्रीटिंग, मुंबई मस्त कलंदर और जंक्शन जैसी फ़िल्में कब आयीं और कब चली गयीं पता ही नहीं चल. तब आयी अंकुश भट्ट की फिल्म भिन्डी बाज़ार इंक।  इस फिल्म में शिल्पा ने एक जेब कतरी कंजरी की का रोल किया था. रोल दमदार था. शिल्पा ने एक्टिंग का दम भी दिखाया था. लेकिन उन्होंने नखरा भी दिखाया।  वह टेम्परामेंटल साबित हुइ. उन्होंने अपनी इस फिल्म के प्रमोशन पर ध्यान नहीं दिया. जबकि, फिल्म का पूरा फोकस शिल्पा के किरदार पर ही केन्द्रित था. नतीजे के तौर पर फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर नुक्सान पहुंचा. बहुत कम दर्शक फिल्म को मिले। अगली दो फ़िल्में फ्रोजेन और राजधानी एक्सप्रेस भी कुछ ख़ास रंग नहीं जमा सकीं।
                          जिस अभिनेत्री का रंग न जमे या उतरता लगे तो उसे क्या करना चहिये? अभिनेत्री मनीषा कोइराला इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है. सौदागर जैसी हिट फिल्म से करियर की शुरुआत करने वाली और कभी माधुरी दिक्षित की नंबर वन पोजीशन को चुनौती देने वाली मनीषा कोइराला का करियर जब  गिरना शुरू हुआ तो फिर गिरता ही चला गया. इसके साथ ही खुद को बॉलीवुड में जमाये रखने की जद्दो जहद में मनीषा कोइराला भी गिरती चली गयी. उन्होंने शशिलाल नायर की सेक्सी फिल्म एक छोटी सी लव स्टोरी कर डाली। इस फिल्म में मनीषा का रोल बेहद घटिया किस्म का था. इसे कोई भी स्तरीय और प्रतिष्ठित अभिनेत्री नहीं कर सकती थी. एक  छोटी सी लव स्टोरी का नुक्सान मनीषा कोइराला को हुआ. इस फिल्म के बाद मनीषा कोइराला के सामने शादी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था.

                          ऐसा लग रहा है कि शिल्पा  शुक्ल भी मनीषा की सेंडल में पैर घुसेड़े भाग रही है. अपनी असफलता से घबराई शिल्पा ने  भी एक इरोटिक फिल्म बीए पास कर ली। इस फिल्म की कहानी एक बड़ी उम्र की औरत के अपने से काफी कम उम्र के लडके के खुद के प्रति आकर्षण को अपनी सेक्सुअल डिजायर पूरी करने के लिए इस्तेमाल करने की है. इस फिल्म में उनके शादाब कमाल के साथ उत्तेजक बेड रूम सीन्स काफी चर्चा में है. शिल्पा अपने अभिनय के  बजाय चहरे पर कामुक हाव भाव लाकर अपनी फिल्म को गरम करने में जुटीहैं।
                          लेकिन, बीए पास की शिल्पा को मनीषा कोइराला के इतिहास के पन्ने पलटने चाहिये थे. वह एक छोटी सी लव स्टोरी के बाद भी गिरती चली गयीं। आज उनका कोई नामलेवा नहीं है. हो सकता है कि शिल्पा को मनीषा की याद न हो. पर वह पूनम पाण्डेय को तो याद कर ही सकती थीं. पूनम पाण्डेय की फिल्म नशा पिछले शुक्रवार ही रिलीज़ हुई थी. नशा को भी इरोटिक फिल्म की तरह प्रचारित की गयी थी. पूनम ने खुद के उभारों को कामुक ढंग से दिखाने में कोई कसार नहीं छोडी थी. इसके बावजूद ज्यादातर दर्शकों पर पूनम की बेअर  बॉडी का नशा नहीं चढ़ सका. ऐसे में शिल्पा कैसे उम्मीद कर सकती हैं कि बीए पास से उनकी सेक्स अपील का नशा दर्शकों पर चढ़ेगा !
                          शिल्पा और पूनम में जमीन आसमान का अंतर है. पूनम ने पिछले वर्ल्ड कप से खुद की पोर्नो एक्ट्रेस की तरह बना रखी थी. पूनम की फिल्म नशा को जितने भी दर्शक मिले वह इसी इमेज का नतीजा थे.  जबकि शिल्पा आज भी चक दे इंडिया की  ही है. वह बीए पास में फेल  रही है.