Thursday, 14 August 2025

नब्बे साल पहले अछूत कन्या से प्रेम किया था ब्राहमण युवक ने !



शाज़िया इक़बाल के निर्देशन में बनी ड्रामा फिल्मं धड़क २ बॉक्स ऑफिस पर ध्वस्त हो गई है। साठ करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म मुश्किल से २५ करोड़ का आंकड़ा भी नहीं पार कर पाई है। वह भी तब जबकि यह देश की कथित जाति व्यवस्था के ज्वलंत प्रश्न कोई उकेरती है।










स्पष्ट है कि छोटे जाति के लडके से बड़ी जाति की लड़की का रोमांस फिल्म के कथानक की तरह दर्शकों को भी पसंद नहीं आया। यहाँ तक कि उन जातियों को भी नहीं, जो इस जाति-व्यवस्था के शिकार बताये जाते है।






धड़क २ की असफलता के लिए कौन उत्तरदाई है ? ऊंची जात या निचली जात  ! या फिर लेखक और निर्देशक।  कदाचित दोनों ही।  क्योंकि, इस फ़िल्म को निर्देशक शाज़िया के साथ राहुल भाडवेलकर ने लिखा है। वास्तव में यह फिल्म मारी सेल्वाराज लिखित और निर्देशित तमिल फिल्म परियेरुम पेरुमल पर आधारित है। तमिल फ़िल्मकार ऊंची जाति के लोगों पर आक्षेप करने वाली फ़िल्में बनाते रहते है। किन्तु, बॉलीवुड में अभी ऐसा कोई चलन नहीं बना है।  क्यों नहीं ? धड़क २ इसका प्रमाण है।






इधर कुछ सालों से, बॉलीवुड द्वारा बनाई गई फिल्मों में धड़क, शूद्र द राइजिंग, आर्टिकल १५, खाप, आरक्षण, मसान, आदि फ़िल्में प्रेरित और पूर्वाग्रह से युक्त फ़िल्में लगती है। इनकी ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह तब लग जाता है, जब इन फिल्मों को नीची जाति वाले दर्शकों द्वारा भी नहीं देखी जाती। 






ऐसे समय में, बम्बईया फिल्मों के पुराने दौर में जाना होगा।  क्योंकि, इस दौर में गिनी चुनी फिल्मे ही सही, जातिगत भेदभाव पर पूरी ईमानदारी से बनी। इसी ईमानदार प्रयास का परिणाम था कि यह इक्कादुक्का फिल्में दर्शकों द्वारा उस दौर में बीच स्वीकार भी की गई, जब जाति प्रथा के विरुद्ध कड़े कानून नहीं बने थे ।






ऎसी ही एक फिल्म थी अछूत कन्या। बॉम्बे टॉकीज की निर्माता हिमांशु राय की फ्रेंज़ ऑस्टिन द्वारा निर्देशित हिंदी फिल्म अछूत कन्या में दलित कन्या और ब्राह्मण युवक की दुखांत प्रेम कहानी थी। फिल्म में अछूत कन्या की भूमिका ब्राह्मण जाति की देविका रानी ने की थी।  फिल्म के सवर्ण नायक अशोक कुमार भी सवर्ण जाति के थे।  इसके बावजूद यह एक ईमानदार प्रयास फिल्म थी।  कोई ९० साल पहले प्रदर्शित इस फिल्म ने १९३६ में तहलका मचा दिया था। फिल्म की कड़ी आलोचना हुई थी। किन्तु, बहुतों को सोचने का अवसर भी दिया था। इसके बाद, देश में सुधारवादी युग की शुरुआत हुई। इसीलिए इस फिल्म को सुधारवादी फिल्म के रूप में याद किया जाता है। 






जाति व्यवस्था पर एक अन्य फिल्म सुजाता १९५९ में प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म रोमांस की चासनी में लिपटी दलित युवती सुजाता से एक ब्राह्मण युवा अधीर के प्रेम की कहानी थी। सुजाता की भूमिका नूतन ने और अधीर सुनील दत्त बने थे। इस फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय थे।  फिल्म को नब्येंदू घोष, सुबोध घोष  और पॉल महेंद्र ने लिखा था।  फिल्म में शशिकला, ललिता पवार, तरुण बोस, सुलोचना और असित सेन की प्रमुख भूमिकाएं थी।





सुजाता की विशेषता थी कि जहाँ अछूत कन्या में अछूत कस्तूरी को अपने प्रेमी प्रताप को बचाने के लिए सामने से आती ट्रेन को रोकने के प्रयास में अपनी जान देनी पड़ती थी, वही सुजाता में अधीर के परिवार वाले सुजाता द्वारा रक्त दान से प्रभावित हो आकर उसे अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हो जाते थे।






स्पष्ट है कि अछूत कन्या से लेकर सुजाता तक की २३ साल लम्बी यात्रा में हिंदी फिल्मकारों ने इतनी हिम्मत जुटाई  कि वह अपनी अछूत कन्या सुजाता को ब्राह्मण अधीर के घर की बहू बनवा पाने में सफल हुए।







इस दृष्टि से, अंकुर और निशांत भी प्रशंसनीय फिल्में है। ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली श्याम बेनेगल की यह फ़िल्में ऊंची जाति के जमींदार के विरुद्ध आवाज उठाती है। वही, सत्यजीत रे की सद्गति, आक्रोश, पार, आदि फिल्मे दलितों की दुर्दशा गंभीरता से उठाती है।







आजकल, धड़क २, आर्टिकल १५, आरक्षण, जैसी फ़िल्में इसलिए सफल नहीं हो पा रही है कि यह समस्या को समझ कर कहानी का विषय बनाने के स्थान पर सवर्णों को आरोपित करने का प्रयास लगती है। 

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