Wednesday, 26 October 2016

'वॉर' ही है पाकिस्तान की घृणा का 'बॉर्डर' !

पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा उरी में भारतीय सेना के कैंप पर हमला कर १८ सैनिकों को मार डालने की घटना के बाद हिन्दुस्तानियों में बेचैनी है।  शहर शहर प्रदर्शनों की श्रंखला में महाराष्ट्र में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का पाकिस्तानी कलाकारों को ४८ घंटों में देश छोड़ देने का अल्टीमेटम भी आ जुडा है। इन दोनों सेनाऑ के बयान के बाद बॉलीवुड में भी पक्ष और विपक्ष बनने शुरू हो गए हैं। पाकिस्तानी कलाकारों के खेमे में खड़े लोगों का कहना है कि इसमे कलाकार कहाँ से आ गए।  उनका क्या दोष ! क्या सचमुच पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री लॉलीवुड निर्दोष  है ! वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तानी फिल्मे एंटी-इंडियन ही नहीं खालिस सांप्रदायिक हैं, हिन्दू  विरोध पर टिकी हुई।  इन फिल्मो से हिन्दुओ के प्रति घृणा का  प्रदर्शन होता है।
पाकिस्तानी घृणा की 'बॉर्डर'
पाकिस्तानी फिल्म बॉर्डर भारत और खास तौर पर हिन्दुओ के खिलाफ ज़हरीली घृणा का उम्दा उदाहरण है।  इस फिल्म में हिंदुओं के प्रति घृणा साफ झलकती है।  फिल्म में भारतीय सैनिकों को सांप्रदायिक हिंदुओं द्वारा नियंत्रित और मुसलमान औरतों के साथ बलात्कार करने वाला बताया गया है।  फिल्म में एक हिन्दू लड़की (यह किरदार पाकी एक्ट्रेस सना नवाज़ ने किया है) एक फौजी अधिकारी के गठीले शरीर पर कामुक हो जाती है।  जब लड़की को मालूम होता है कि उसका हमबिस्तर सैनिक भारतीयों को मारना चाहता है तो वह इस्लाम क़ुबूल कर भारतीय फौज को मारने निकल पड़ती है।  फिल्म में पाकिस्तानी सैनिक 'नौसिखुए' भारतीय सैनिकों को मार डालती है।  एक सीन में दुबई में भारतीय फौजी और पाकिस्तानी फौजी अफसर के बीच बॉक्सिंग मुक़ाबला दिखाया गया है जिसमे वह अफसर भारतीय सैनिक को बुरी तरह से पीट देता है। इस फिल्म के संवाद भारत और हिन्दुओ के विरुद्ध घृणा फैलाने वाले हैं।
फव्वाद खान का घृणित सीरियल दास्तान
पाकी एक्टर फव्वाद खान करण जौहर की दिवाली में रिलीज़ होने जा रही फिल्म ऐ दिल है मुश्किल में सेकंड लीड है।  इस पाकिस्तानी एक्टर के विरोध में आई शिव सेना और एमएनएस का विरोध देश के काफी सेक्युलर टाइप के लोग आवाज़ उठा रहे हैं।  लेकिन शायद इन लोगों को नहीं मालूम की फव्वाद खान ने एक ऐसे टीवी सीरियल दास्तान में अभिनय किया है जिसमे हिन्दुओ और सिक्खों को मुसलमानों को सांप्रदायिक और पार्टीशन के दौरान मुसलमानों की ह्त्या करने वाली कौम बताया गया है। इस सीरियल को 'ज़ी ज़िन्दगी' ने 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम' टाइटल के साथ टेलीकास्ट किया था।  लेकिन इस सीरियल को काफी एडिट कर एक प्रेम कहानी के बतौर ही पेश किया गया।
हिन्दू घृणा से भरी अन्य पाकी फ़िल्में
२००० में रिलीज़ एक अन्य पाकिस्तानी फिल्म तेरे प्यार में में भारतीय हिन्दू लड़की का पाकिस्तानी फौजी से रोमांस दिखाया गया है।  इस फिल्म में भारत की आर्मी को सिख विरोधी और सिखों को पाकिस्तान समर्थक दिखाया गया है।  फिल्म के क्लाइमेक्स में पाकिस्तान का हीरो पूरी भारतीय सेना की बटालियन को नष्ट कर भारत में घुस कर अपनी प्रेमिका को ले जाता है।  मूसा खान (२००१) में कश्मीरी पंडितों को दुष्ट और चालबाज़ बताया गया है।  इस फिल्म का हीरो सुपरपावर रखने वाला पाकिस्तानी है।  भारतीय सैनिकों के प्रति पाकिस्तानी घृणा का अंदाजा इसी  से लगाया जा सकता है कि सीरीज अल्फा ब्रावो चार्ली में पाकिस्तानी महिला सैनिक भारतीय सैनिकों को सियाचिन में बुरी तरह से परास्त करती है।   फिल्म जन्नत की तलाश भी  हिंदुओं और सिखों के खिलाफ घृणा से भरी है।
'पृथ्वी' से श्रेष्ठ 'गोरी' !
फिल्म घर कब आओगे में बड़ी दिलचस्प फिल्म है।  इस फिल्म में फिलीपीन्स से यहूदी आतंकवादियों द्वारा पूरे कराची में बम ब्लास्ट करते दिखाया गया है।  लेकिन इन यहूदी आतंकवादियों के नाम चार्ल्स शोभराज, पृथ्वी और ओबेरॉय है।  सबसे ज़्यादा दिलचस्प है फिल्म का एक संवाद 'पृथ्वी के सामने सिर्फ गोरी ही आ सकता है' है।  इस संवाद के ज़रिये हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान की मोहम्मद गोरी से पराजय दिखाने और भारतीय मिसाइल पृथ्वी के सामने पाकिस्तानी मिसाइल  गोरी की श्रेष्ठता स्थापित करने  की कोशिश की गई है।  
भारत विरोधी आई-एस पी आर
पाकिस्तानी सेना की मीडिया विंग है।  यह विंग सुनिश्चित करती है कि एंटी इंडिया और एंटी हिन्दू खबरें, वृत्त चित्र और खबरे प्रसारित और प्रकाशित हों।  यह विंग पाकिस्तानी फिल्मों को शुरू से आखिर तक मॉनीटर करती है। कहानी में बदलाव से लेकर शूटिंग में दखल और सेंसर करने तक इसकी भूमिका होती है।  अगर किसी भारतीय फिल्म में पाकिस्तानी सेना और उग्रवादियों  के खिलाफ एक शब्द भी होता है तो आई-एस पी आर ऎसी फिल्म को सेंसर से पारित नहीं होने देती।  इस विंग के इशारे पर इसी साल तीन हिंदी फ़िल्में नीरजा, ढ़िशूम और अम्बरसरिया पाकिस्तान में रिलीज़ नहीं हो पाई।
हिंदुस्तानी फिल्मों के खिलाफ पाकिस्तानी निर्माता-वितरक
इसी साल पाकिस्तान के फिल्म निर्माताओं और वितरकों ने हिंदुस्तानी फिल्मों को पाकिस्तान में रिलीज़ से रोकने के लिए एक पिटीशन लाहौर हाई कोर्ट में दायर की थी।  इस पिटीशन में मोशन पिक्चर्स आर्डिनेंस लॉ १९७९ को लागू करने की मांग की गई थी।  पिछले साल पाकिस्तानी कॉमेडियन इफ्तिखार अहमद ठाकुर ने लाहौर कोर्ट में रिट दायर कर भारतीय फिल्मों पर स्थाई रोक लगाने  की  थी।  कोर्ट ने इस रिट को ठाकुर को पाकिस्तान के सांस्कृतिक विभाग से अनुरोध करने की  हिदायत के साथ खारिज़ कर दिया था ।  भारतीय फिल्मों पर रोक लगाने के पक्ष में पाकिस्तान के मोअम्मर राणा, शान, संगीता और शाहिद जैसे बड़े एक्टर रहते हैं।  फिल्म निर्देशक सईद नूर, असलम डार, अल्ताफ हुसैन, मसूद बट और परवेज़ राणा, फिल्म निर्माता जानी मालिक और चौधरी कामरान भी इसी विचार के हैं।
भारतीय एजेंट राहत फ़तेह अली खान !
ज़हर उगलने के लिहाज़ से पाकिस्तानी मीडिया पीछे नहीं।  इस्लामाबाद से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी अख़बार द डेली मेल ने भारतीय टीवी सीरियल छोटे उस्ताद को लेकर एक बड़ी दिलचस्प रिपोर्ट  निकाली थी। बच्चों के इस म्यूजिक रियलिटी शो छोटे उस्ताद में भारत और पाकिस्तान के १०-१० बच्चे हिस्सा ले रहे थे।  इन बच्चों को पाकिस्तान से लाने का ज़िम्मा राहत फ़तेह अली खान का था।  अख़बार ने रिपोर्ट में कहा कि राहत भारतीय एजेंसी रॉ यानि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग की वन नेशन थ्योरी के सपोर्ट में काम कर रहे हैं।  इसके लिए उन्हें म्यूजिक और पाकिस्तानी बच्चों का सहारा लिया है।  इन बच्चों के मुंह से हिंदुस्तानी गीत गवाये जायेंगे।  अखबार ने पाकिस्तानी बच्चों का राहत फ़तेह अली खान का कैमल जॉकी बताया।  इस अख़बार ने भारतीय चैनलों स्टार प्लस और ज़ी टीवी को पाकिस्तानी बच्चों के  दिमाग से टू नेशन थ्योरी को मिटाने के लिए रॉ के हाथों खेलने का आरोप लगाते हुए कहा कि पाकिस्तानी बच्चों के मुंह कहलाया गया कि जब वह इंडिया में उतरे तो उन्हें नहीं लगा कि वह पाकिस्तान में नहीं हैं।  द डेली मेल की रिपोर्ट में रॉ द्वारा कथित रूप से एंटी पाकिस्तानी हिंदी फिल्मों की फंडिंग का आरोप भी लगाया।
ज़ाहिर है कि लॉलीवुड भारत का दोस्त नहीं।  इसके शीर्ष एक्टर, निर्माता और वितरक हिंदुस्तानी फिल्मों के विरोधी हैं।  पाकिस्तानी दर्शक सलमान खान शाहरुख़ खान और आमिर खान की फ़िल्में हिट बनाते  हैं।  लेकिन, यही भारत विरोधी फिल्म वार को शाहरुख़ खान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस से ज़्यादा सफल भी बनाते हैं। यह फ़िल्में हिंदुओं के प्रति उन्मादी भाषा का इस्तेमाल इन्ही कलाकारों के मुंह से बुलवाती है, जो  बॉलीवुड की फिल्मों में पैसा कमाने की मंशा से आते है, न कि सांप्रदायिक या सांस्कृतिक सौहार्द्र के लिए । वॉर और बॉर्डर जैसी एंटी  हिन्दू फिल्मों को हिट बनाने वाला पाकिस्तानी  आवाम ही है।

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