Saturday, 6 May 2017

फिर वापस आ रहा है आम आदमी ?

जी हाँ, आम आदमी पर फ़िल्में बनने का सिलसिला शुरू हो गया है।  यह आम आदमी छोटे शहर का ज़रूर है।  लेकिन, तिग्मांशु धुलिया और अनुराग कश्यप की फिल्मों की तरह शातिर अपराधी या गैंगस्टर नहीं।  यह आम आदमी, आम आदमी के लिए है।  इन फिल्मों को आम आदमी की आम आदमी द्वारा आम आदमी पर फिल्म कहा जा सकता है।
बाहुबली से उबरने पर आम आदमी
जब तक छोटे शहरों के दर्शकों के दिलोंदिमाग से बाहुबली के भव्य सेट्स, चमकते दमकते गहनों कपड़ों और राजाओं- महाराजाओं का खुमार उतरेगा, सेल्युलाइड पर आम आदमी उनके बीच होगा।  यह आम आदमी उनका जैसा दिखाई भी देगा।  उनकी जैसी समस्याओं से जूझेगा।  फिर भी हिम्मत नहीं हार रहा होगा।  १२ मई को आम आदमी की कहानियों वाली तीन फ़िल्में मेरी प्यारी बिंदु, थोड़ी  थोड़ी सी मनमानियां और हिंदी मीडियम रिलीज़ होंगी। यह शुरुआत होगी आम आदमी पर फिल्मों की।  इसके अगले हफ़्तों में  हाफ गर्लफ्रेंड,  मुज़फ्फरनगर २०१३, वी फॉर विजय, अतिथि इन लंदन, बहन होगी तेरी, मुन्ना माइकल, बरेली की बर्फी, टॉयलेट एक प्रेम कथा, शुभ मंगल सावधान, पोस्टर बॉयज, लखनऊ सेंट्रल, लव स्क्वायर फुट, आदि टाइटल वाली फ़िल्में रिलीज़ होने जा रही हैं।  यह सभी फ़िल्में आम आदमी की परेशानियों और दुश्वारियों का खट्टा मीठा दुःख बयान करती हैं।  कोई शक नहीं अगर इन फिल्मों को देखते समय दर्शक किसी फिल्म में खुद को पाए।
आम आदमी की कैसी कैसी कहानियां
आम आदमी की फिल्मों के सन्दर्भ में एक दिलचस्प बात यह है कि यह फ़िल्में किसी ख़ास राजनीतिक लाइन पर बनी भ्रष्टाचार गाथा नहीं है।  इन फिल्मों का कैनवास काफी बड़ा है।  शायद ही कोई पहलू बचा हो, जिसे इन फिल्मों ने न छुआ हो। मेरी प्यारी बिंदु एक लेखक की कहानी है, जो उतना सफल नहीं हो पाता, जितना वह खुद को समझता है।  निराश हो कर वह अपने देश कलकत्ता वापस चला जाता है।  वहां वह लिखना शुरू करता है कहानी आम ज़िन्दगी की, अपनी प्यारी बिंदु की।  थोड़ी थोड़ी सी मनमानियां एक बच्चे पर उसकी माँ की आशाओं और अपेक्षाओं की हैं।  माँ चाहती है कि उसका बेटा संगीत की दुनिया में सफल बने और उसके सपने पूरे हों।  हिंदी मीडियम और हाफ गर्लफ्रेंड का विषय तो बहुत कुछ आम आदमी की भाषाई परेशानी वाला है।  यह परेशानी है अंग्रेजी न जानने और बोल पाने की।  इस कहानी को एक परिवार और एक बिहारी प्रेमी के माध्यम से कहा गया है।  मुज़फ्फर नगर २०१३ रियल लाइफ फिल्म है।  २०१३ के मुज़फ्फरनगर दंगों में किस प्रकार से युवा राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का शिकार होते हैं।  वी फॉर विक्ट्री गरीबी की कहानी है।  छोटू को उसका मज़दूर पिता पढ़ाना लिखाना चाहता है।  लेकिन, एक दिन पिता ऐसा बीमार पड़ जाता है कि परिवार की देखभाल के लिए छोटू को मज़दूरी करनी पड़ती है।  अतिथि इन लंदन का कैनवास आधुनिक है, लंदन की पृष्ठभूमि पर है।  लेकिन कहानी वही आम आदमी की है।  यकायक आ टपकते मेहमानों से कौन नहीं त्रस्त है।  बहन होगी तेरी लखनऊ के एक लडके के क्रिकेट प्रेम और रोमांस की कहानी है।  मुन्ना माइकल एक स्ट्रीट डांसर है।  उसका आदर्श माइकल जैक्सन है।  वह भी माइकल जैक्सन की तरह डांसर बनना चाहता है।  उसे एक दिन मौक़ा मिल ही जाता है।  टाइटल से इतर बरेली की बर्फी लखनऊ में प्रिंटिंग प्रेस में काम करने वाले लोगों की कहानी है।  इसमें प्रेम की मिठास बेशक है।  टॉयलेट एक प्रेम कथा प्रधान मंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के समर्थन में गाँव में टॉयलेट के निर्माण की प्रेरक और दिलचस्प कहानी है।  शुभ मंगल सावधान आम शादियों की रस्मों को लेकर है।  यह एक तमिल फिल्म का रीमेक है।  लखनऊ सेंट्रल कहानी है जेल में बंद कैदियों की।  फिल्म में फरहान अख्तर का किरदार कैदियों के साथ मिल कर एक रॉक बैंड बनाता है।   लव पर स्क्वायर फुट एक लड़का लड़की की कहानी है, जो मुंबई में मकान पाने के लिए परेशान हैं।
रुपहले परदे पर आम आदमी के चेहरे
इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी फ़िल्में आम आदमी  की ज़िंदगी के हर पहलू को छू रही है।  अब केवल गरीबी और भ्रष्टाचार ही मुद्दा नहीं रहा।  आम आदमी की बहुत सी दूसरी परेशानियां है।  यह फिल्म में कैसे उभर कर आती हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।  लेकिन, उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है आम आदमी को परदे पर उतारने वाले चेहरे।  कभी बलराज साहनी और उनके साथ निरुपा रॉय आम आदमी के प्रतिनिधित्व किया करते थे।  बाद में अमोल पालेकर ने आम आदमी को परदे पर उतारा।
हिंदी मीडियम में इरफ़ान खान चांदनी चौक के साड़ी विक्रेता की भूमिका कर रहे हैं।  उनकी और उनकी पत्नी की समस्या यह है कि उन्हें इंग्लिश नहीं आती।  इसलिए वह ऊंची सोसाइटी में उठ बैठ नहीं पाते।  इस फिल्म में उनका साथ पाकिस्तान की सबा क़मर दे रही हैं।  इरफ़ान खान आम आदमी का चेहरा है।  अलबत्ता उनके चेहरे के साथ हॉलीवुड फ़िल्में जुड़ चुकी है।  मेरी प्यारी बिंदु, बरेली की बर्फी और शुभ मंगल सावधान में आयुष्मान खुराना आम आदमी का चेहरा है। शुभ मंगल सावधान में आयुष्मान का साथ भूमि पेंडणेकर दे रही हैं तो बरेली की बर्फी में  कृति सेनन जैसी सेक्सी अभिनेत्री उनकी जोड़ीदार हैं।  मेरी प्यारी बिंदु में आयुष्मान के अभिमन्यु की बिंदु परिणीति चोपड़ा हैं। अपनी पहली फिल्म विक्की डोनर से आयुष्मान ने खुद को आम आदमी का चेहरा बना कर ही पेश किया था।  बरेली की बर्फी में प्रेस में काम करने वाले कामगार का आम सा किरदार राजकुमार राव ने किया है।  बहन होगी तेरी में भी वह लखनऊ की सडकों पर क्रिकेट खेलने वाले लडके के किरदार में हैं।   इस फिल्म में उनकी नायिका ग्लैमरस श्रुति हासन है।
बड़े और बिकाऊ आम आदमी के चेहरे
यह फिल्म निर्माता पर निर्भर करता है कि वह अपनी फिल्म का कैनवास कितना बड़ा रखना चाहता है।  अगर एक सौ करोड़ की कमाई की चाहत है तो हिन्दू फिल्मों का कोई स्टार या सुपर स्टार ज़रूरी है।  मसलन, अक्षय कुमार को ही लीजिये।  वह आदमी का चेहरा बनते रहते हैं।  इसी साल रिलीज़ निर्देशक सुभाष कपूर की फिल्म जॉली एलएलबी २ में अक्षय कुमार ने लखनऊ के एक धूर्त वकील का किरदार किया था।  इस किरदार को मूल फिल्म में अरशद वारसी ने किया था।  अब अक्षय कुमार गाँव की कहानी टॉयलेट एक प्रेम कथा में गाव वालों को खुले में शौच न करने और घरों में शौचालय बनाने के लिए प्रेरित करने वाले आम आदमी बने हैं। फिल्म में दम लगा के हईशा की नायिका भूमि पेंडेकर  वह फिल्म पैडमैन में स्त्रियों के लिए सेनेटरी पैड की ईज़ाद करने वाले रियल लाइफ करैक्टर बने हैं।  इसी श्रेणी में अभिनेता टाइगर श्रॉफ को भी रखा जा सकता है।  कमर्शियल फिल्मों का यह सफल चेहरा फिल्म मुन्ना  माइकल में स्ट्रीट डांसर का किरदार कर रहा है।  हाफ गर्लफ्रेंड अंग्रेजी न जानने वाले एक आम बिहारी की कहानी है।  लेकिन, इस आम आदमी के लिए निर्देशक मोहित सूरी को अर्जुन कपूर ही पसंद आये।  उनका साथ उनसे ज़्यादा ग्लैमरस अभिनेत्री श्रद्धा कपूर  दे रही हैं।  अब आप ही बताइएं पोस्टर बॉयज में पोस्टर पर आम आदमी बने सनी देओल आपको कैसे लगेंगे ? निखिल  अडवाणी की फिल्म लखनऊ सेंट्रल में फरहान अख्तर, डायना पेंटी और गिप्पी ग्रेवाल ने आम किरदार किये हैं।
आम आदमी के कुछ नए चेहरे
फिल्म थोड़ी थोड़ी सी मनमानियां में अर्श सेहरावत संगीत की दुनिया में चमक कर माँ का स्वप्न पूरा करने की चाहत रखने वाले आम आदमी बने हैं।  वी फॉर विक्ट्री के तमाम चेहरे बिलकुल नए हैं।  मुज़फ्फरनगर २०१३ में मुर्सलीम कुरैशी, ऐश्वर्या देवन, एकांश भरद्वाज, देव शर्मा, आदि बिलकुल नए चेहरे कस्बाई युवाओं की भूमिका में हैं।  अतिथि इन लंदन में परेश रावल के साथ कृति खरबंदा और कार्तिक आर्यन के कम पहचाने चेहरे आम आदमी का चेहरा बने हैं। लव पर स्क्वायर फुट के दो मुख्य किरदार विक्की कौशल और अंगिरा धर हैं।  इन नवोदित चेहरों ने खुद को किरमार में कैसा ढाला है, यही  देखना ख़ास होगा।
आम आदमी पर फिल्मों की लिस्ट यहीं ख़त्म नहीं होती।  आम आदमी की ढेरों कहानियां इंतज़ार कर रही हैं, परदे पर उतरने का और उन्हें उतारने वाले फिल्मकार का।  लेकिन, खेद की बात यही है कि आम आदमी पर आम आदमी के लिए आम आदमी की फिल्म को देखना आम आदमी भी पसंद नहीं करता।  क्यों नहीं मिलता सेलुलाइड के आम आदमी को रियल लाइफ के आम आदमी का प्यार ?



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