घटना १९५७ की है। उस समय, फिल्म निर्माता और निर्देशक वी शांताराम फिल्म दो आँखे बारह हाथ की शूटिंग कर रहे थे। यह फिल्म, महाराष्ट्र में उस समय राजा द्वारा शासित स्वतंत्रपुर की खुली जेल के प्रयोग से प्रेरित थी। फिल्म का कथानक हॉलीवुड की फिल्म १९५२ ने निर्मित फिल्म माय सिक्स कन्वीक्ट्स पर आधारित भी बताया जाता है। वी शांताराम की फिल्म भी छह कैदियों के अपने जेल वार्डन से संबंधों का कथानक थी। फिल्म में शांताराम ने जेल वार्डन आदिनाथ की भूमिका की थी।
हाँ तो बात फिल्म दो आँखे बारह हाथ की शूटिंग की हो रही थी। इस फिल्म में क्लाइमेक्स में वार्डन आदिनाथ को कैदियों को बचाने के लिए एक बैल से लड़ना पड़ता है। इस लड़ाई में आदिनाथ बुरी तरह से घायल हो जाता है और अंत में उसका देहांत हो जाता है। किन्तु, यह लड़ाई अभिनेता वी शांताराम के लिए घातक साबित हुई थी। उनकी एक आँख बुरी तरह से चोटिल हो गई थी। आँखों की रोशनी लगभग ख़त्म हो चली थी। उनका इलाज हो रहा था।
गेवाकलर में बनाई गई फिल्म नवरंग का प्रारम्भ श्वेत श्याम होता है। उस समय वी शांताराम, नवरंग के निर्माण के कारणों को बताते हैं। वह बताते हैं कि कैसे उन्हें दो ऑंखें बारह हाथ में बैल से लड़ाई के दौरान एक आँख में चोट लग जाती है। इस इलाज के दौरान उनकी आँखे चटख रंग देख रही थी। उस समय वह सोचते थे कि क्या वह ठीक हो पाएंगे! किन्तु, चिकित्सकों के प्रयासों से शांताराम ठीक हो गए और इसके साथ ही नवरंग का जन्म हुआ।
वी. शांताराम निर्देशित फ़िल्म नवरंग (१९५९) अपने जीवंत टेक्नीकलर के समृद्ध प्रयोग के लिए प्रसिद्ध है। यह फिल्म शांताराम के दर्शकों को चटकीले रंगों का प्रयोग करने के अपने दृष्टिकोण को समझाते है, तभी फ़िल्म मोनोक्रोम से रंगों के भंडार में परिवर्तित हो जाती है। उस समय का यह प्रयोग अपने आप में अनूठा अनुभव था। शांताराम ने रंगों की दुनिया का प्रयोग फिल्म के नायक कवि दिवाकर की कल्पना और काल्पनिक प्रेमिका मोहिनी (जो वास्तव में उसकी पत्नी जमुना ही है) के नृत्य दृश्यों में उपयोग किया गया था।
वी शांताराम ने, जमुना उर्फ़ मोहिनी के नृत्य गीतों आधा है चन्द्रमा, जा रे तू नटखट, तू छुपी है कहाँ, आदि गीतों में इस प्रमुखता से किया गया था कि संध्या के नृत्य और उनके वस्त्राभरण आकर्षक ही नहीं, आँखों को दावत देने वाले लगते थे। यही शांताराम का आँखों के इलाज के दौरान रंगों का दर्शन था। फिल्म को, शांताराम की पत्नी संध्या की नृत्य प्रतिभा का भरपूर उपयोग किया गया था। इससे फिल्म कवि दिवाकर की कविताओं की प्रेरणा मोहिनी अपने मोहक रूप में दिखाई देती थी। ऐसी मोहनी की कल्पना कर कौन कवि नहीं बन जायेगा!
प्रारम्भ में वी शांताराम ने इस कथानक पर श्वेत श्याम में मराठी फिल्म बनाने का निर्णय लिया था। फिल्म में संध्या के साथ मराठी फिल्म अभिनेता अरुण समाइक प्रमुख भूमिका में लिए जाने थे। किन्तु, बाद में शांताराम में फिल्म नवरंग के रूप में रंगीन माध्यम से हिंदी में बनाने का निर्णय लिया। फिल्म में संध्या तो बनी रहीं, किन्तु, नायक महिपाल बना दिए गए।
फिल्म के संगीतकार, राजकमल कलामंदिर के स्थाई संगीतकार वसंत देसाई थे। किन्तु, संगीत निर्माण के समय वसंत देसाई और वी शांताराम के मध्य रचनात्मक मत वैभिन्य अर्थात क्रिएटिव डिफरेंस पैदा हो गए। वसंत देसाई ने फिल्म छोड़ दी। उनका स्थान सी रामचंद्र ने ले लिया। रामचंद्र चितलकर ने भी फिल्म के कथानक के अनुरूप संगीत रचना की। फिल्म की सफलता में रामचंद्र के संगीत का बड़ा योगदान था।
यहाँ आपको बताते चलें कि संध्या पर फिल्माए गए गीत चल जा रे नटखट गीत में संध्या के साथ नृत्य कर रहे मुखौटा पहने पुरुष नर्तक आज के अभिनेता जीतेन्द्र बने थे। इस फिल्म के बाद ही, शांताराम ने जीतेन्द्र को फिल्म गीत गाया पत्थरों ने में अपनी बेटी राजश्री का नायक बनाया।

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