सुबोध मुखर्जी निर्देशित संगीतमय प्रेम कथानक वाली हिंदी
फिल्म साज़ और आवाज़ में जॉय मुखर्जी, सायरा बानो, मुमताज, पद्मा
खन्ना, कन्हैयालाल, असित सेन और लीला मिश्रा ने अभिनय किया
था। जॉय मुख़र्जी और सायरा बानू की रोमांटिक जोड़ी बनी थी। इस फिल्म का महूरत ४
फरवरी १९६२ को हुआ था।
फिल्म साज़ और आवाज़ का क्लैप १९६२ में दिलीप कुमार के
हाथों संपन्न हुआ था। फिल्म के निर्माता
और निर्देशक सुबोध मुख़र्जी हिंदी फिल्म उद्योग के स्थापित नाम थे। उन्होंने, साज़ और आवाज़ से पूर्व मुनीमजी, पेइंग गेस्ट, लव मैरिज, जंगली और अप्रैल फूल जैसी सुपरहिट
फ़िल्मों का निर्देशन किया था। इसके बावजूद, फिल्म साज़ और आवाज़ को पूरी होने में
चार साल लग गए। यह फिल्म १९६६ में प्रदर्शित हुई। इससे स्पष्ट है कि फिल्म उद्योग
कितना आशंकाओं भरा है। कोई फिल्म समय पर बन पाएगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता।
साज़ और आवाज़ एक संगीतमय प्रेम कथानक वाली फिल्म थी।
प्रतिभाशाली गायक राजेश और दक्ष नृत्यांगना गीता एक दूसरे से मिलते हैं और दोनों
में प्रेम हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों की जोड़ी स्वर्ग में बनी है कि
तभी एक रहस्य उनके जीवन में उथलपुथल ला देता है।
इस फिल्म का संगीत नौशाद ने दिया था। गीत खुमार
बाराबंकवी ने लिखे थे। इन गीतों को मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और सुमन कल्याणपुर ने गाया था। फिल्म के
अधिकतर गीत श्रोताओं के होंठों पर गूंजते थे। साज हो तुम आवाज़ हूँ मैं पर सायरा
बानू का नृत्य दर्शनीय था। इसके बाद भी यह फिल्म बड़ी फ्लॉप हो गई।
यह फिल्म १९६० के दशक की म्यूजिकल थ्रिलर फिल्मों की
श्रृंखला में लगती थी। क्योंकि, इससे
पूर्व की सुबोध मुख़र्जी निर्देशित फिल्मों में थ्रिलर का रोमांस और संगीत के साथ
मिश्रण नहीं दिखाई देता था। यह शैली विजय आनंद और राज खोसला की प्रेरणा लगती
है।
साज़ और आवाज़, सायरा बानू के फिल्म जीवन की तीसरी फिल्म थी। उस समय तक
सायरा ने जंगली (१९६१) के बाद फ्लॉप शादी (१९६२) हुई थी। साज़ और आवाज़, जब १९६६ में प्रदर्शित हुई, उस समय तक सायरा बानू की शम्मी कपूर के साथ ब्लफमास्टर, राजेंद्र कुमार के साथ आई मिलन की बेला, विश्वजीत के साथ अप्रैल फूल प्रदर्शित हो कर सुपरहिट हो चुकी थी। सायरा का
करियर टॉप पर था कि दिलीप कुमार बीच में आ गए।
फिल्म आई मिलन की बेला की शूटिंग के दौरान राजेंद्र
कुमार और सायरा बानू के प्रेम के चर्चे फिल्म उद्योग में चर्चित हो रहे थे। दिलीप
कुमार को यह समाचार मिला कि फिल्म के ही सेट पर राजेंद्र कुमार और सायरा बानू शादी
करने वाले है। इस शादी को रोकने के लिए
दिलीप कुमार ने सायरा की अम्मी नसीम बानु के सामने सायरा से निकाह का प्रस्ताव
किया। इसके बाद, सायरा और
राजेंद्र कुमार के रोमांस पर तो ब्रेक लगा ही, फिल्म साज़ और आवाज़ के प्रदर्शित होने के वर्ष में
सायरा श्रीमती युसूफ खान बन गई।
साज़ और आवाज़, सुबोध मुख़र्जी
की अति महत्वकांक्षी फिल्म थी। उन्हें इस फिल्म के सफल होने की पूरी आशा थी। किन्तु, फिल्म असफल हुई।
यह सुबोध मुख़र्जी के लिए बड़ा झटका था। इससे व्यथित हो कर सुबोध मुख़र्जी ने
अपनी आगामी फिल्म शागिर्द को निर्देशित न करने का निर्णय सुना दिया। इस फिल्म को समीर गांगुली ने निर्देशित
किया। किन्तु, उनकी बाद की निर्देशित फ़िल्म अभिनेत्री
को बड़ी सफलता मिली।
साज़ और आवाज़ को विलम्ब से प्रदर्शित होने का नुकसान उठाना पड़ा। इस समय तक जॉय मुख़र्जी की फिर वही दिल लाया हों, इशारा, ज़िद्दी, बहु बेटी, लव इन टोक्यो और यह ज़िन्दगी कितनी हसीं है तथा सायरा बानू की ब्लफमास्टर, आई मिलन की बेला, अप्रैल फूल जैसी फिल्मे प्रदर्शित हो कर हिट हो चुकी थी। इन फिल्मों की सफलता ने साज़ और आवाज़ के प्रति दर्शकों में यह दिल मांगे मोर पैदा कर दिया था। परिणामस्वरुप साज़ और आवाज़ कमतर साबित हुई और बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों को आकर्षित न कर सकी। यह फिल्म बड़ी फ्लॉप सिद्ध हुई।

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